नई दिल्ली पिछले तीस साल से आतंकवाद से जूझने के बावजूद भारत इससे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। सरकार ने गुरुवार को स्वीकारा कि उसके पास आतंकियों से लड़ने की क्षमता नहीं है। दहशतगर्दो की नई रणनीति के आगे सारे सरकारी प्रयास बेकार हैं। हमले को अंजाम देकर साफ बचने वाली देशी आतंकियों की नई पौध के आगे सुरक्षा व खुफिया एजेंसियां बेबस हैं। आतंकियों की गतिविधियों की जानकारी रखना तो दूर, वारदात के बाद भी एजेंसियां उन तक पहुंचने में सफल नहीं हो पा रही हैं। गृहमंत्री पी. चिदंबरम और खुफिया ब्यूरो (आइबी) के प्रमुख नेहचल संधु ने देश भर से आए पुलिस महानिदेशकों को संबोधित करते हुए यह बात कही। चिदंबरम ने मुंबई-दिल्ली में हुए ताजा हमलों को सरकार पर धब्बा बताया। साथ ही आतंक के खिलाफ अमेरिका व भारत की तैयारियों की तुलना करते हुए हमलों को रोकने में नाकामी पर सफाई दी। उन्होंने कहा, 9/11 के बाद अमेरिका ने अलकायदा के खिलाफ जंग का एलान करते हुए होमलैंड सिक्यूरिटी नामक नया विभाग बना दिया,जिसका काम सिर्फ आतंकी गतिविधियों पर नजर रखना था, लेकिन भारत में अभी तक आतंकियों से निपटने के लिए समर्पित विभाग नहीं बना है। चिदंबरम ने राष्ट्रीय आतंकरोधी केंद्र (नेशनल काउंटर टेरर सेंटर-एनसीटीसी) न बनाये जाने पर नाराजगी भी जताई। ध्यान देने की बात है कि 26/11 कांड के बाद से चिदंबरम एनसीटीसी बनाने पर जोर दे रहे हैं, पर विभिन्न मंत्रालयों में इसे लेकर गहरे मतभेद हैं। गृहमंत्री ने कहा,दो देशों पर हमला और अरबों डालर खर्च कर पूरी दुनिया में आतंकियों की तलाश के बाद भी अमेरिका खुद को सुरक्षित नहीं मान रहा है। वहीं कम संसाधन,पाकिस्तान जैसे आतंक के केंद्र के करीब होने के बावजूद भारत में आतंकियों से निपटने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने,आंतरिक सुरक्षा पर बढ़े खतरे के बावजूद कम खर्च के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को आड़े हाथों लिया और कहा,आतंरिक सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय को केवल 40 हजार करोड़ रुपये मिलते हैं। इसमें राज्य सरकारों के 60 हजार करोड़ के खर्च को भी जोड़ लें तो भी यह एक लाख करोड़ रुपये पहुंचता है। वहीं अकेले रक्षा मंत्रालय का बजट एक लाख 60 हजार करोड़ है। इस क्रम में चिदंबरम ने पुलिस सुधारों के अधूरे उपाय और बड़ी संख्या में पुलिस के खाली पदों का भी मुद्दा भी उठाया। आइबी प्रमुख नेहचल संधु ने कहा, आतंकियों की नई रणनीति के आगे सुरक्षा एजेंसियां बेबस हैं। आतंकियों ने काम करने का तरीका बदल लिया है। अब वे छोटे समूह में हमले करते हैं। वारदात की तैयारी के सिलसिले में वे संपर्क के लिए मोबाइल, लैपटाप या ईमेल का इस्तेमाल नहीं करते। वारदात के बाद जगह बदल देते हैं। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियां आतंकियों तक पहुंचने के लिए पुराने तौर तरीके ही इस्तेमाल कर रही हैं। उनका इशारा पिछले सालों में आतंकी हमलों को सुलझाने में जांच एजेंसियों की विफलता की ओर था। बदले हालात में हमें काम का तौर-तरीका बदलना पड़ेगा
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