नई दिल्ली दिल्ली में बम धमाके के घावों के साथ हुई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में सरकार कोई नया मरहम नहीं दे सकी। खुफिया तंत्र मजबूत बनाने व चौकसी के पुराने वादे और आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के संकल्पों के सिवा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण में न तो इसकी रोकथाम का कोई नया नुस्खा था और न ही आतंकी हमलों का दर्द झेल रहे आम-आदमी के सवालों का माकूल जवाब। बैठक का सारा जोर सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ प्रस्तावित विधेयक पर ही नजर आया। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने एनआइसी के इस एजेंडे पर आश्चर्य भी जताया। उन्होंने कहा कि फिलहाल देश के सामने मुद्दा आतंकवाद और नक्सलवाद है। सांप्रदायिक हिंसा विधेयक इस समय प्रासंगिक नहीं है। वैसे खुद प्रधानमंत्री ने भी अपने समापन भाषण में माना कि देश में सांप्रदायिक माहौल में सुधार हुआ है। इससे पहले आतंकी हमलों के ग्राफ में हुई ताजा बढ़ोतरी के बीच करीब तीन साल बाद बुलाई गई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में पीएम ने आतंकवाद और नक्सलवाद को देश के आगे सबसे बड़ी चुनौती बताया। साथ ही सभी जांच एजेंसियों से पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निरपेक्ष जांच की वकालत की। दिल्ली बम धमाके का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इसने बता दिया है हम अपने निगरानी और चौकसी तंत्र में जरा भी ढील नहीं दे सकते। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ खुफिया तंत्र की कमजोरियां दूर करने की भी बात की। वैसे 26/11 के मुंबई आतंकी हमले से पहले 13 अक्टूबर 2008 को हुई बैठक में प्रधानमंत्री के शब्द थे कि आतंकी संगठनों के संबंध में बेहतर खुफिया सूचना तंत्र की जरूरत है साथ ही जांच के तौर-तरीकों में भी सुधार जरूरी है। आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों के मुकाबले सरकारी कोशिशों की फेहरिस्त में प्रधानमंत्री ने बीते दो साल से जारी नेटग्रिड बनाने की कोशिश, तटीय सुरक्षा मजबूत करने के उपाय, केंद्रीय पुलिस बलों को कंप्यूटर नेटवर्क से जोड़ने की चल रही कवायद जैसे इंतजामों का ब्योरा ही गिनाया। प्रधानमंत्री ने इस बात पर संतोष जताया कि देश में सांप्रदायिक माहौल बीते कुछ सालों में बेहतर हुआ है, लेकिन आतंकवाद से जुड़े मामलों की पड़ताल में जांच एजेंसियों को एक बार फिर सावधानी बरतने की नसीहत दी। मनमोहन के अनुसार किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की जांच के दौरान अल्पसंख्यक वर्ग को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। यह मसला 2005 और 2008 में राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में दिए प्रधानमंत्री के भाषण का भी हिस्सा था। नक्सलवाद की चुनौती के मोर्चे पर भी प्रधानमंत्री ने हिंसा के साथ सख्ती से निपटने और प्रभावित इलाकों की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद और नक्सलवाद की चुनौती के मुकाबले में केंद्र और राज्य ही नहीं सूबों के बीच भी बेहतर आपसी तालमेल पर जोर दिया
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