पूर्वोत्तर प्रांतों में सक्रिय पांच आतंकी समूहों के एकीकरण के पीछे चीन का हाथ देख रहे हैं लेखक
हाल ही में पूर्वोत्तर प्रांतों में सक्रिय पांच आतंकी समूहों के एकीकरण की प्रक्रिया म्यांमार की धरती पर चीनी खुफिया विभाग के सौजन्य से संपन्न हुई। इस घटना ने एक बार फिर भारत को अस्थिर और खंडित करने के चीनी एजेंडे को रेखांकित किया है। दूसरी ओर जिस तरह भारतीय सत्ता अधिष्ठान चीन के साम्राज्यवादी व भारत विरोधी एजेंडे की अनदेखी करता आया है उससे सन बासठ के अपमानजनक अनुभव की पुनरावृत्ति का खतरा और बढ़ जाता है। पूर्वोत्तर प्रांतों में सक्रिय पांच आतंकी समूहों के एकीकरण में स्वतंत्र पूर्वोत्तर देश के सृजन का लक्ष्य निर्धारित किया गया। नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (एनएससीएन) के नेता एसएस खापलांग के नेतृत्व में उल्फा, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ बोडोलैंड, यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ऑफ कांगलेपाक आदि आतंकी संगठनों के नेताओं की इस बैठक में सीपीआई (माओवादी) के नेताओं के शामिल होने की भी खबर खुफिया एजेंसियों को है। स्वतंत्र संप्रभु पूर्वोत्तर देश के गठन की प्रेरणा के पीछे चीनी खुफिया अधिकारियों का हाथ है। पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों के साथ माओवादियों का मिलना सुरक्षा की दृष्टि से एक गंभीर खतरा है। परोक्ष रूप से चीन भारत को अस्थिर करने में जुटा है। भारत को हजार घाव दे कर उसे टुकड़ों में बांटना पाकिस्तान का घोषित एजेंडा है, किंतु इस घोषित एजेंडे को अमलीजामा पहनाना चीन की अघोषित नीति है। बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान में जिहादियों को प्रशिक्षण व ठिकाना उपलब्ध कराने के पीछे चीन का बड़ा हाथ है। भारत में सक्रिय उल्फा, नक्सली और माओवादियों के साथ इस्लामी अलगाववादियों को प्रशिक्षण व वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में पाकिस्तान के साथ चीन का भी योगदान है। भारत की दो हजार मील अंतरराष्ट्रीय सीमा चीन के साथ लगती है। आजादी से लेकर अब तक इस सीमा पर विवाद बरकरार है। चीन ने अक्साई चिन के 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर जहां अवैध कब्जा कर रखा है, वहीं वह अरुणाचल प्रदेश को भारत का अंग नहीं मानता। चीन तिब्बत से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को भी मोड़ने का प्रयास कर रहा है। साथ ही तिब्बत में चीन आधारभूत संरचनाओं का तेजी से विकास कर रहा है। चीन दशकों से इस दिशा में प्रयासरत है, किंतु सन 2008 में उसने पहली बार दुनिया को बताया कि वह जांगमू में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लगाने वाला है। यह क्षेत्र भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने की दृष्टि से संवेदनशील है, किंतु सामरिक हित होने के कारण इन खतरों की अनदेखी कर वहां 510 मेगावाट वाले पनबिजली प्रोजेक्ट पर काम जारी है। इसके अतिरिक्त तिब्बत और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत की घेराबंदी के लिए कई अन्य प्रोजेक्ट पर चीन तेजी से काम कर रहा है। सेटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि मध्य चीन के देलिंगा और दा कैदाम में कम से कम साठ ऐसे लांचिंग पैड विकसित किए गए हैं, जहां से उत्तरी भारत को निशाना बनाकर परमाणु मिसाइल दागी जा सकती हैं। चीन द्वारा विकसित डीएफ-31 मिसाइल की मारक क्षमता 11,200 किलोमीटर है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के बंदरगाहों में चीन ने अपने नौसैन्य अड्डे स्थापित कर रखे हैं। पाकिस्तान के ग्वादर में तैनात चीनी मिसाइलों की मारक क्षमता इतनी है कि मुंबई जैसे शहर उसकी जद में हैं। चीन न केवल सामरिक दृष्टि से भारत की घेराबंदी कर रहा है, बल्कि वह भारत के राजनीतिक प्रभुत्व को भी कुंद करने का प्रयास कर रहा है। श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान को भारी-भरकम वित्तीय सहायता देकर चीन उन्हें अपने पाले में करने की जुगत में है। यह अतिशयोक्ति नहीं कि चीन की हर चाल में आने वाले दो-तीन दशकों की रणनीति भरी होती है। नेपाल में चीन ने माओवादियों के सहयोग से एक ऐसा वर्ग पोषित किया है, जो घोर भारत विरोधी और चीनपरस्त है। भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए चीनी तकनीक से बने जाली नोटों की खेप पाकिस्तान से निरंतर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के औषध कारोबार को क्षति पहुंचाने के लिए चीन में नकली दवाइयां बनाई जा रही हैं और उन पर मेड इन इंडिया का लेबल लगाकर दूसरे देशों में बेचा जा रहा है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने पिछले साल केंद्र को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन इंच-इंच कर भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा कर रहा है। सीमा पर बड़े पैमाने पर बंकर आदि का निर्माण कार्य चल रहा है। लद्दाख और उत्तराखंड में भारतीय थल और नभ सीमा का बारंबार अतिक्रमण वस्तुत: 1962 में भारत की पीठ में छुरा घोंपने वाले चीन की विस्तारवादी मंशा को ही रेखांकित करता है। चीनी सैनिकों द्वारा किए जाने वाले भारतीय सीमा के अतिक्रमण को वर्तमान सत्ता अधिष्ठान सामान्य घटना बताता है, जबकि तिब्बत और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में युद्धस्तर पर आधारभूत संरचनाओं का विकास कर चीन हमारी देहरी तक चढ़ आया है। पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों के साथ माओवादियों की साठगांठ नई बात नहीं है। दिसंबर, 2010 में पश्चिम बंगाल सीपीआई(माओ) के राज्य सचिव सुदीप चोंगदार की गिरफ्तारी के बाद ही इसका खुलासा हुआ था कि पीएलए के माध्यम से माओवादियों को भारी मात्रा में गोलाबारूद और हथियार मिल रहे हैं। इस खुलासे के बावजूद केंद्र सरकार इन अलगाववादी संगठनों पर लगाम कसने के बजाय उनसे मैत्री वार्ता करने को लालायित रही है। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि अलग-अलग कारणों से भारत को अस्थिर व खंडित करने में लगे संगठन-वे चाहे इस्लामी संगठन हों या विदेशी वित्त से पोषित चर्च का एक भाग या स्थानीय कारणों से उल्फा जैसे पूर्वोत्तर के आतंकी संगठन; उन सबको एक कड़ी में जोड़ने, उनके बीच बेहतर समन्वय कायम करने और उन्हें सैन्य व वैचारिक अस्त्र उपलब्ध कराने के पीछे चीन का हाथ है। भारत को भीतर से कमजोर व अस्थिर करना चीन का एजेंडा है। म्यांमार का यह दावा कि वह अपनी जमीन का दुरुपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा, झूठा साबित हुआ है। पश्चिमी देश लोकतंत्र के दमन के लिए जहां म्यांमार के घोर आलोचक हैं, वहीं चीन हर कदम पर उसके साथ खड़ा है। म्यांमार में पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठनों का मिलनोत्सव वस्तुत: चीनी रणनीति का हिस्सा है। सत्ता अधिष्ठान को इसे चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। पड़ोसी देशों के साथ मैत्री कायम करने की छटपटाहट में इतिहास के सबक को भूलना नहीं चाहिए। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं).
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