Thursday, September 8, 2011

पिछले धमाके से नहीं लिया सबक


नई दिल्ली बीते 25 मई को दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर गेट नंबर सात के पास स्थित वकीलों की पार्किंग में खड़ी एक कार के पास बम धमाका होने के बावजूद वहां की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी नहीं की जा सकी। पिछली घटना के बावजूद न तो दिल्ली हाईकोर्ट व न ही दिल्ली पुलिस ने कोई सबक लिया। नतीजा साढे़ तीन महीने के अंदर हाईकोर्ट के बाहर दूसरा धमाका हुआ। जिसमें 11 बेगुनाहों की जानें चली गई और 73 लोग घायल हैं। प्रतिदिन वकीलों, कोर्ट कर्मियों, मुविक्कलों व अन्य लोगों को मिलाकर करीब साढ़े तीन से चार हजार लोग रोज हाईकोर्ट परिसर में आते हैं। जिनकी सुरक्षा मात्र दो सौ पुलिसकर्मियों के भरोसे है। जबकि जनहित याचिका वाले दिन तो यह संख्या बढ़कर पांच हजार तक हो जाती है। ऐसे में सुरक्षा में तैनात कर्मी अंदर जाने वालों की चेकिंग करेंगे या बाहर के लोगों पर निगरानी रखेंगे। सवाल हाईकोर्ट के बाहर सिर्फ सीसीटीवी कैमरे लगाने की ही नहीं है। बल्कि सिस्टम में व्यापक बदलाव लाने की भी जरूरत है तभी हाईकोर्ट को आतंकी हमले से बचाया जा सकता है। जहां दिल्ली बार काउंसिल के चेयरमैन राकेश टिक्कू सीसीटीवी न लगाने के लिए पुलिस के सिर पर ठिकरा फोड़ रहे है वही पुलिस अधिकारियों का कहना है कि हाईकोर्ट के अंदर व बाहर सीसीटीवी कैमरे लगवाने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है। कोर्ट बिल्डिंग के अंदर व बाहर तो जगह-जगह कैमरे लगे हैं। वहां सुरक्षा चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं है। परंतु कोर्ट के चारों तरफ गेटों के बाहर एक भी कैमरा नहीं लगा है।


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