पिछले दिनों करजई ने कहा था अमेरिका और अन्य विदेशी सेनाएं तालिबान से बात कर रही हैं और बातचीत अच्छी है। अब तक तालिबान का औपचारिक रुख यही रहा है कि वह शांति वार्ता में तभी शामिल होंगे, जब अंतरराष्ट्रीय सेनाएं अफगानिस्तान छोड़ देंगी। बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में चरमपंथी संगठन तालिबान एक बार फिर अफगानिस्तान में बड़ा खतरा बनकर उभरा है।..फ-पाक के मौजूदा हालात यह बयां कर रहे हैं कि यदि अमेरिका खुलकर इनके साथ नहीं आता है तो वहां के चरमपंथियों के मंसूबे चरम पर ही रहेंगे। चरमपंथियों को तकलीफ इसी बात की है कि अमेरिका इनकी मदद क्यों कर रहा है और ये देश अमेरिका के तलवे चाटने को विवश क्यों हैं? इस स्थिति में यदि इन दोनों देशों के अस्तित्व को कायम रखना है तो अमेरिका या तो इनसे दूर ही हो जाए, या फिर इनकी हर चुनौती का सामना खुद करे। अन्यथा कहानी लगातार बिगड़ती जाएगी और तालिबान अमेरिका के विरुद्ध अपनी आतंकी जंग जारी रखेंगे- चाहे वे नेस्तनाबूद ही क्यों न हो जाएं। 28-29 जून की रात काबुल के होटल इंटरकांटिनेंटल में जो कुछ भी हुआ, उससे मुम्बई के ‘26/11’ कांड की याद ताजा हो गई। साथ ही यह संदेश भी गया कि चरमपंथी किसी से भी डरने वाले नहीं हैं। वे अपना काम करते रहेंगे, चाहे उनके सीने को कितनी भी गोलियां छलनी क्यों न कर दें।
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए इस हमले में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई और इस हमले की जिम्मेदारी लेने में तालिबान ने जरा भी देर नहीं की। यह वही तालिबान है, जिसका संरक्षक अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन हुआ करता था। बताते हैं कि यह हमला होटल के मुख्य प्रवेश द्वार पर आत्मघाती हमले के साथ शुरू हुआ था। उसके बाद नाटो ने हेलीकॉप्टर से होटल की छत पर कथित हमलावरों को मारा। इसी बीच खबरें आईं कि एक आत्मघाती हमलावर ने होटल के भीतर खुद को उड़ा दिया है। उस घटना में दो पुलिसकर्मी और स्पेन का एक यात्री मारा गया। जिस तरह से यह हमला हुआ है, यह पूरी तरह सुनियोजित जैसा प्रतीत हो रहा है। यह हमला दिखाता है कि अफगान सुरक्षा बलों को अब भी नाटो और सहयोगी देशों के सैनिकों की मदद की कितनी जरूरत है। क्योंकि चरमपंथी कड़ी सुरक्षा वाले इलाकों में भी घुसने का प्रयास कर रहे हैं। बताते हैं कि एक हमलावर 28 जून की रात को हुई लड़ाई के बाद होटल में कहीं छुपा हुआ था और उसने अपनी कमर से बंधी विस्फोटक बेल्ट से धमाका कर दिया। तबतक यही समझा गया था कि सुरक्षा बलों के साथ पांच घंटे तक चली भीषण लड़ाई में होटल में मौजूद सभी हमलावर मारे जा चुके हैं और कोई हमलावर नहीं बचा है, लेकिन सुबह हुए इस विस्फोट से सभी हैरान रह गए। पुलिस प्रमुख मानते हैं कि उनका बख्तरबंद वाहन भी इस गोलीबारी में क्षतिग्रस्त हुआ है। इससे पता चलता है कि लड़ाई कितनी भीषण थी। दरअसल, इसी होटल में 29 जून को एक बैठक होने वाली थी, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सेना के हाथों से सुरक्षा व्यवस्था अफगान सुरक्षा बलों को सौंपने पर चर्चा होनी थी। दिलचस्प यह भी है कि यह हमला ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता चल रही है और अमेरिका तालिबान को अफगानिस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सादार बनाना चाहता है।
वैसे तो पिछले कुछ समय से काबुल अपेक्षाकृत शांत ही रहा है, लेकिन पहली और दूसरी मई की रात अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद से अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों में हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले वर्ष 2008 में चरमपंथियों ने काबुल के सबसे लोकप्रिय होटल सेरेना पर हमला किया था, जिसमें आठ लोग मारे गए थे। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद क्या अफगानिस्तान की सेना तालिबान से मुकाबला कर सकती है, अब इसको लेकर चर्चा जारी है। इस संबंध में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि जुलाई महीने से अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी सैनिकों की वापसी की शुरुआत हो जाएगी। ओबामा ने यह भी कहा कि अगले साल सितंबर तक 33 हजार सैनिकों की वापसी होगी। इसकी शुरुआत इसी जुलाई महीने से होगी और इस साल के अंत तक दस हजार सैनिक अमेरिका लौट जाएंगे। गौरतजब है कि इस समय एक लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात हैं और 2014 तक सभी सैनिकों की वापसी की योजना है। माना जा रहा है कि तब तक अफगान सेना देश की सुरक्षा के लिए तैयार हो जाएगी। ओबामा का कहना था कि सितंबर 2001 में हुए हमले के बाद से अब तक के समय में अलकायदा इस वक्त सबसे ज्यादा दबाव में है। हमलोगों ने अलकायदा के आधे से ज्यादा नेताओं को मार दिया है। अफगानिस्तान में तालिबान को भारी क्षति पहुंचाई है। जबकि अमेरीकी सैन्य कमांडर जनरल डेविड पैट्रियस ने ओबामा के सैन्य वापसी के फैसले पर सुझाव दिया है कि शुरुआत में बहुत थोड़े से सैनिकों को वापस बुलाया जाए और ज्यादा से ज्यादा सैनिकों को वहीं रखा जाए। ओबामा का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही दिन पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि अमेरिका, अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान से बातचीत कर रहा है। वहीं अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि उनकी सेना देश को सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है।
इसी बीच पिछले दिनों करजई ने कहा था अमेरिका और अन्य विदेशी सेनाएं तालिबान से बात कर रही हैं और बातचीत अच्छी है। अब तक तालिबान का औपचारिक रुख यही रहा है कि वह शांति वार्ता में तभी शामिल होंगे, जब अंतरराष्ट्रीय सेनाएं अफगानिस्तान छोड़ देंगी। बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में चरमपंथी संगठन तालिबान एक बार फिर अफगानिस्तान में बड़ा खतरा बनकर उभरा है। याद रहे कि तालिबान का उदय 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में तब हुआ था, जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना वापस जा रही थी।
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए इस हमले में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई और इस हमले की जिम्मेदारी लेने में तालिबान ने जरा भी देर नहीं की। यह वही तालिबान है, जिसका संरक्षक अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन हुआ करता था। बताते हैं कि यह हमला होटल के मुख्य प्रवेश द्वार पर आत्मघाती हमले के साथ शुरू हुआ था। उसके बाद नाटो ने हेलीकॉप्टर से होटल की छत पर कथित हमलावरों को मारा। इसी बीच खबरें आईं कि एक आत्मघाती हमलावर ने होटल के भीतर खुद को उड़ा दिया है। उस घटना में दो पुलिसकर्मी और स्पेन का एक यात्री मारा गया। जिस तरह से यह हमला हुआ है, यह पूरी तरह सुनियोजित जैसा प्रतीत हो रहा है। यह हमला दिखाता है कि अफगान सुरक्षा बलों को अब भी नाटो और सहयोगी देशों के सैनिकों की मदद की कितनी जरूरत है। क्योंकि चरमपंथी कड़ी सुरक्षा वाले इलाकों में भी घुसने का प्रयास कर रहे हैं। बताते हैं कि एक हमलावर 28 जून की रात को हुई लड़ाई के बाद होटल में कहीं छुपा हुआ था और उसने अपनी कमर से बंधी विस्फोटक बेल्ट से धमाका कर दिया। तबतक यही समझा गया था कि सुरक्षा बलों के साथ पांच घंटे तक चली भीषण लड़ाई में होटल में मौजूद सभी हमलावर मारे जा चुके हैं और कोई हमलावर नहीं बचा है, लेकिन सुबह हुए इस विस्फोट से सभी हैरान रह गए। पुलिस प्रमुख मानते हैं कि उनका बख्तरबंद वाहन भी इस गोलीबारी में क्षतिग्रस्त हुआ है। इससे पता चलता है कि लड़ाई कितनी भीषण थी। दरअसल, इसी होटल में 29 जून को एक बैठक होने वाली थी, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सेना के हाथों से सुरक्षा व्यवस्था अफगान सुरक्षा बलों को सौंपने पर चर्चा होनी थी। दिलचस्प यह भी है कि यह हमला ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता चल रही है और अमेरिका तालिबान को अफगानिस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सादार बनाना चाहता है।
वैसे तो पिछले कुछ समय से काबुल अपेक्षाकृत शांत ही रहा है, लेकिन पहली और दूसरी मई की रात अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद से अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों में हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले वर्ष 2008 में चरमपंथियों ने काबुल के सबसे लोकप्रिय होटल सेरेना पर हमला किया था, जिसमें आठ लोग मारे गए थे। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद क्या अफगानिस्तान की सेना तालिबान से मुकाबला कर सकती है, अब इसको लेकर चर्चा जारी है। इस संबंध में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि जुलाई महीने से अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी सैनिकों की वापसी की शुरुआत हो जाएगी। ओबामा ने यह भी कहा कि अगले साल सितंबर तक 33 हजार सैनिकों की वापसी होगी। इसकी शुरुआत इसी जुलाई महीने से होगी और इस साल के अंत तक दस हजार सैनिक अमेरिका लौट जाएंगे। गौरतजब है कि इस समय एक लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात हैं और 2014 तक सभी सैनिकों की वापसी की योजना है। माना जा रहा है कि तब तक अफगान सेना देश की सुरक्षा के लिए तैयार हो जाएगी। ओबामा का कहना था कि सितंबर 2001 में हुए हमले के बाद से अब तक के समय में अलकायदा इस वक्त सबसे ज्यादा दबाव में है। हमलोगों ने अलकायदा के आधे से ज्यादा नेताओं को मार दिया है। अफगानिस्तान में तालिबान को भारी क्षति पहुंचाई है। जबकि अमेरीकी सैन्य कमांडर जनरल डेविड पैट्रियस ने ओबामा के सैन्य वापसी के फैसले पर सुझाव दिया है कि शुरुआत में बहुत थोड़े से सैनिकों को वापस बुलाया जाए और ज्यादा से ज्यादा सैनिकों को वहीं रखा जाए। ओबामा का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही दिन पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि अमेरिका, अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान से बातचीत कर रहा है। वहीं अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि उनकी सेना देश को सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है।
इसी बीच पिछले दिनों करजई ने कहा था अमेरिका और अन्य विदेशी सेनाएं तालिबान से बात कर रही हैं और बातचीत अच्छी है। अब तक तालिबान का औपचारिक रुख यही रहा है कि वह शांति वार्ता में तभी शामिल होंगे, जब अंतरराष्ट्रीय सेनाएं अफगानिस्तान छोड़ देंगी। बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में चरमपंथी संगठन तालिबान एक बार फिर अफगानिस्तान में बड़ा खतरा बनकर उभरा है। याद रहे कि तालिबान का उदय 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में तब हुआ था, जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना वापस जा रही थी।
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