देश की राजधानी दिल्ली को आतंकवादियों ने एक बार और निशाना बनाया तथा अति संवेदनशील इलाके में स्थित दिल्ली हाईकोर्ट में बम विस्फोट की घटना को अंजाम देकर साबित कर दिया कि वे न केवल ऐसी वारदात करने में सक्षम हैं, बल्कि सरकार की तमाम कोशिशों और सुरक्षा तैयारियों को धता बताने में समर्थ भी हैं। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष 25 मई, 2011 को भी दिल्ली हाईकोर्ट में बम विस्फोट हुआ था, लेकिन इससे कोई सबक नहीं लिया गया। इसका पता इस बात से भी लगता है कि विस्फोट वाले स्थान पर न तो सीसीटीवी कैमरे लगे थे और न ही वहां सुरक्षा व्यवस्था के लिए जरूरी मेटल डिटेक्टर जैसी व्यवस्था की गई थी। यदि कोई सबक लिया जाता तो शायद ऐसी घटना को दोबारा होने से रोका जा सकता था। बम विस्फोट की इस घटना से साफ है कि सुरक्षा ढांचे की जो कमजोरियां पहले थीं उनमें कोई सुधार नहीं हुआ है। हां, सरकार ने इतना अवश्य किया है कि कुछ नए विभाग, नई जांच एजेंसी और गाडि़यों आदि की व्यवस्था कर दी है, लेकिन यह महज दिखावटी है। यदि ऐसा नहीं होता तो जमीनी स्तर पर इसका असर अवश्य दिखता अथवा जांच व निगरानी की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव आता। ताजा बम विस्फोट की घटना हमारी सुरक्षा व्यवस्था की विफलता है। दिल्ली हाईकोर्ट के अंदर व बाहर की सुरक्षा तैयारियां इसका प्रमाण देती हैं। इस संदर्भ में यदि हम ऑटो रिक्शा की ही बात करें तो पिछले पचास वर्षो से इनमें अपनाई जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। हालांकि, इसके लिए समय-समय पर सरकार ने कदम उठाने के वादे अवश्य किए हैं। इस विफलता का प्रमुख कारण है हमारी कार्य संस्कृति में सुरक्षा के प्रति गंभीरता का न होना। यदि दुनिया के दूसरे देशों में सुरक्षा निगरानी बढ़ाकर आतंकी हमलों को लगभग खत्म किया जा सकता है तो यह काम भारत में क्यों नहीं हो सकता? हम आइटी मामलों में दुनिया की महाशक्ति का दर्जा रखते हैं, लेकिन बात जब सुरक्षा की आती है तो इनका कहीं कोई प्रभावी इस्तेमाल नहीं दिखता। जहां तक बम विस्फोटों में किसी संगठन अथवा देश की संलिप्तता सवाल है तो फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस बारे में अभी तक कोई सुबूत नहीं मिले हैं। हालांकि हूजी ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है, लेकिन बिना सुबूत के किसी संगठन विशेष का हाथ मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। जहां तक पाकिस्तान की बात है तो उस पर भी अभी उंगली उठाना ठीक नहीं होगा। इस समय हमारा देश एक तरह के छाया युद्ध की चुनौती से जूझ रहा है। मई 1999 के बाद पिछले 11 वर्षो से देश में हो रहे हमलों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। फिर चाहे वह 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर किया गया हमला हो अथवा मुंबई समेत देश के विभिन्न शहरों में विस्फोट की घटनाएं। ये हमले लगातार इसलिए हो पा रहे हैं, क्योंकि अभी तक राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने के लिए किसी सुस्पष्ट तंत्र का विकास नहीं किया जा सका है और न ही इन हमलों का प्रत्युत्तर दिया गया है। सवाल यह नहीं है कि इन हमलों के पीछे हूजी है, लश्करे तैयबा है अथवा कोई अन्य संगठन, बल्कि बड़ा बिंदु इनके सफल होने की परिस्थितियों व हमारी कमजोरियों का है। वास्तविकता यही है कि हमारी सरकार में दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। मुंबई में 1993, नवंबर 2008 और जुलाई 2011 के बाद अब दिल्ली में बम विस्फोट की घटना के बाद यही देखने को मिल रहा है कि नेताओं, बुद्धिजीवियों और दूसरे संगठनों की तरफ से तत्काल प्रतिक्रिया आनी शुरू हो जाती है, लेकिन इन घटनाओं को रोका कैसे जाए इस पर शायद ही चर्चा की जाती है। एक बात अब और साफ है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद देश की जनता में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ा है। यही कारण है कि राहुल गांधी जब घायलों को देखने राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे तो लोगों को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने उनके खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया। इन बातों पर संसद और सांसदों को विचार करने की आवश्यकता है। देश में होने वाली बार-बार की आतंकवादी घटनाओं से मुझे बरबस ही सोमनाथ की याद आ जाती है। मोहम्मद गजनी ने सोमनाथ पर विजय पाने के लिए कुल 27 बार हमले किए और अंतत: वह कामयाब रहा, क्योंकि तत्कालीन राजाओं के पास स्थायी रूप से संगठित और प्रशिक्षित सेना का अभाव था। इसके अलावा आज की तरह भ्रष्टाचार का बोलबाला था और धन के लालच में लोग गद्दारी करने से भी नहीं चूकते थे। इन्हीं सब का सम्मिलित प्रभाव था कि गजनी को सोमनाथ पर जीत मिली। आज भी स्थिति कुछ वैसी ही बनती दिख रही है। राजनेताओं में स्पष्ट लक्ष्य का अभाव है और राजनीतिक दृढ़ता नहीं है। समाज व देश में भ्रष्टाचार व धन का लोभ बढ़ रहा है। आज हर कहीं क्रिकेट, सिनेमा व भ्रष्टाचार की तो चर्चा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीयता की चिंता नदारद है। संसद पर हमले के बावजूद आज तक संसद में राजनेताओं द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा पर कभी गंभीर चर्चा नहीं हुई। यहां इस बात पर भी विचार किया जाना जरूरी है कि आतंकवादियों द्वारा अभी तक दिल्ली, मुंबई, बेंगलूर जैसै बड़े शहरों को ही निशाना बनाया गया है। अमेरिका में 9/11 की घटना के बाद जीरो टोलरेंस की नीति के तहत सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई, जिसका परिणाम है कि इस घटना के बाद वहां कोई आतंकी वारदात नहीं हुई। भारत में आंतरिक और गृह सुरक्षा पर विशेष काम करने की जरूरत है। यूरोप और अमेरिका में पिछले 20 वर्षाे में सुरक्षा पर काफी काम किया गया है। इस अनुभव का लाभ भारत भी उठा सकता है, लेकिन इस बारे में अभी तक कोई विचार ही नहीं किया गया। आतंकवाद से लड़ने के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते रहने के बावजूद हम अभी तक सुरक्षित शहर का कोई मॉडल विकसित नहीं कर सके हैं। हमारी हुकूमत बहरी होने के साथ-साथ अंधी भी है। आज भ्रष्टाचार की तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर भी जागरूक होने की आवश्यकता है। संसद और न्यायपालिका हमारे लिए प्रतीकात्मक रूप से काफी अहम हैं। इन संस्थानों पर हमले का अर्थ है हमारे लोकतंत्र पर हमला। जिस तरह आतंकी इन्हें आसान लक्ष्य के रूप में चुन रहे हैं वह पूरे देश के लिए चिंता की बात है। हमें समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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