पूर्व नौकरशाह नरेश चंद्र की अध्यक्षता में गठित 14 सदस्यों वाले नए उच्च-स्तरीय कार्यबल को आतंकी हमले रोकने के लिए आइएसआइ की सोच को समझना होगा। उसे यह भी तय करना होगा कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की मांग कहीं पाकिस्तान की तानाशाही को भारत लाने का परोक्ष प्रयास तो नहीं है। जमीनी सीमाओं के रास्ते होने वाली घुसपैठ को कंटीले तारों की बाढ़ वाली रक्षा प्रणाली द्वारा मोटे तौर पर रोक दिए जाने के बाद पाकिस्तान ने भारत में प्रवेश का एक नया तरीका खोज लिया। 26/11 को वह समुद्री रास्ते मुंबई में दाखिल हुआ। ऐसी खबरें भी आती रही हैं कि पाक सेना ने सीमा पर सुरंगों के रास्ते भारत में आतंकियों की घुसपैठ कराई है। हाल ही में उसने अफगानिस्तान की कंधार जेल से कैदियों को भगाने के लिए इस तरकीब का इस्तेमाल किया था। इस जेल से सैन्य कमांडरों सहित 540 से अधिक तालिबान कैदियों को निकल भागने में मदद की गई। यह सुरंग जेल के भीतर कैदियों द्वारा नहीं बनाई गई थी, बल्कि आतंकवादियों ने इसे बाहर से बनाया था। अच्छा होगा कि कार्यबल काबुल में हामिद करजई की मित्र सरकार से सुरंगें खोदने के तरीकों की जानकारी प्राप्त कर ले, ताकि 1999 के कारगिल हमले के बाद सामरिक विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम की समिति द्वारा सुझाई गई सीमा प्रबंध व्यवस्था के दायरे में रोकथाम के उपाय किए जा सकें। पाकिस्तान से तानाशाही के वायरस के बीज उस समानता की मांग में फूट सकते हैं कि 1947 में विभाजन के समय मौजूद नागरिक-सैन्य संबंधों की तर्ज पर समानता कायम की जाए। कर्जन-किचनर प्रकरण ने शांतिपूर्ण तरीकों से या दूसरी ब्रिटिश कॉलोनियों की तरह हिंसा के रास्ते से आजादी हासिल करने वाले राष्ट्रों में सैन्य तानाशाही की क्यारी तैयार की। प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार और इसके बाद की तमाम सरकारें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति को टालती रहीं, जबकि के. सुब्रह्मण्यम की कारगिल समीक्षा समिति ने इस आशय की सिफारिश की थी। वैसे तो रक्षा संबंधी मुद्दों के नियोजन और क्रियान्वयन में तीनों सेनाओं में काफी सहयोग तथा तालमेल रहा है, लेकिन कारगिल युद्ध के दौरान खतरे के आकलन तथा जवाबी कार्रवाई के मामले में सेना और भारतीय वायुसेना में गंभीर मतभेद उजागर हुए थे। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह कमान को छोड़कर बाकी देश के लिए वैसा ही समान सह-क्रियात्मक त्रि-सेना ढांचा मौजूद नहीं है। नरेश चंद्रा कार्यबल का गठन कारगिल समीक्षा समिति और मंत्रिसमूह की सिफारिशों को लागू करने में आने वाली कमियों को पूरा करने और भारत की सुरक्षा के लिए नए खतरों से निपटने के उपाय सुझाने के लिए किया गया है। हालांकि 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में दाखिल होने वाले दस पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा इस्तेमाल किए गए समुद्री मार्ग को सील करने के काफी हद तक प्रयास किए गए हैं, फिर भी सच तो यह है कि सोमालियाई और यमनी नागरिकों से भरी दो नावें गुजरात तट पर उतरी हैं या उन्हें तट के काफी निकट पकड़ा गया है। संदेह है कि ये लोग समुद्री डाकू थे और डेविड हेडली की तरह टोह लेने आए थे। इससे मुंबई हमले के बाद की गई समुद्री रक्षा व्यवस्था की कारगरता पर सवाल उठते हैं कि क्या समुद्री डाकू भारतीय तट-रेखा के इतने करीब आ सकते हैं। पहले भी अरब सागर के दक्षिणी इलाकों में लक्षद्वीप के निकट समुद्री डाकुओें को पकड़ा गया था। नरेश चंद्रा कार्यबल में एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) एस कृष्णस्वामी, जनरल (सेवानिवृत्त) वीआर राघवन, परमाणु ऊर्जा विभाग के पूर्व प्रमुख अनिल काकोदकर, एडमिरल (सेवानिवृत्त) अरुण प्रकाश, रॉ के पूर्व चीफ केसी वर्मा, पूर्व गृह सचिव वीके दुग्गल, पाकिस्तान में कार्यरत पूर्व राजनयिक जी पार्थसारथी और कारगिल समिति से जुड़े पत्रकार मनोज जोशी शामिल होंगे। कार्यबल जुलाई में अपना काम शुरू करेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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