Sunday, July 24, 2011

कश्मीर में मुठभेड़, तीन दुर्दात आतंकवादी मारे गए


नई दिल्ली आतंकियों को समय पर और कठोर सजा दिलाने में न्यायिक प्रणाली की विफलता ने स्थिति को और भयावह बना दिया है। हालत यह है कि न तो सुरक्षा एजेंसियां आतंकी वारदातों को रोकने में पूरी तरह सक्षम है और न ही न्यायिक प्रणाली उन्हें सजा दिलाने में। कमजोर कानूनों और लचर पैरवी की वजह से हमलों के जिम्मेदार आतंकी भी अदालत से बाइज्जत बरी हो रहे हैं। यही कारण है कि सुरक्षा एवं कानूनी विशेषज्ञ एक बार फिर से टाडा या पोटा जैसे स्थायी और कठोर कानून की मांग करने लगे हैं। 2008 में दिल्ली बम विस्फोटों के आरोपी सलमान को इस साल फरवरी में आरोपों से बरी कर दिए जाने का जिक्र करते हुए खुफिया विभाग के पूर्व निदेशक एके डोभाल कहते हैं कि आतंकवाद और सामान्य अपराध से अलग-अलग निपटने की जरूरत है। आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट कानून के अभाव में अहमदाबाद की स्थानीय अदालत में पिछले साल नौ आरोपी आतंकियों को रिहा कर दिया था, जिनमें दो बांग्लादेशी भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि 1987 में आतंकियों के खिलाफ टाडा (टेररिस्ट एंड डेसरप्टिव एक्टिविटिज प्रीवेंशन एक्ट) जैसे कड़े कानून से शुरुआत करने वाले भारत ने 2005 में पोटा भी खत्म कर दिया। आतंकियों के खिलाफ सबूत जुटाने की मुश्किलों का जिक्र करते हुए डोभाल ने कहा कि खुद को बेकसूर साबित करने की जिम्मेदारी आरोपियों की होनी चाहिए। यही नहीं, आतंकी मामलों में कानून को भी केवल साक्ष्यों के आधार पर सजा सुनाने के बजाय सच्चाई के आधार सजा सुनानी चाहिए। आतंकियों के खिलाफ साक्ष्य कमजोर हो सकते हैं, लेकिन अदालत को उसके आतंकी होने की सच्चाई पर विश्वास हो तो उसे कड़ी सजा सुनाई जा सकती है। फिलहाल ऐसा नहीं हो पा रहा है। इस संबंध में पूछे जाने पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने साफ कहा कि आतंक से निपटने के लिए एक स्थायी और कठोर कानून की सख्त जरूरत है। उनके अनुसार आतंकियों के खिलाफ आम जनता से गवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसके लिए पुलिस अधिकारियों के सामने और वीडियो रिकार्डिग वाले बयान को आतंकियों के खिलाफ सबूत माना जाना चाहिए। टाडा और पोटा में इसी तरह का प्रावधान था, पर उसमें वीडियो रिकार्डिग की शर्त नहीं थी। तुलसी ने कहा कि कमजोर और अस्पष्ट कानूनों का फायदा आतंकियों को मिलना तय है।

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