नई दिल्ली पिछले दो महीने में मुंबई और दिल्ली में दो बड़े आतंकी हमले ने सुरक्षा प्रणाली की खामियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। नवंबर 2008 में मुंबई में आतंकी हमले के बाद सुरक्षा के लिए जिन नए कदमों की घोषणा की गई थी, उन्हें तीन साल बाद भी पूरा नहीं किया गया है। न तो नैटग्रिड बना और न ही खुफिया विभाग में अधिकारियों की कमी को दूर किया गया। आतंकी हमलों की पूर्व सूचना देने में नाकामी को स्वीकार करते हुए खुफिया विभाग के आला अधिकारी इसके लिए सरकार को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके अनुसार 26/11 हमले के बाद भी खुफिया विभाग में खाली पदों को भरने के लिए कदम नहीं उठाए गए। उन्होंने कहा कि आदमी के अभाव में खुफिया सूचनाएं जुटाना असंभव है। वहीं सभी एजेंसियों के बीच खुफिया सूचनाओं को ऑन लाइन आदान-प्रदान के लिए प्रस्तावित नैटग्रिड अभी तक जमीन पर नहीं उतारा जा सका है। खुफिया सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए बनाए गए मैक (बहु विभागीय सेंटर) केवल पोस्ट आफिस बन रह गया है, जहां खुफिया सूचना की पड़ताल किए बिना ही उसे दूसरी एजेंसी को भेज दिया जाता है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मैक की बैठकें महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं। स्थिति यह है कि आपस में लड़ रही एजेंसियां मैक को अहम सूचनाएं देने से बचती हैं। आतंकी हमलों की जांच के लिए विशेष रूप से बनाई गई एनआइए को पहली बार किसी आतंकी हमले की जांच सौंपी गई है। उधर, गृहमंत्री पी चिदंबरम संसद में हमले की खुफिया जानकारी होने और दिल्ली पुलिस को अलर्ट करने का दावा करते हैं, लेकिन उन्हीं के अधीन काम करने वाले आंतरिक सुरक्षा सचिव यूके बंसल हमले की सटीक खुफिया जानकारी होने से साफ इंकार कर जाते हैं। संवाददाताओं से बातचीत में बंसल ने साफ कहा कि जुलाई में खुफिया विभाग की रिपोर्ट में न तो आतंकी हमले की तैयारी में जुटे संगठन का नाम था और न उनके निशाने का। इसमें सिर्फ दिल्ली को आतंकियों के निशाने पर होने की सूचना दी गई थी। जाहिर है ऐसी सूचना पुलिस के किसी काम की नहीं है।
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