श्रीनगर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पेश किए जाने वाले अफजल की माफी संबंधी प्रस्ताव व अन्य अहम बिलों पर बहस होगी या नहीं, यह सदन नहीं तय करेगा। शायद काफी कम लोगों को यह पता होगा कि विधायकों द्वारा विभिन्न मुद्दों पर दाखिल किए गए प्रस्तावों और बिलों में से किस पर चर्चा होगी और किस पर नहीं, यह विधानसभा में लॉटरी निकालकर तय होता है और इसकी जिम्मेदारी किसी अशिक्षित कर्मी या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को सौंपी जाती है। 26 सितंबर से शुरू हो रहे सत्र में अफजल के प्रस्ताव का भविष्य भी लॉटरी से तय होगा। इन प्रस्तावों में लंगेट के निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद द्वारा संसद हमले में फांसी की सजा पाए अफजल की माफी के प्रस्ताव से लेकर नेशनल कांफ्रेंस के विधायक मीर सैफुल्लाह द्वारा मारे गए आतंकियों के बच्चों के लिए आरक्षण और पुनर्वास की व्यवस्था का प्रस्ताव भी शामिल है। लेकिन सत्र में इन पर चर्चा लाटरी में इनके नाम निकलने पर ही होगी, अन्यथा नहीं। सत्र के लिए विभिन्न विधायकों द्वारा 39 प्रस्ताव भेजे गए थे। स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन ने सिर्फ 35 को ही स्वीकार किया है। पीडीपी महासचिव निजामदीन भट्ट ने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है। यह एक संवैधानिक प्रथा है, जो जम्मू-कश्मीर विधानसभा की नियमावली 26 और 28 के तहत चली आ रही है। उन्होंने कहा कि यह कोई तकनीकी काम नहीं है, सिर्फ पर्ची ही निकालनी है, इसलिए निम्न श्रेणी के कर्मचारी या किसी अशिक्षित कर्मी को यह जिम्मेदारी दी जाती है। वहीं लंगेट के विधायक इंजीनियर रशीद ने कहा कि लाटरी की प्रथा ठीक है। लेकिन अफजल का प्रस्ताव आम कश्मीरी अवाम की भावनाओं से जुड़ा है। उसकी सजा माफी कश्मीर में अमन बहाली की दिशा में एक अहम कदम हो सकती है, इसलिए मेरे इस प्रस्ताव को लाटरी की प्रक्रिया से अलग रखते हुए सत्र की कार्रवाई में शामिल किया जाना चाहिए
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