Monday, July 18, 2011

नक्सलवाद की समस्या के विभिन्न पहलुओं पर जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह

आतंकवाद से भी ज्यादा गंभीर साबित हो रही नक्सलवाद की समस्या से सबसे बड़ी लड़ाई छत्तीसगढ़ में लड़ी जा रही है। राज्य के 40 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में नक्सलियों की समानांतर सत्ता होने के बावजूद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह संघर्ष छेड़े हुए हैं। उनका कहना है कि जब तक केंद्र में लंबी अवधि की योजना नहीं बनेगी और एकमुश्त मदद नहीं मिलेगी, प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। उनका कहना है कि यह केवल आर्थिक व सामाजिक समस्या नही है, क्योंकि नक्सली विकास के सबसे बड़े विरोधी हैं। रमन सिंह से रामनारायण श्रीवास्तव ने इस समस्या के विभिन्न पहलुओं पर खुलकर चर्चा की। प्रस्तुत हैं उनसे चर्चा के प्रमुख अंश : सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुड़ूम व एसपीओ पर रोक लगाने का फैसला दिया है, क्या यह राज्य सरकार को झटका नहीं है? जो फैसला आया है उसमें कहा गया है कि एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) को जो हथियार दिए गए हैं वे वापस लिए जाएं और उन्हें दूसरे कामों पर लगाया जाए। सरकार ने स्थानीय लोगों की और उनकी खुद की सुरक्षा के लिए बंदूक दी थी। इस फैसले के बाद उनको खतरा है। जहां तक उनका प्रशिक्षण कम होने की बात है तो उन्हें और प्रशिक्षण दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने छह सप्ताह का समय दिया है। हमने काम शुरू कर दिया है। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार के लिए जाएंगे। आखिरकार 40-50 हजार एसपीओ का सवाल है। इनको हम मुख्य पुलिस बल में लेते रहते हैं। पहले भी लिया है, आगे भी लेंगे। क्या इस फैसले से सरकार के नक्सल विरोधी अभियान पर प्रभाव पड़ेगा? हम इस काम को 7-8 साल से आगे बढ़ा रहे हैं। उस पर फर्क नहीं पड़ेगा। एसपीओ पर जो फैसला आया है उसे तो हम ठीक कर लेंगे। यह अभियान छत्तीसगढ़ का नहीं, पूरे देश का है। इस लड़ाई को हमारे केंद्रीय पुलिस बल, राज्य पुलिस सभी मिलकर लड़ रहे है। हम उन्हें अच्छे शस्त्र दे रहे हैं। पुलिस के आधुनिकीकरण पर भी काफी राशि खर्च कर रहे हैं। समस्या यह है कि 40 हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है। अंतरराज्यीय सीमा है। एक वीरप्पन के लिए तीन राज्यों की पुलिस 12 साल लगी रही, तब जाकर मार गिराया। यहां तो हजारों की संख्या है। इसलिए बहुत सावधानी के साथ समन्वित कार्ययोजना से काम करना होगा। हम लगातार नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे है। थाने बना रहे हैं, खोज अभियान चला रहे हैं। ऐसे में कुछ नुकसान तो होता ही है। फिर भी पुलिस का और स्थानीय लोगों का मनोबल अच्छा ही है। केंद्र सरकार इसे सामाजिक-आर्थिक समस्या कहती है, दूसरी तरफ सशस्त्र अभियान भी चलता है, ऐसे में किस तरह से प्रभावी कार्रवाई की जी सकती है? बस्तर में पिछले 30-40 सालों से नक्सली हैं। वहां पर गरीबी व पिछड़ेपन का मूल कारण भी नक्सली ही हैं। विकास की परिभाषा है कि वहां पर सड़कें बनें, स्कूल बनें, आंगनवाड़ी बने, बिजली हो, संचार व्यवस्था हो, लेकिन नक्सली सभी का विरोध करते हैं। वे विकास करने ही नहीं देना चाहते है। इस देश में विकास और लोकतंत्र के सबसे बड़े विरोधी कोई हैं तो वे नक्सली ही है। जब चीन में ही विकास के लिए माओवाद को किनारे किया जा रहा है, तब यहां पर कुछ लोग उस को लिए हुए अटके पड़े हैं। वे बंदूक की नोंक पर सत्ता हासिल करने चाहते हैं और छत्तीसगढ़ को 18वीं सदी में ले जाना चाहते हैं। राज्य में नक्सलवाद से निपटने के लिए क्या केंद्र से पूरा सहयोग मिल रहा है? जब हम नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं तो उसी तरह से काम भी होना चाहिए। बहुत सारे काम राज्य नहीं कर सकते हैं। उसके लिए केंद्र का सपोर्ट चाहिए। विकास के क्षेत्र में भी और सशस्त्र लड़ाई के लिए भी। पुलिस का निर्माण कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हुआ है। गुरिल्ला युद्ध अलग है, उसके लिए विशेष प्रशिक्षण जरूरी है। आइबी जो सूचना दे सकती है वह राज्य नहीं ला सकता है। इसके लिए सभी राज्यों को मदद दी जानी है। इसके जरिए ही हम खड़े हो सकते है। कानूनी लड़ाई में भी सभी राज्यों को मिल कर खड़ा होना पड़ेगा। इतनी ज्यादा पुलिस बलों की मौत हो रही है, आखिर खामी कहां है? सबसे ज्यादा मौत आइइडी बारूदी सुरंग से हो रही है। इससे निपटने के लिए जो तकनीक इजरायल व यूरोप के पास है उसे हमें लेना चाहिए। वह तकनीक न होने से हम नुकसान में रहते हैं। हेलीकाप्टर की मदद दूसरी बात है। उस बारे में पूरा सपोर्ट मिलना चाहिए। क्या केंद्रीय मदद पर्याप्त है और उससे प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सकती है? सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मदद टुकड़ों में मिलती है। इसके लिए दो तरह की कार्ययोजना होती है, लघु अवधि व दीर्घ अवधि। कई बार राज्य यह तय नहीं कर पाते हैं कि उसके लिए क्या जरूरी है। ऐसे में यह तय होना चाहिए कि किस राज्य को क्या चाहिए और कितनी अवधि के लिए चाहिए? जब मांगा तब देने और टुकड़ों-टुकड़ों में देने से काम नहीं चलेगा। इसलिए लंबी रणनीति के हिसाब से कार्ययोजना बननी चाहिए। यह समस्या अंतरराज्यीय है, ऐसे में क्या राज्यों की आपसी सूचनाएं प्रभावी है? सूचना तो मिलती है, लेकिन केवल सूचना मिलना ही काफी नहीं होता। इतना बड़ा क्षेत्र है, वहां तक जाने में समय लगता है। इसके अलावा बस्तर का जो क्षेत्र है वह पहाड़ी एरिया है। वहां पहुंचने में काफी समय लगता है और रास्ते में हमले के खतरे भी रहते हैं। आप एकीकृत कमान की मांग करते रहे हैं, लेकिन अभी तक क्यों नहीं बन पाई है? सरकार की इच्छाशक्ति का सवाल है। इसके लिए सभी राज्यों को लगना पड़ेगा। एक राज्य में दबाब बढ़ता है तो वे दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। जब तक सभी राज्यों में एक साथ मुहिम नहीं चलेगी, तब तक प्रभावी कार्रवाई मुश्किल होती है। सेना या वायुसेना का उपयोग किया जाना चाहिए? यह संभव नहीं है। सीधी लड़ाई तो है ही नहीं। बीते एक दशक में नक्सलियों को कितने क्षेत्र से पीछे खदेड़ा गया? इस तरह की लड़ाई में क्षेत्र की पहचान करना संभव नहीं है। एक क्षेत्र में दबाव बढ़ा तो वे दूसरे क्षेत्र में चले जाते हैं। किसी विशेष क्षेत्र को खाली कराना संभव नहीं है। जिले ही नहीं, राज्य भी बदल लेते हैं। विनायक सेन के मामले में आपका विरोध अभी भी जारी है? एक ही बात का विरोध है, जो पहले भी था और आज भी है। योजना आयोग की सलाहकार समिति में विनायक सेन का होना ठीक नहीं है। उन पर नक्सलियों के साथ मिले होने का मामला चल रहा है। हाईकोर्ट ने सजा दी है, सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी है। जमानत मिलना दोष मुक्त होना नहीं है।

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