लखनऊ अमेरिका द्वारा इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) को आतंकी संगठन करार दिए जाने के बाद खुफिया एजेंसियां उसकी हैसियत आंकने में जुट गई हैं। पूर्व की घटनाओं को ध्यान में रखकर एटीएस और आइबी की टीमें सभी संदिग्ध ठिकानों पर निगाह लगाये हैं और निरंतर जांच-पड़ताल जारी है। सिमी पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद उसके मुखौटे के तौर पर आइएम का नाम उभरा। जांच एजेंसियों की मानें तो पूरे देश में इस संगठन के सदस्यों ने अपनी करतूतों के निशान छोड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर आइएम की तस्वीर 2008 के जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली धमाकों के बाद उभरी, लेकिन सूबे में 2007 में ही आइएम के सदस्य अपनी करतूत दिखा चुके थे। 22 मई 2007 को गोरखपुर का सीरियल ब्लास्ट और फिर 23 नवंबर 2007 को वाराणसी, फैजाबाद और लखनऊ की कचहरियों में हुए ब्लास्ट का आरोप आइएम पर है। विभिन्न धमाकों में गिरफ्तार अबू बशर, शहजाद, सलमान उर्फ छोटू, आरिफ, सैफ, तारिक समेत कई ऐसे नाम हैं, जिन पर जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के विस्फोट के साथ यूपी की कचहरियों में विस्फोट के आरोप हैं। जांच एजेंसी ने इन विस्फोटों का तार जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ के सज्जादुर्रहमान से भी जोड़ा है, लेकिन लखनऊ विस्फोट के मामले में अदालत ने उसे बरी कर दिया। 19 दिसंबर 2008 को दिल्ली के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के बाद आजमगढ़ जिले के संजरपुर का नाम उभरा, जहां के आठ परिवारों के नौ लड़कों की भूमिका सामने आई। जयपुर, लखनऊ समेत कई जेलों में बंद आइएम के कई सदस्य इसी गांव के हैं। जहां तक सिमी के चेहरे पर आइएम के मुखौटे की बात है तो सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है कि सिमी की स्थापना में आजमगढ़ के शाहिद बद्र, मध्य प्रदेश के सफदर नागौरी और अजीज खान की प्रमुख भूमिका रही, इसलिए इन स्थानों के ज्यादातर लोग सिमी पर प्रतिबंध के बाद आइएम के बैनर तले सक्रिय हो गए। जांच एजेंसियां आइएम नेटवर्क में अहमदाबाद, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तर प्रदेश के तार जोड़ती हैं। आइएम के टारगेट के तहत अयोध्या फैसले के दौरान लखनऊ में जज और वकीलों की रेकी करने अहमदाबाद से शेख मुजीब और उज्जैन से मोहम्मद असलम आया था, जिसे मध्य प्रदेश में जून में गिरफ्तार किया गया। इनके अलावा सिमी पर प्रतिबंध लगने के बाद कार्रवाई के दौरान फरार बहराइच के खलीक और याहिया के महाराष्ट्र में सक्रिय होने की बात भी सामने आई, जिनसे दिल्ली में पूछताछ चल रही है। आइएम की सक्रियता से इतर एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि सात दिसंबर 2010 को वाराणसी और 14 अक्टूबर 2010 के कानपुर विस्फोट का आज तक राजफाश नहीं हो सका है। अगर इसमें आइएम की भूमिका है तो उसके और किन सक्रिय सदस्यों ने इस घटना को अंजाम दिया और अगर आइएम सक्रिय नहीं है तो फिर सूबे में और कितने संगठन सक्रिय हैं? इस सवाल का भी किसी के पास जवाब नहीं है। सूबे के विशेष पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था बृजलाल का कहना है कि पूरे प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था चौकस है और देश के किसी भी विस्फोट का कोई कनेक्शन यूपी से नहीं है
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