Monday, September 19, 2011

कश्मीरी नेताओं का मिजाज

एक सप्ताह के अंतराल में नेशनल कांफ्रेंस के सबसे महत्वपूर्ण नेता ने दो बयान दिए। पहला बयान संसद पर आतंकी हमले के दोषी मोहम्मद अफजल के प्रति नरमी बरतने की मांग और इसके लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पास करने की कल्पना पर था। इससे प्रेरित होकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में एक विधायक वैसा प्रस्ताव ला भी चुका है। दूसरे बयान में दिल्ली हाईकोर्ट विस्फोट का दोषी सुरक्षा एजेंसियों को ठहराया गया है कि उनकी लापरवाही से यह हुआ। इन बयानों से कश्मीरी मुस्लिम नेताओं की मानसिकता स्पष्ट हो जाती है। जिस मोहम्मद अफजल के पक्ष में कश्मीरी नेता सुरक्षा बलों के विरुद्ध बंद, जुलूस आयोजित करते रहते हैं वह एक दोषसिद्ध आतंकवादी है। वह यहां तक कह चुका है कि उसे अपने किए का कोई पछतावा नहीं और मौका मिला तो वह फिर यही करेगा। इन दो बयानों का अर्थ यह है कि मुस्लिमों, विशेषकर कश्मीरी मुस्लिमों के जघन्य से जघन्य अपराध का कोई नोटिस न लिया जाए। यह है कश्मीरी मुस्लिम मानसिकता, क्योंकि नेशनल कांफ्रेंस उसी की उदार प्रतिनिधि है। यदि उदार चिंतन ऐसा है तो बाकी कश्मीरी नेताओं के मिजाज का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस विशेषाधिकारी मानसिकता को समझे बिना कश्मीर पर सम्यक नीति नहीं बन सकती। विस्थापित कश्मीरी कवि कुंदनलाल चौधरी की एक कविता माई क्लीनिक एट छोटा बाजार में इस मानसिकता की झलक मिलती है कि कैसे 1980 के दशक के अंत में कश्मीर से हिंदुओं को मार भगाने की नीति सफल हुई। तब राज्य प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए पीडि़त हिंदुओं की ओर से ही माफी मांगने की नीति पर चल रहा था। भारत के जो नीति-निर्माता, पत्रकार और बुद्धिजीवी कश्मीरी जनता की उचित शिकायतों का रोना रोते या विकास आदि की चिंता करते हैं उनके लिए इस प्रसंग में गहरी सीख है। कश्मीरी मुस्लिमों को किसी विकास से मतलब नहीं है। इसी बड़े नेता ने कुछ महीने पहले ही यह बयान भी दिया था कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की आकांक्षा केवल विकास, अच्छा प्रशासन और आर्थिक लाभों से नहीं संतुष्ट हो सकती। उसे एक राजनीतिक समाधान चाहिए। अत: कश्मीरियों को आर्थिक, प्रशासनिक गड़बड़ी आदि की समस्या नहीं है। लंबे समय से शेष भारत द्वारा उन्हें निरंतर दिया जा रहा अति-उदार आर्थिक अनुदान और विविध विशेष सुविधाओं का पूरा ढेर उनके लिए पर्याप्त नहीं है। तब उन्हें क्या चाहिए? इसका जवाब है-अधिक स्वायत्तता। जान पड़ता है कि उन्हें कितना भी विशेष अधिकार दे दिया जाए, वे हमेशा यही कहेंगे कि उन्हें इच्छित स्वायत्तता हासिल नहीं है। यद्यपि वे कभी नहीं बताते कि भारतीय संविधान की किस धारा से उनकी किसी भी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक इच्छा पर बाधा आती है? तब और स्वायत्तता के लिए उन्हें क्या चाहिए? इसका संकेत देते हुए उक्त नेता ने अपने उसी बयान में आगे कहा था, मैं स्वायत्तता से भी आगे बढ़ने से नहीं कतराता, यदि कोई और समाधान भारत और पाकिस्तान, दोनों को मंजूर हो तथा जम्मू और कश्मीर के लोगों की आकांक्षा के अनुरूप हो। यह कुछ विचित्र है। इसमें एक असंभव बात रखी गई है। पाकिस्तान कश्मीर को हड़पना चाहता है। क्या यही कश्मीरियों की आकांक्षा है? बिलकुल नहीं! वे पाकिस्तान का अंग होने का अर्थ अच्छी तरह जानते हैं। पिछले दो-तीन दशक के पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जिहादी अनुभव से स्पष्ट है कि पाकिस्तान का अंग बनते ही कश्मीर को कंधार की तरह उजाड़ होने में अधिक देर नहीं लगेगी। इसीलिए यूरोपीय एजेंसियों द्वारा कराए गए विभिन्न जनमत-संग्रहों में यह बात सामने आई है कि कश्मीरी जनता पाकिस्तान में मिलना नहीं चाहती। हुर्रियत तथा आतंकवादी गिरोहों से जुड़े कुछ कश्मीरी ही पाकिस्तान से मिलना चाहते हैं। चाहे कश्मीरी मुसलमान पाकिस्तान के साथ मिलना नहीं चाहते, पर वे भारत पर धौंस जमाना चाहते हैं कि उनके पास विकल्प है। इस प्रकार, एक स्थायी शिकायती मुद्रा अपना कर वे भारत का अधिकाधिक दोहन करते रहना चाहते हैं। इसी कारण जब कश्मीर में अधिक समय तक शांति रहती है तो स्वयं कश्मीरी नेताओं को चिंता होने लगती है! किसी न किसी बहाने वे माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। नेशनल कांफ्रेंस या पीडीपी के बयानों, क्रियाकलापों को इस रूप में भी देखना चाहिए। और स्वायत्तता, जनमत-संग्रह या दोहरी संप्रभुता जैसे शिगूफे इसीलिए छोड़े जाते हैं। अभी अफजल को सजामुक्त करने का शिगूफा उसी की नई कड़ी है। संभवत: कश्मीर में थोड़ी-बहुत अशांति बने रहना कश्मीरी मुस्लिम नेताओं को अपनी राजनीतिक जरूरत लगती है। ताकि वे सुरक्षा बलों पर आरोप लगाते रह सकें, ताकि वे नई दिल्ली से मनमानी मांग कर सकें, ताकि स्वयं उनसे कोई किसी बात का हिसाब न मांगे-न स्थानीय जनता, न शेष भारत। जम्मू और लद्दाख कश्मीरी मुसलमानों की अहंमन्यता और शोषण का शिकार रहे हैं। ये भारत का पूर्ण अंग बन कर रहना चाहते हैं। अत: इन क्षेत्रों को स्वायत्त क्षेत्र या केंद्र शासित प्रदेश बनाकर कश्मीर में एक बड़े वर्ग द्वारा दिखाई जा रही अहंमन्यता और लूट पर लगाम लगाई जा सकती है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं

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