Saturday, July 16, 2011

सगीर की सिफारिश पर सवाल

कश्मीर घाटी के लोगों ने राष्ट्रीयता पर अनेक प्रश्नों की रूपरेखा तैयार की है। 25 अक्टूबर 2008 को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद ने प्रेस कांफ्रेंस में स्वशासन की रूपरेखा जारी की थी, जो कश्मीरियों की राष्ट्रीयता पर नए सवालों को उठाने का एक प्रयास था। 26 अक्टूबर, जेएंडके के देश में विलय का दिन है और स्वशासन की रूपरेखा भी इसी दिन जारी की गई थी। जम्मू-कश्मीर का उल्लेख सिर्फ कश्मीर में बेरोजगारी और यहां के युवाओं की आकांक्षाओं को दर्शाने के रूप में किया जाता है। कश्मीर घाटी में देश के इरादों/यहां के नेताओं/जेएंडके की उपेक्षाओं/स्वायत्तता के क्षरण/वचनबद्धता से विश्वासघात जैसे सवाल उठने लगे हैं। वर्ष 1946 में कश्मीर घाटी में डोगरा राज के खिलाफ कश्मीर छोड़ो का आ ान किया गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में केंद्र की शिकायत पर कश्मीर घाटी में जनमत संग्रह की मांग पर गौर किया गया और यहां के नेताओं, लेखकों और लोगों के बीच यह काम करने का आधार बन गया। कश्मीर घाटी के नेताओं के बीच आजादी, वृहत्तर स्वायत्तता और स्वशासन की मांग उठने लगी है। वर्तमान में कश्मीर संभाग का क्षेत्र जम्मू संभाग के 60 फीसदी से भी कम है और यह लद्दाख संभाग का (करीब 10 फीसदी) सिर्फ अंशमात्र है। केंद्र सरकार कश्मीरी नेताओं की आवाज को जेएंडके की आवाज मानती है, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। राज्य सरकार और राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख पदों को कश्मीर घाटी के लोगों को दे दिया गया है। फिर भी कश्मीर घाटी के नेताओं को केंद्र सरकार पर विश्वास नहीं है और वे हमेशा केंद्र पर अपने वादों पर खरा न उतरने का आरोप लगाते रहते हैं, बावजूद इसके कि देश विरोधी आवाज सिर्फ कश्मीर घाटी से उठती है। इसलिए वे तत्व और विचारधारा जो जेएंडके को देश के राज्य के रूप में नहीं मानते हैं, ने कश्मीर घाटी में इसे एक नए व्यवसाय के रूप में लिया है। हाल के वर्षो में गोलमेज सम्मेलनों, वर्किंग ग्रुपों, वार्ताकारों और अध्ययन समूहों ने भी सिर्फ कश्मीर घाटी पर ही ध्यान केंद्रित किया है। इसका कारण इस तथ्य में नजर आता है कि इन छह दशकों में केंद्र ने सिर्फ कश्मीर घाटी को ही देखा है। इसलिए दिल्ली से आने वाले आधिकारिक समूह अलगाववादी तत्वों से ही मिलने के इच्छुक रहते हैं, लेकिन वे कोई रुचि नहीं दिखाते। जबकि जम्मू संभाग के लोगों ने जेएंडके के लिए नियुक्त वार्ताकारों और समूहों का स्वागत किया है। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अध्ययन समूहों और वार्ताकार जम्मू संभाग के प्रति उतने गंभीर नजर नहीं आते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जेएंडके के लिए पांच वर्किंग ग्रुपों को नियुक्त किया था। इनमें से एक वर्किंग ग्रुप (पांचवा वर्किंग ग्रुप केंद्र और राज्य के बीच संबंधों को मजबूत बनाता है) के अध्यक्ष जस्टिस एस सगीर अहमद (जेएंडके और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश) थे। 12 दिसंबर 2006 को वर्किंग ग्रुप की पहली बैठक में जस्टिस सगीर ने यह स्पष्ट कर दिया कि वर्किंग ग्रुप को जेएंडके राज्य की प्रासंगिकता और भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद से कोई मतलब नहीं है। इसलिए वर्किंग ग्रुप भारत के संवैधानिक ढांचे के भीतर केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित प्रश्नों के विचार पर खुद को कैद कर लेगा। इसके बाद वर्किंग ग्रुप के सामने स्वायत्तता, स्वशासन और धारा 370 जैसे विषय बच गए। 18 दिसंबर 2009 (पहली बैठक के तीन साल बाद) को जस्टिस सगीर ने वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किया था। बड़ी विचित्र ढंग से वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट ने स्वायत्तता की मांग, जेएंडके विधानसभा में पारित स्वायत्तता प्रस्ताव-जून 2000 में न्यूनतम विशेष शब्दों को खारिज नहीं किया। इसने साठ साल पुराने भारतीय संविधान की धारा 370 को हमेशा के लिए निपटाने की बात कही। रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या 10 के तीसरे अनुच्छेद में सुप्रीम कोर्ट के संपत प्रकाश मामले का जिक्र किया गया है, इसे पीडीपी ने मुजफ्फर हुसैन बेग के माध्यम से वर्किंग ग्रुप के सामने प्रस्तुत किया है। लेकिन रिपोर्ट में धारा 370 पर बिना सोचे-समझे टिप्पणी की गई है। रिपोर्ट अपनी संक्षिप्त सिफारिश में स्वायत्तता की मांग को कश्मीर समझौते के प्रकाश में या किसी अन्य तरीके से जांचने की बात कहती है ताकि मौजूदा प्रधानमंत्री इसे उपयुक्त समझकर संभावित सीमा तक स्वायत्तता बहाल कर सकें। सवाल उठता है कि जस्टिस सगीर ने अपने स्तर पर जांच कर विशेष सिफारिश क्यों नहीं की? तीन साल बीतने के बाद भी वह इस मुद्दे को खुला क्यों छोड़ रखे हैं? संक्षिप्त सिफारिशों के अनुच्छेद 3 में स्वशासन की मांग के संबंध में कहा गया है कि पीडीपी की ओर से मुजफ्फर हुसैन बेग ने मौखिक रूप से स्वशासन की अवधारणा की व्याख्या की है, लेकिन पीडीपी द्वारा प्रस्तावित स्वशासन पर विस्तृत रूप से विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि पीडीपी ने वादे के मुताबिक वर्किंग ग्रुप को दस्तावेज में स्वशासन के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत जानकारी नहीं दी है। श्रीनगर में 25 अक्टूबर 2008 को पीडीपी ने स्वशासन की अवधारणा के दस्तावेज जारी कर सचमुच कैसा मजाक किया था। सवाल यह है कि वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट में अभी भी स्वशासन की मांग को नहीं छोड़ा गया है। इसके बदले यह निर्धारित किया गया है कि यदि पीडीपी स्वशासन के दस्तावेज के साथ पहुंचती है तो केंद्र को इस पर विचार करने की जरूरत है। पीडीपी के दस्तावेज में वर्ष 1947 में राज्य के विलय, भारत-पाक संबंधों और गुलाम कश्मीर के बारे में चिंता करने के लिए पर्याप्त विषय वस्तु है। जस्टिस सगीर अहमद की रिपोर्ट एक ऐसा नमूना है जो प्रमुख स्तरों पर जेएंडके मामलों के प्रति अपनी अगंभीरता को ही दर्शाती है। जम्मू-कश्मीर राज्य दशकों से सुर्खियों में रहा है। खासकर, वर्ष 1990 में कश्मीर घाटी में अस्थिरता के बाद। कश्मीरी हिंदुओं का बड़े पैमाने पर प्रवास और घाटी में प्रवासियों की वापसी 21 वर्षो बाद भी केंद्र सरकार के लिए पहली प्राथमिकता नजर नहीं आती है। हालांकि वे लोग जो वर्ष 1947 में राज्य के देश में विलय की वैधता पर सवाल उठाते हैं, केंद्र सरकार की सहानुभूति प्राप्त करते प्रतीत होते हैं। सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग बेरोजगारी और कम आर्थिक संसाधनों जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द समस्या को निर्धारित कर देते हैं। लेकिन जेएंडके में बेरोजगारी और प्रशासनिक कुप्रबंध कश्मीर घाटी में आतंकवाद और जन आंदोलनों का मुख्य कारण नहीं है। (लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं)

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