नई दिल्ली बीते साढ़े तीन महीनों के दौरान देश की राजधानी दिल्ली और आर्थिक नगरी मुंबई में बम धमाकों की तीन वारदातों ने आंतरिक सुरक्षा में चुस्ती के दावों को धो दिया है। गृह मंत्रालय में पी चिदंबरम की आमद के बाद तस्वीर बदलने की कोशिश और चुस्त इंतजामी को प्रधानमंत्री ने भी सराहा था। लेकिन, हालिया पांच धमाकों से गृह मंत्रालय फिर कमजोर लगने लगा है। आतंक को लेकर गृह मंत्रालय की कमजोरी पहले भी चर्चित रही है। मुंबई पर आतंकी हमले (26/11) के बाद सक्रियता से आतंक के हमले कुछ शांत हुए थे और गृह मंत्रालय का इकबाल दिखना शुरू हुआ था। यह इकबाल अब दरकने लगा है। आज के धमाकों के बाद गृह मंत्री का संसद में बयान उनकी विवशता प्रमाणित कर रहा था। गृह मंत्री के बयान का मतलब यह था कि तमाम कोशिशों के बावजूद धमाके रुक नहीं रहे हैं। बीते साढ़े तीन महीने में पांच धमाके और कई निर्दोष लोगों की मौत के बावजूद सरकार के पास जांच की कोई बड़ी सफलता भी नहीं है। एक दशक बाद संसद सत्र के दौरान राजधानी में हुए हमले का झटका सदन में भी महसूस हुआ। सदन की बैठक शुरू होने से कुछ देर पहले संसद से थोड़ी दूरी पर हुए इस धमाके पर गृहमंत्री की सफाई को लेकर अड़े विपक्ष ने सदन नहीं चलने दिया। हालांकि, गृहमंत्री की ओर से आए बयान के बाद दोनों सदनों में सभी दलों ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के संकल्प में सरकार साथ एकता जताई। लेकिन लाजिमी तौर पर आतंकी हमले के खिलाफ गुस्से और सुरक्षा तंत्र की नाकामी के सवालों का निशाना गृह मंत्री ही थे। संसद के गलियारों में चर्चा तैरती रही कि सियासी प्रबंधन के कामों में गृहमंत्री पी चिदंबरम व्यस्तता का असर आंतरिक सुरक्षा तंत्र पर दिख रहा है। बीते बीते कई हफ्तों के दौरान गृह मंत्रालय ने अन्ना के अनशन और बाबा रामदेव के आंदोलन को साधने के काफी वक्त लगाया है। धमाकों के बाद सपा के महासचिव मोहन सिंह का कहना था कि देश में सरकार का इकबाल खत्म हो गया है।
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