Wednesday, September 7, 2011

आतंक की मजबूती है कमजोर कानून


नई दिल्ली दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए बम विस्फोट ने एक बार फिर आतंकवाद से लड़ने में कानून की कमजोरी और दोषियों को पकड़कर सजा देने के तंत्र की विफलता को जगजाहिर कर दिया है। लचीला रुख और कमजोर कानून आतंकवादियों को दुस्साहसी बना रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर कानूनविद सख्त कानून की पैरवी कर रहे हैं। आतंक के खिलाफ टाडा व पोटा ताकतवर मगर विवादित कानून थे। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ इन्हें हरी झंडी भी दे दी थी, लेकिन दोनों ही समाप्त हो गए। अब गैरकानूनी गतिविधि रोक अधिनियम लागू है, मगर प्रभावी नहीं दिखता। देश के जाने माने वकील और पूर्व एटार्नी जनरल सोली सोराबजी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के साथ पोटा को फिर लागू करने की बात कहते हैं। पोटा वह कानून है, जो टाडा को समाप्त कर लाया गया था। कड़े प्रावधानों और दुरुपयोग के कारण ये विवादित हुआ और अंत में निरस्त कर दिया गया। टाडा अस्सी के दशक में बढ़ते आतंकवाद को काबू करने के लिए बना था। उसका सबसे विवादित प्रावधान था वरिष्ठ अधिकारी के सामने की गई अपराध स्वीकृति को न्यायालय में मान्यता दिया जाना। इस कानून को वापस लिए जाने का यह एक बड़ा कारण था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी इसकी तरफदारी करते हैं। तुलसी कहते हैं कि ऐसे प्रावधान होने चाहिए क्योंकि आतंकवाद के मामले में आम आदमी अदालत में गवाही नहीं देता। टाडा और पोटा के बाद महाराष्ट्र में संगठित अपराध से निबटने के लिए मकोका आया। लेकिन घटनाएं नहीं थमी। कानून को कड़ा करने की बहस इतनी जोर पकड़ी कि सरकार आनन फानन में गैरकानूनी गतिविधि (रोक) कानून में संशोधन ले आई। नए कानून में टाडा और पोटा के प्रावधानों को थोड़ा लचीला कर शामिल किया गया है। वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी कानूनों में कमी के बजाय लागू करने के तंत्र में कमजोरी देखते हैं। वह कहते हैं कि आतंकवादियों में कानून का खौफ नहीं है। क्योंकि अगर पकड़ लिए गए तो वर्षों मुकदमा चलेगा।


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