आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क पर अमेरिका व पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के बीच तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। दोनों एक के बाद एक अपना पक्ष रख रहे हैं। अब अमेरिका ने दावा किया है कि आइएसआइ के तार हक्कानी नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप निराधार नहीं हैं, बल्कि इस बात के उसके पास ठोस प्रमाण हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा है कि उनके पास पुख्ता सुबूत हैं कि आइएसआइ हक्कानी और मंुबई हमलों के जिम्मेदार लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन को मदद देती है। नाम न प्रकाशित करने की की शर्त पर पेंटागन के अधिकारी ने बताया, आइएसआइ आतंकी संगठनों को धन मुहैया कराती है। तकनीकी सहयोग देती है। पाकिस्तानी अधिकारी खूंखार आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह उपलब्ध करवा रहे हैं। अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का एबटाबाद में पाया जाना इस बात का पुख्ता सुबूत है। एबटाबाद में पाकिस्तानी सेना व आइएसआइ के अधिकारियों के सरकारी आवास हैं। रक्षा मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी ने बताया, पेंटागन पाकिस्तान को लंबे समय से सबूत उपलब्ध करा रहा है। उसके बावजूद उसने आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया, लेकिन काबुल में हाल में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के बाद पानी सिर से ऊपर चला गया है। अब हमने इन साक्ष्यों को सार्वजनिक करने का फैसला किया है। अधिकारियों ने सबूतों के बारे में विस्तृत जानकारी देने से इंकार कर दिया। इन्हीं सुबूतों के आधार पर पिछले हफ्ते ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ माइक मुलेन ने कांग्रेस की एक कमेटी को बताया था कि हक्कानी आइएसआइ का अभिन्न हिस्सा है। अमेरिका-पाकिस्तान के बीच तीसरे देश की जरूरत नहीं अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में सुधार लाने के लिए किसी तीसरे देश की मध्यस्थता से साफ इंकार किया है। विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नुलैंड ने यह बात उन मीडिया रिपोर्टो को लेकर कही, जिनमें दोनों देशों के संबंध सुधारने के लिए किसी तीसरे देश की जरूरत के बारे में लिखा गया था। उन्होंने कहा, दोनों देश सीधे तौर पर बात करके आपकी मसलों को सुलझा सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि अमेरिका अन्य देशों के समक्ष पाकिस्तानी आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क के मुद्दे को उठाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की सैन्य सहायता में कमी की गई है जबकि असैन्य सहायता जारी है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान के सहयोग की समीक्षा करने के बाद सैन्य सहायता को लेकर पुनर्विचार किया जाएगा। पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिका का रुख और सख्त हुआ एक समय पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के करीबी माने जाने वाले अमेरिकी ज्वॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ एडमिरल माइक मुलेन अब पाकिस्तान के खिलाफ हैं। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि अमेरिका जल्द ही पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने जा रहा है। मुलेन ने वाल स्ट्रीट जर्नल को दिए साक्षात्कार में पाकिस्तान के प्रति कड़वाहट जताई है। उन्होंने कहा, मेरे देश के निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं। मैं यह सब चुपचाप नहीं देख सकता। यह और बात है कि मैं पाकिस्तान का अच्छा मित्र रह चुका हूं, लेकिन मैं अपने लोगों को ऐसे मरते नहीं देख सकता। मुलेन इस महीने के अंत में पद से विदा लेने जा रहे हैं। पाकिस्तान के प्रति अपने रुख में बदलाव के बारे में उनका कहना है कि वह इस्लामाबाद के साथ साझेदारी को लेकर अभी तक वकालत करते थे, लेकिन उसकी तरफ से सहयोग नहीं मिला। अब दोबारा वैसी राय बना पाना मुश्किल होगा। अपने कार्यकाल में मुलेन पाकिस्तानी सेना प्रमुख अश्फाक परवेज कयानी से 30 बार मिले और उनके साथ हुई अनगिनत बैठकों में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में सहयोग की मांग की। दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद कयानी के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी। शीर्ष अमेरिकी कमांडर ने कहा कि उत्तर वजीरिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ पाकिस्तानी आक्रमण की एक बड़ी योजना के सफल नहीं हो पाने से उन्हें गहरी निराशा हुई है। जीत रहा है अल कायदा रोम : यदि अमेरिका को लगता है कि वह कुख्यात आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के बाद आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में जीत रहा है, तो वह गलत है। यह दावा है अमेरिकी विशेषज्ञ दावीद गारटेनस्टेन रॉस का। रॉस ने बिन लादेंस लेगसी पुस्तक लिखी है। अमेरिकी पत्रिका अटलांटा में लिखे आलेख में उन्होंने कहा कि आतंकवादी संगठन अल कायदा अपने सरगना के मारे जाने के बाद भी कमजोर नहीं हुआ है। उल्टे वह इस लड़ाई में जीत रहा है। रॉस ने दुश्मन को हराने के लिए अमेरिका के अत्यधिक खर्च और अनथक प्रयास किए जाने पर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि ओसामा यही चाहता रहा है। रॉस के अनुसार, मैंने अपनी हालिया किताब में 9/11 हमले के बाद सुरक्षा पर लगातार किए जा रहे अत्यधिक खर्च पर चर्चा की है। यह खर्च अमेरिका की एक बड़ी गलती है। उन्होंने कहा कि कई विश्लेषकों ने अलकायदा के खतरे को गलत आंका है। इस कारण गलत नीतियां लागू हुईं और चीजें बदतर हुई। रॉस का कहना है कि अफगानिस्तान और इराक में युद्ध पर खरबों डॉलर रुपये खर्च किए जा चुके हैं। अमेरिका पर 14 खरब डॉलर (लगभग 685 खरब रुपये) का कर्ज है। उन्होंने कहा 9/11 अमेरिकी हमले के बाद अमेरिका ने सुरक्षा के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया, जिसने उसे आर्थिक स्तर पर कमजोर कर दिया है। रॉस का तर्क है कि आतंकवादी संगठन हारा नहीं है। इसे रोकना मुश्किल हो रहा है क्योंकि अमेरिका अपनी शक्ति और संसाधन बर्बाद कर रहा है। हालांकि आतंकियों पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ संसाधन उपलब्ध हैं, पर खतरा बढ़ता जा रहा है और उसे काबू में करने की क्षमता कम हो रही है।
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