कुपवाड़ा के दादपोरा इलाके में शुक्रवार शाम सुरक्षाबलों के साथ आंतकियों की जबरदस्त मुठभेड़ हुई। इस दौरान तीन आतंकी मौका पाकर भाग निकले जबकि एक आतंकी समाचार लिखे जाने तक सुरक्षाबलों के घेरे में ही फंसा हुआ था। सेना ने पुलिस कर्मियों के साथ मिलकर आतंकियों के जंगल में छिपे होने की सूचना के बाद तलाशी अभियान छेड़ा और दहशतगर्दो को घेर लिया। सेना व पुलिस के जवान अभी भी चौथे आतंकी को घेरे हुए हैं और उसे जिंदा पकड़ने की कोशिश में जुटे हैं। वहीं नौगाम सेक्टर में एक घुसपैठिये के मारे जाने की सूचना है। गौरतलब है पाकिस्तानी सेना ने बुधवार को एलओसी से सटे मच्छल सेक्टर में घुसपैठ करवाई थी। हालांकि इस दौरान फायरिंग में एक नायब सूबेदार शहीद हो गया था जबकि सेना के दो जवान घायल हो हुए थे।
Saturday, July 30, 2011
बस उड़ाने की साजिश नाकाम
जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर शुक्रवार को यात्रियों से भरी एक वीडियो कोच बस को उड़ाने की आतंकी साजिश चालक और क्लीनर की सजगता से टल गई। पुलिस ने बस में रखी तीन शक्तिशाली आइइडी बरामद कर उन्हें नकारा बना दिया। 52 सीटर इस बस में आम लोगों के साथ कुछ अमरनाथ यात्री भी सवार थे। ऐसे में यदि आइइडी में धमाका हो जाता तो बड़ी तबाही होती। जानकारी के अनुसार सुबह श्रीनगर से यात्री बस नंबर जेके 013-4547 सवारियों को लेकर जम्मू के लिए निकली। दोपहर करीब दो बजे यह बस काजीगुंड पहुंची। जहां यात्री चाय-नाश्ते के लिए नीचे उतरे। थोड़ी देर बाद जब बस लोअर मुंडा में गुलाब बाग टोल पोस्ट पर टोल कटाने के लिए रुकी तो चालक ने दो यात्रियों को कम पाया। चालक व कंडक्टर ने जब उनके बारे में पूछताछ की तो आसपास बैठे मुसाफिरों को भी कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि उनकी सीटों पर सामान पड़ा था। संदेह होने पर चालक ने पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने यात्रियों को नीचे उतरवाया और गायब मुसाफिरों के सामान की छानबीन की। उन्हें वहां तीन प्रेशर कुकर मिले। इस पर पुलिस ने बम निरोधक दस्ते को बुलाया, जिसने ल्ल शेष पृष्ठ 5 पर
बस उड़ाने की.. सावधानीपूर्वक प्रैशर कुकर उठाए तो पता चला कि तीनों में तीन-तीन किलो आरडीएक्स से बनी आइइडी फिट हुई है। बाद में बम निरोधक दस्ते ने तीनों आइइडी को नकारा बना दिया। इस दौरान काजीगुंड-लोअर मुंडा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात को करीब तीन घंटे के लिए पूरी तरह रोक दिया गया। डीआइजी दक्षिण कश्मीर शफकत वटाली ने बताया कि आतंकी यात्री बस को उड़ाने की फिराक में थे। इसलिए वह यात्रियों के भेष में बस में बैठे थे। चालक और क्लीनर की मदद से यह हादसा टल गया है। हमने आतंकियों की तलाश शरू कर दी है। जल्द ही उन्हें हिरासत में ले लिया जाएगा। इस बीच पुलिस महानिदेशक कुलदीप खुड्डा से जब पूछा गया कि क्या आतंकी अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाना चाहते थे तो उन्होंने कहा कि यात्रा शुरू से ही आतंकी निशाने पर है। लेकिन आम लोगों की सजगता से वारदात टाल दी गई।
स्वामी पर लटकी कार्रवाई की तलवार
: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग विवादित लेख के मामले में जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी को नोटिस भेजने पर कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रहा है। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्ला ने कहा कि मामले में कानूनी सलाह ली जा रही है कि आइपीसी के किस प्रावधान का उल्लंघन हुआ है। इस्लामी आतंकवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताने वाले स्वामी के लेख की तीखी आलोचना करते हुए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की मांग की है। दिग्विजय ने कहा, मैं सुब्रमण्यम स्वामी के सर्वाधिक सांप्रदायिक विचारों की कड़े शब्दों में निंदा करता हूं और उनके खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग करता हूं। एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित लेख में स्वामी ने 13 जुलाई 2011 को मुंबई में सिलसिलेवार बम विस्फोट के बाद भारत में हिंदुओं को आत्मचिंतन करने की जरूरत बताते हुए कहा कि हिंदू हलाल किया जाना कबूल नहीं कर सकते। अपने लेख में उन्होंने कथित तौर पर कहा है, कट्टरपंथी मुसलमान हिंदू बहुल भारत पर विजय को अपना ऐसा एजेंडा मानते हैं, जिसे पूरा किया जाना अभी बाकी है। मैं मुस्लिम कट्टरपंथियों को हिंदुओं को निशाना बनाए जाने के लिए दोषी नहीं मानता बल्कि हिंदुओं को दोषी मानता हूं। उन्होंने कहा कि एक ऐसा व्यक्ति जो खुद को वन मैन आर्मी के रूप में पेश करता है, बेहद सांप्रदायिक बातें करता है और उसे अखबार में प्रकाशित किया जाता है। मुस्लिमों को मतदान के अधिकार से वंचित करने के सुझाव देने वाले सुब्रमण्यम स्वामी के एक लेख को हबीबुल्ला ने बेहद ठेस पहुंचाने वाला करार दिया है। स्वामी ने लिखा था, हमें समग्र दृष्टिकोण की जरूरत है क्योंकि हिंदुओं को इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होना है। अगर कोई मुस्लिम अपनी हिंदू विरासत को स्वीकार करता है तो हम हिंदू उसे वृहद हिंदू समाज के हिस्से के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, जो कि हिंदुस्तान है। अन्य लोग, जो इसे स्वीकार करने से इनकार करते हैं, या जो विदेशी पंजीयन के जरिए भारतीय नागरिक बने हैं, वे भारत में तो रह सकते हैं लेकिन उन्हें मतदान के अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।
दीवाली तक ओपेरा हाउस छोड़ देंगे हीरा व्यापारी
मुंबई महानगर के ओपेरा हाउस क्षेत्र में गत 13 जुलाई को हुए बम विस्फोट का डर हीरा व्यापारियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। इसी का नतीजा है कि इस क्षेत्र के 70 फीसदी हीरा व्यापारियों ने दीवाली तक ओपेरा हाउस छोड़कर करीब 10 किलोमीटर दूर भारत डायमंड बोर्स में जाने का मन बना लिया है। ओपेरा हाउस में हीरा व्यवसाय का अंतरराष्ट्रीय बाजार होने के कारण इसे भारत का एंटवर्प कहा जाता है। यहां से हर साल करीब एक लाख करोड़ रुपये मूल्य के तराशे हीरों का निर्यात किया जाता है। भारतीय रत्न एवं आभूषण निर्यात परिषद के उपाध्यक्ष संजय कोठारी ने शुक्रवार को दैनिक जागरण को बताया कि 13 जुलाई को हुए विस्फोट के बाद हीरा व्यवसायी ओपेरा हाउस से बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित भारत डायमंड बोर्स में जाने की तैयारी करने लगे हैं। ओपेरा हाउस में उन्हें न सिर्फ अपनी सुरक्षा की चिंता होने लगी है, बल्कि उनके पास आने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारी भी भय का अनुभव करते हैं। कोठारी के अनुसार एक बड़ी कंपनी ने तो आगामी 1 अगस्त को ही ओपेरा हाउस से निकलने की योजना बना ली है। 15 अगस्त से दीवाली के बीच ओपेरा हाउस की 70 फीसदी कंपनियां भारत डायमंड बोर्स में स्थानांतरित हो जाएंगी। गौरतलब है कि हीरों के प्रमुख विनिमय बाजार बेल्जियम, इजरायल, दुबई, चीन या भारत में हैं। इनके कारोबार का नियमन बेल्जियम स्थित वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ डायमंड बोर्सेस (डब्ल्यूएफडीबी) द्वारा किया जाता है। भारत ने कच्चे हीरों की तराशी में अपनी विशेष पहचान बना रखी है। यह काम मूलत: गुजरात में होता है। जबकि, मुंबई के ओपेरा हाउस क्षेत्र की कुछ बहुमंजिला इमारतों से इन तराशे हुए हीरों का व्यापार किया जाता है। छोटे व्यापारी तो ओपेरा हाउस की पंचरत्न बिल्डिंग के बाहर सड़क पर ही खड़े होकर लाखों-करोड़ों का व्यवसाय कर डालते थे। 13 जुलाई के विस्फोट के बाद स्थितियां बदल गई हैं। अब ये हीरा व्यापारी मध्य मुंबई में स्थित 20 लाख वर्ग फीट की नौ मंजिली इमारत में बने दुनिया के सबसे बड़े हीरा एक्सचेंज भारत डायमंड बोर्स में जाने को तैयार हैं।
फई का मुद्दा नहीं उठाने पर बरसे मोदीअहमदाबाद
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि अमेरिका में गिरफ्तार गुलाम नबी फई के मुद्दे को भारत-पाकिस्तान के बीच हुई वार्ता में नहीं उठा कर संप्रग सरकार ने साबित कर दिया है कि वह छद्म बुद्धिजीवियों का समर्थन करती है। मोदी ने सवाल उठाया है कि संप्रग सरकार ऐसे छद्म बौद्धिक लोगों का समर्थन क्यों कर रही है, जो भारत से नफरत करने वाले फाई जैसे लोगों का सहयोग करते हैं। मोदी ने अपने ब्लॉग पर लिखा है, अमेरिका में पिछले सप्ताह जो कुछ भी हुआ, उसने हर देशभक्त नागरिक का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस घटना ने बताया है कि पाकिस्तान की आइएसआइ हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों को किस हद तक प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि मामला इतना गंभीर था कि अमेरिका को फाई को गिरफ्तार करना पड़ा, लेकिन इतने गंभीर मामले को भारत-पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बातचीत में अहमियत ही नहीं मिली। इससे देश स्वाभाविक तौर पर मान सकता है कि संप्रग सरकार देश के छद्म बुद्धिजीवियों का समर्थन करती है। मोदी ने ट्विटर पर सवाल किया है। संप्रग सरकार ऐसे छद्म बुद्धिजीवियों का समर्थन और संरक्षण क्यों कर रही है, जो भारत से नफरत करने वाले फाई जैसे लोगों का सहयोग करते हैं।
Thursday, July 28, 2011
कश्मीर से भारत में घुसने का किया एलान
भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान देने वाले जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज मुहम्मद सईद ने अब जम्मू-कश्मीर के जरिये भारत में घुसने का एलान किया है। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक सईद ने कहा कि हम कश्मीर के रास्ते भारत में घुसकर गजवा-ए-हिंद कश्मीर से भारत.. (हिंदुस्तान से जंग) छेड़ेंगे। भारत मुंबई आतंकी हमले के साजिशकर्ता सईद के खिलाफ कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाता रहा है। लेकिन, वह पाकिस्तान में खुलेआम घूमकर भारत विरोधी बयानबाजी करता रहता है। सईद ने पिछले सप्ताह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बहावलपुर और मुल्तान शहरों का दौरा किया। जमात-उद-दावा के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों में उसने भारत में घुसने का एलान करते ह
यूरोप में कई पाकिस्तान बनने के डर से किए हमले
नॉर्वे में शुक्रवार को भीषण नरसंहार को अंजाम देकर 90 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारने वाले एंडर्स बेहरिंग ब्रिविक को यूरोप में कई छोटे-छोटे पाकिस्तान बनने का डर सता रहा था। उसके द्वारा लिखे गए डायरीनुमा 1500 पन्नों के दस्तावेज में यह बात सामने आई है। 2083 : अ यूरोपीय डिक्लेरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस शीर्षक वाले दस्तावेज में यूरोप के भविष्य को लेकर उसने अपने मन की बातें लिखी हैं। पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप में प्रलय की परिकल्पना करते हुए 32 वर्षीय ब्रिविक ने लिखा कि वर्ष 2083 तक यूरोप में छोटे-छोटे कई पाकिस्तान बन जाएंगे। यह उसी प्रकार होंगे, जैसा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत का विभाजन हुआ था और पाकिस्तान अस्तित्व में आया था। ब्रिविक का दावा है कि पाकिस्तान योजनाबद्ध तरीके से गैर मुस्लिम समुदायों को नष्ट कर रहा है। पाकिस्तान में ईसाइयों की बदतर स्थिति का भी उसने जिक्र किया। लाहौर में द थियोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के फादर एमानुअल असी के 2007 में दिए गए बयान का हवाला देते हुए ब्रिविक ने कहा कि पाकिस्तानी ईसाइयों को अक्सर समान अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। अखबार के मुताबिक ऐसा लगता है कि यूरोपीय समाज को आत्मसात करने की मुस्लिम अप्रवासियों की असमर्थता उसे परेशान कर रही थी। उसने आरोप लगाया है कि मुसलमान अभिभावक अपने बच्चों को यूरोपीय तौर-तरीके अपनाने की इजाजत नहीं देते। उसने सवाल भी उठाया कि मुस्लिम लड़कियों का दायरा सीमित क्यों कर दिया जाता है? क्यों मुस्लिम पुरुष नॉर्वे की महिलाओं को अच्छी नजर से नहीं देखते? उसने बहुसंस्कृतिवाद के खिलाफ आवाज उठाई है। यूरोप में नाटकीय जनसांख्यिकीय बदलाव का उसने यूरोप का पाकिस्तानीकरण होना कहा है। नॉर्वे के हत्यारे के ब्रिटेन संबंधों की जांच लंदन, एजेंसी : स्कॉटलैंड यार्ड नॉर्वे हमलों के हत्यारे बे्रविक के ब्रिटेन में उसके सहयोगियों के संपर्को की जांच कर रही है। हमलावर के पास से बरामद दस्तावेज में लंदन में हुई बैठक के जिक्र के आधार पर यह जांच की जा रही है। बे्रविक ने ओस्लो धमाका और उटोइया द्वीप पर शिविर में गोलीबारी करना स्वीकार किया था। स्कॉटलैंड यार्ड ने बताया कि जांच में सहायता के लिए एक पुलिस अधिकारी को नॉर्वे भेजा गया है। विदेश मंत्री विलियम हेग ने ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद हमलों पर चर्चा करने के लिए बैठक की।
पाक कानून में आवाज का नमूना लेने की अनुमति नहीं
पाकिस्तान ने कहा है कि उनके देश का संविधान किसी आरोपी की आवाज के नमूने लेने की अनुमति नहीं देता है लेकिन वह फिर भी भारत को मुंबई हमले के संदिग्धों की आवाज के नमूने देने के सभी संभावित तरीके खोजेगा। साथ ही पाकिस्तान ने कहा कि रावलपिंडी की एक अदालत में मुंबई हमले के आरोपी की सुनवाई में हो रही देरी के लिए केवल उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और पाकिस्तानी न्यायिक आयोग को भारत को दौरा करने देने की अनुमति देने में करीब एक साल लगाने के लिए भारत को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने सोमवार को कहा कि पाकिस्तान दंड संहिता और साक्ष्य अधिनियम के अनुसार, आरोपी की पहचान के लिए केवल अंगूठे का निशान मान्य होता है और आधिकारिक रूप से किसी आरोपी का फोटोग्राफ या उसकी आवाज नहीं ली जाती। मलिक ने एक साक्षात्कार में कहा, अगर मैं उनकी आवाज रिकार्ड करके किसी अन्य तरीके से नमूना लेकर इसे भारत को सौंपता हूं, तो इसे पाकिस्तान की अदालत में चुनौती दी जाएगी और जांचकर्ताओं तथा अभियोजकों पर अदालत की मानहानि का मामला बनेगा। मलिक ने कहा कि पाकिस्तान सरकार की आरोपियों के आवाज के नमूने लेने की अनुमति संबंधी अपील को एक निचली अदालत ने खारिज कर दिया था और उन्होंने इस बारे में अपने भारतीय समकक्ष पी. चिदंबरम से बात की थी। इसके बाद हमने अगले स्तर पर ऊपरी अदालत की शरण ली है। उन्होंने साफ किया कि 26/11 हमले के गुनहगारों को न्याय के घेरे में लाने को लेकर उनकी सरकार की नीयत बिल्कुल साफ है। उनकी सरकार भारत को आवाज के नमूने देने के लिए सभी संभावित तरीके खोजेगी। उन्होंने कहा, जैसे ही अदालत हमें अनुमति देती है, हम (भारत को आवाज के नमूने) निश्चित रूप से भेजेंगे। अगर उच्च न्यायालय (अपील को) खारिज करती है तो हम उच्चतम न्यायालय में जाएंगे। हम हर संभव स्तर पर जाएंगे। हम (इसे) निष्पक्ष तौर पर कर रहे हैं और आप कानून के बारे में पता कर सकते हैं। मलिक ने पाकिस्तान की एक अदालत में 2008 मुंबई हमले के सात आरोपियों की सुनवाई के संदर्भ में कहा, देरी हो रही है और देरी केवल पाकिस्तान की वजह से नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि घटना दूसरे देश में घटी है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने इस मामले में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है और जांचकर्ताओं ने आरोपियों के खिलाफ काफी सबूत जुटा लिए हैं। मुंबई हमले की जांच के संबंध में पाकिस्तान में एक आयोग भेजने के भारत के आग्रह पर मलिक ने कहा कि उनका देश आयोग को लेकर सहमत है, जब इस तरह का आग्रह आएगा, संबंधित विधि विभाग द्वारा इसकी जांच की जाएगी और अगर यह विभाग सहमत होता है तो इस दौरे को अनुमति दी जाएगी।
सहायक विदेश सचिव की नियुक्ति से उल्फा के भीतर बढ़ा टकराव
यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के वार्ता-विरोधी धड़े की तरफ से रविवार को की गई सहायक विदेश सचिव की नियुक्ति पर वार्ता समर्थक धड़े ने सोमवार को आपत्ति जताई है। उल्फा अध्यक्ष अरविंद राजखोवा के नेतृत्व वाले वार्ता-समर्थक धड़े ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह नियुक्ति उल्फा के संविधान के खिलाफ है, क्योंकि इसमें ऐसे किसी भी पद का प्रावधान नहीं है। संगठन के कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ के नेतृत्व वाले वार्ता-विरोधी धड़े ने रविवार को मीडिया को जारी किए गए बयान में कहा था कि डॉ. प्राणमॉय असम को संगठन का सहायक विदेश सचिव नियुक्त किया गया है। इस बयान में असम ने अपने हस्ताक्षर के साथ 8 जून को अपनी नियुक्ति किए जाने का दावा किया। उधर, संगठन की केंद्रीय समिति के सदस्य कमल कचारी ने कहा कि केवल उल्फा के अध्यक्ष को ऐसी नियुक्तियां करने का अधिकार है। गौरतलब है कि शांति वार्ता के लिए राजखोवा कुछ वरिष्ठ सदस्यों के साथ हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं।
Wednesday, July 27, 2011
आतंकवाद का राजनीतिकरण
मैं मुंबई में कभी नहीं रहा। मैं वहां तीन दिन से ज्यादा समय तक कभी ठहरा भी नहीं। इसलिए मेरे लिए अनुमान लगा पाना कठिन है कि जहां बम विस्फोट का भय बना रहता है वहां लोग किस तरह रहते हैं। मुझे इस बात ने बेहद प्रभावित किया है कि आतंकवादियों के खतरे और शिव सेना द्वारा गैर-मराठी लोगों को धमकियों के बावजूद देश के विभिन्न भागों से आए दो करोड़ लोग एक समुदाय के रूप में मिल-जुलकर रहते हैं। गत 18 वर्षो में मुंबई पर 16 हमले हो चुके हैं। लोगों ने उस असुरक्षा को झेलते हुए रहना सीख लिया है, जो उनके समक्ष उपस्थित रहती है। वे केंद्र और राज्य सरकारों की आलोचना करते हैं कि बार-बार होने वाले बम विस्फोटों से उनकी रक्षा नहीं कर पा रहीं। फिर भी वे भयाक्रांत नहीं हैं। इसे ही मुंबई की भावना कहते हैं। कुछ सप्ताह पहले मैं कराची में था। मैंने देखा कि लोगों ने कैसे कठिन हालात में रहना सीख लिया है। जातीय दंगों के अलावा वहां आए दिन बम विस्फोट होते रहते हैं। वहां भी मुंबई सरीखी नि:सहायता का अहसास होता है। मुझे भी दंगों और मृत्यु के भय का अहसास हुआ। अपने गृह नगर स्यालकोट से भारत में वाघा सीमा तक की यात्रा के दौरान मैं आशंकित रहा था कि किसी आतंकी हमले में मैं मारा जा सकता हूं। मैंने अपने सामने लोगों को एक-दूसरे को मारते देखा है। पूर्वी पंजाब में लोगों ने सब कुछ गंवाकर भी खुद को संभाला और इसमें उन्हें लंबा अरसा नहीं लगा। वह हमारे प्रतिरोध की सोच थी या संकल्प शक्ति? मैंने पाया कि मुंबई में रहने वाले लोगों की भी यही मन:स्थिति है। वे उठे, गिरे और फिर अपने पैरों पर खड़े हो गए। वे अनेक बार ऐसा कर चुके हैं और फिर चुनौती मिली तो फिर ऐसा ही करेंगे। दरअसल, उन ताकतों से संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं है, जो उन्हें पराजित करना चाहती हैं। मैं कोलाबा में रह रही एक महिला की यह टिप्पणी भूला नहीं हूं कि जब सुबह मेरे पति कार्यालय जाते हैं तो मैं प्रार्थना करती हूं कि वह शाम को सुरक्षित लौट आएं। दिल्ली में अभी हालात इतने नहीं बिगड़े हैं, किंतु कभी भी ऐसा हो सकता है। भारत में जो सबसे घटिया बात हो रही है वह है आतंकी हमलों का राजनीतिकरण। देश में दो प्रमुख राजनीतिक दल हैं- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी। मुंबई में विस्फोटों के चौबीस घंटों के भीतर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी मुंबई पहुंचे और उन्होंने नई दिल्ली को पाकिस्तान के साथ वार्ता नहीं करने की सलाह दे डाली। मीडिया में या कहीं से भी इन हमलों में पाकिस्तान की संबद्धता का संकेत नहीं था। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी बीच में आ कूदे और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संबद्धता की संभावना जता दी। दंगों के राजनीतिकरण का ही नतीजा है कि सरकार को यह स्पष्ट नहीं करना पड़ता कि पुलिस को पूरी तरह चुस्त-चौकस और सही ढंग से प्रशिक्षित क्यों नहीं रखा गया? तीन वर्ष पूर्व हुए मुंबई हमलों के बाद ऐसा क्यों हुआ? महाराष्ट्र के गृहमंत्री को 2008 के हमले के बाद हटा दिया गया था। वह वापस आ गए हैं। इस तरह सरकार गलत संकेत दे रही है। मुंबई पर 2008 में हुआ हमला एक बड़ी चेतावनी था। इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि वह फिर ऐसा नहीं होने देंगे। फिर भी खुफिया असफलता जैसी बुनियादी भूल हुई। यह सरकार पर एक धब्बा है। हमें अमेरिका से यह पता लगाना चाहिए कि उसने 9/11 के बाद से एक भी वारदात कैसे नहीं होने दी। उस देश में भी एक बड़ी जातीय आबादी है। जार्ज बुश ने पैट्रियाटिक एक्ट जैसे कानून लागू किए। इस एक्ट के तहत तब तक हर अमेरिकी से एक अपराधी के तुल्य व्यवहार किए जाने की व्यवस्था है, जब तक कि वह अपने आपको उसके विपरीत साबित न कर दे। हमें ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। हमारी सरकार के भंडार में कानूनों की कमी नहीं है। जिस चीज की आवश्यकता है वह है कानून और व्यवस्था तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करना ताकि वह समुचित ढंग से त्वरित कार्रवाई कर सके। 2009 में बड़ी धूमधाम से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) का गठन किया गया था, किंतु अब तक इसका परिणाम निराशाजनक ही रहा है। संघर्ष प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ. अजय साहनी का कहना है कि गुप्तचर जानकारी संग्रहण और सिरे से जांच क्षमताओं में सुधार के लिए कोई सुधार नहीं हुआ। वह बताते हैं कि यदि उसे फीड करने के लिए आपके पास कोई ठोस डाटा नहीं है, तो कोई कंप्यूटर किसी केस को हल करने में सहायक नहीं हो सकता। जांचकर्ताओं का विचार है कि सभी पांचों हमलों में इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों का हाथ है, जो पाकिस्तान स्थित लश्करे-तैयबा से प्रेरित हैं। इंडियन मुजाहिदीन 2006 और 2008 के बीच अनेक भारतीय नगरों में हुए हमलों के लिए जिम्मेदार हैं, मगर इन आरोपों के समर्थन में साक्ष्य कोई खास नहीं हैं। आतंकी हमले इंडियन मुजाहिदीन के भीतर से ही जन्मे एक नए समूह का कारनामा बताए जाते हैं। मुंबई समस्या नहीं है। यह प्रशासनिक कमियों का प्रतिफल है। देश की वित्तीय राजधानी पर बेहतर ढंग से ध्यान दिया जाना अपेक्षित है और यह केंद्र के राडार से बाहर नहीं जाना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं).
Tuesday, July 26, 2011
Monday, July 25, 2011
13/7: Sheikh quizzed after Ansari tip-off
Prepared for a long haul, the security agencies have questioned Mohammed Sadique Israr Sheikh, co-founder of the Indian Mujahideen (IM), in Ahmedabad jail after another founding member, Aftab Ansari, told his interrogators in Kolkata that Sheikh had passed on a message to his colleagues that “something was expected in Mumbai in July”.
Even as Sadique Sheikh, the link between the IM module in Cheetah Camp, Trombay, and Azamgarh in the past decade, was questioned by the agencies this week, the needle of suspicion is on the Mumbai module of the IM and the remnants of Qayamuddin Kapadia group in Vadodara for the July 13 serial bombings. The first tip to the police regarding Sheikh came from Ansari, the main accused in the American Centre bombing at Kolkata, as the agencies rushed to question the incarcerated IM leaders, including RDX courier Jalaluddin Mullah aka Babu Bhai in Lucknow jail. Both Ansari and Sheikh (called Sadaqat in Kolkata attack) were partners in terror with Amir Raza Khan.
The agencies are painstakingly putting in the pieces as even the bomb blasts at Sheetla Ghat (December 6, 2010) in Varanasi and Jama Masjid (September 19, 2010) have links with Mumbai. Both the IM mails received after the two incidents last year were found to be sent from Mumbai using mobile phone-based internet platforms using Norway-based servers. The SIM cards in both the cases were purchased in Mumbai, using fake addresses and ID cards.
Although the investigators are foxed over absence of e-mail from IM this time, they are closely looking at the possible involvement of Juhapura, Ahmedabad, residents Alamzeb Afridi, Mujeeb and Abdus Subhan Qureshi, the man who linked the Ahmedabad group with Riyaz Bhatkal. In this context, Qureshi’s Mumbai friend Abu Faisal, resident of Juhu chawl, has been questioned. Faisal was arrested by the Madhya Pradesh ATS on June 26 for an aborted SIMI plot to target Allahabad High Court judges who gave the Ayodhya judgment last year.
While the investigators are convinced that the bomb planters on 13/7 were locals, there is little by the way of technical inputs to substantiate the claim as terrorists these days use internet to internet skype facility, thus making the interception not possible. The CCTV footage has not been of much help due to the crowded areas with only heads visible. The monsoon showers on 13/7 washed away a lot of clues but Gujarat Forensic Science Laboratory report has confirmed that it was an ammonium nitrate fuel oil bomb with commercial detonator and a timer. The timer remains were not found but in all probability a clock timer was used and the circuit found on one of the victims was that of a cellphone. The National Security Guards report varied only on a point that TNT was used as a booster charge.
There was one significant lead about the bomb being planted in an Activa scooter of one Jayant Dholeybhai Shah, a resident of South Mumbai, in the Zaveri Bazaar blast. It now transpires that Shah, a dealer in hardware, had given his scooter to his employee Arjun Choudhary and left for Ahmedabad on July 8, 2011. Choudhary on July 15 filed a complaint with Vitalbhai police station stating that his scooter was stolen on July 12, 2011 — a day before the blast. Both Shah and Choudhary have been questioned by the Mumbai ATS, but no fresh leads have been found
More to Fai, Pak uses threats to keep tabs on US diaspora
MARK MAZZETTI, ERIC SCHMITT & CHARLIE SAVAGE
FBI agents hunting for Pakistani spies in the US last year began tracking Mohammed Tasleem, an attache in the Pakistani Consulate in New York and a clandestine operative of Pakistan’s military spy agency, the Directorate for Inter-Services Intelligence.
Tasleem, they discovered, had been posing as an FBI agent to extract information from Pakistanis living in the US and was issuing threats to keep them from speaking openly about Pakistan’s government. His activities were part of what government officials in Washington, along with a range of Pakistani journalists and scholars, say is a systematic ISI campaign to keep tabs on the Pakistani diaspora inside the US.
The FBI brought Tasleem’s activities to Leon E Panetta, then the director of the Central Intelligence Agency, and last April, Panetta had a tense conversation with Pakistan’s spymaster, Lt Gen Ahmed Shuja Pasha.
Within days, Tasleem was spirited out of the US — a quiet resolution typical of the spy games among the world’s powers.
But some of the secrets of that hidden world became public last week when two Pakistani-Americans working for a charity that the FBI believes is a front for Pakistan’s spy service were indicted. Only one was arrested; the other is still in Pakistan.
The investigation exposed one part of what American officials say is a broader campaign by the ISI to exert influence over lawmakers, stifle public dialogue critical of Pakistan’s military and blunt the influence of India.
American officials said that compared with countries like China and Russia — whose spies have long tried to steal American government and business secrets — the ISI’s operations here are less extensive and less sophisticated. And they are certainly far more limited than the CIA’s activities inside Pakistan.
Even so, officials and scholars say the ISI campaign extends to issuing both tacit and overt threats against those who speak critically about the military.
At the same time, the Pakistani spy agency remains a close ally of the CIA in the hunt for operatives with al-Qaeda. It is a relationship that often complicates the ability of the US to put pressure on Pakistan to alter its tactics.
According to one American law enforcement official,the FBI had originally hoped to arrest the two men working for the charity, the Kashmiri American Council, several times earlier this year but was told each time by the State Department or the CIA that the arrests would only aggravate the frayed relations between the US and Pakistan.
The indictments came as the CIA was trying to negotiate the release of a Pakistani doctor who was jailed by the ISI on accusations that he had helped the Americans track down Osama bin Laden before his killing.
Several Pakistani journalists and scholars in the US interviewed over the past week said that they were approached regularly by Pakistani officials, some of whom openly identified themselves as ISI officials. The journalists and scholars said the officials cautioned them against speaking out on politically delicate subjects like the insurgency in Baluchistan or accusations of human rights abuses by Pakistani soldiers. The verbal pressure was often accompanied by veiled warnings about the welfare of family members in Pakistan, they said.
One Pakistani journalist recalled an episode in December 2006 in which a Pakistani man filmed a public discussion about Pakistan’s tribal areas at the Kennedy School of Government at Harvard. The event’s organisers later learned the man was from the ISI.
A second Pakistani author said that at several conferences and seminars in recent years, representatives from the spy agency made their presence known by asking threatening questions.
“The ISI guys will look into your eyes and will indirectly threaten you by introducing themselves,” the author said. “The ISI makes sure that they are present in every occasion relating to Pakistan, and in some cases they pay ordinary Pakistanis for attending events and pass them information.”
Before the Kashmiri American Council case, little had been said publicly about the ISI’s operations in the US. In recent years, the Justice Department has brought several cases against defendants charged with supporting terror groups that have historically had ties to the ISI, including the Lashkar-e-Toiba, that carried out the 2008 attacks in Mumbai. But those cases too involved no allegations that the defendants were agents of the ISI.
आतंकी ठिकाने से गोला बारूद बरामद
पुंछ जिले के खनेत्र सेक्टर के मनूवाली जंगल से स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के जवानों ने तलाशी अभियान चलाया। इस दौरान एक आतंकी ठिकाने से भारी मात्रा में गोला बारूद बरामद किया है। डीएसपी ऑपरेशन जावेद इकबाल के नेतृत्व में इस अभियान को चलाया गया। इस दौरान जंगल में एक आतंकी ठिकाना मिला। जवानों ने आतंकी ठिकाने को ध्वस्त करके दो पिस्टल, दो पिस्टल मैगजीन, 28 पिस्टल की गोलियां, 115 एके राइफल की गोलियां, एक ग्रेनेड, चार रेडियो सेट, एक मोबाइल चार्जर के अलावा अन्य सामान को भी बरामद किया है। इस क्षेत्र के जंगलों में पुलिस के जवानों ने आतंकवादियों की तलाश में तलाशी अभियान को छेड़ रखा है।
कनाडा में संदिग्ध पाकिस्तानी आतंकवादी गिरफ्तार
कनाडा ने आतंकी संगठन से जुड़े एक संदिग्ध पाकिस्तानी युद्ध अपराधी को गिरफ्तार किया है। कनाडाई सरकार द्वारा मानवता के खिलाफ अपराध के दोषी 30 विदेशियों की तस्वीर जारी किए जाने के बाद यह दूसरी गिरफ्तारी है। कनाडा बॉर्डर सर्विसेज एजेंसी ने बताया कि पाकिस्तान का अरशद मोहम्मद (42) हिरासत में है। कनाडा के आव्रजन मंत्री जैसोन केनी के हवाले से सीबीसी न्यूज ने खबर दी कि अरशद आतंकी हमलों में शामिल पाकिस्तान स्थित एक इस्लामी संगठन से जुड़ा था। केनी ने बताया कि गुरुवार को एजेंसी द्वारा जारी तस्वीर के आधार पर पुलिस अधिकारी ने अरशद को पहचाना। उन्होंने कहा कि वह 1999 से इस देश में अवैध तौर पर रह रहा था। मोहम्मद की गिरफ्तारी सरकार द्वारा ऐसे 30 लोगों को चिह्नित होने के बाद हुई है जिन पर युद्ध अपराध या मानवता के खिलाफ अपराध के आरोप हैं। कनाडा ने 2000 में मानवता के खिलाफ अपराध के लिए वैश्विक न्याय क्षेत्र के एक संघीय कानून को लागू किया था।
जरुरी हो गया था बर्बरता दिखाना
: दूसरे विश्व युद्ध के बाद नॉर्वे में सबसे बड़ी हिंसा की घटना को अंजाम देने वाले नॉर्वियन नागरिक आंद्रे बेहरिंग ब्रिविक ने रविवार को अपना जुर्म स्वीकार कर लिया। ओस्लो में बम धमाके और उटोइया द्वीप पर किए जनसंहार को ब्रिविक ने बर्बर लेकिन जरूरी धर्मयुद्ध बताया। पुलिस को 1500 पेजों का एक घोषणापत्र भी मिला है जिसे ब्रिविक ने खुद इस कांड को अंजाम देने से पहले लिखा था। इसमें उसने मुस्लिमों के प्रति घृणा की बात को विस्तार से बताया है। इसके अलावा उसने दोनों घटनाओं को अकेले ही अंजाम देने का दावा भी किया। हालांकि कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इसमें एक और हमलावर भी शामिल था। हमले में करीब सौ लोग घायल हैं। कई अब भी लापता हैं। इस बीच मरने वालों की संख्या 93 हो गई है। रविवार को राजधानी ओस्लो में मृतकों का अंतिम संस्कार किया गया। पुलिस के अनुसार मृतकों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि उटोइया द्वीप पर गोलीबारी के दौरान बहुत से लोगों ने जान बचाने के लिए समुद्र में छलांग लगा दी थी। माना जा रहा है कि इनमें से कई किनारे पर पहुंचने से पहले रास्ते में ही डूब गए। गिरफ्तारी के बाद पहली बार 32 वर्षीय ब्रिविक ने अपने वकील के जरिए एक संदेश दिया। उसने कहा, मैं अपने कृत्य के बारे में विस्तार से बताना चाहता हूं। मैं सोमवार को अदालत में सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखूंगा। ब्रिविक ने अपनी इस हरकत को बर्बर तो कहा, लेकिन इसे बेहद जरूरी कदम भी करार दिया। ओस्लो के पुलिस कमिश्नर ने इस बात की पुष्टि की है कि ब्रिविक सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखेगा। पुलिस को अभी तक इस घटना में किसी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन की संलिप्तता के सबूत नहीं मिले हैं। आंखें खोलने वाली घटना : इस घटना ने नॉर्वे को अपनी अंतरआत्मा में झांकने का मजबूर कर दिया है। ओस्लो के चर्च की एक 42 वर्षीय पादरी ब्रिट एन्स ने कहा, यह सच्चाई है कि ब्रिविक नॉर्वियन है और इस बात ने देश के लोगों पर बहुत असर डाला है। एक तरह से यह अच्छा भी हुआ की इन घटनाओं के पीछे किसी मुस्लिम आतंकी गुट का हाथ नहीं निकला। एन्स ने आगे कहा, यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अप्रवासी और अन्य धर्मो के लोगों से असंवाद कितनी बड़ी समस्या पैदा कर सकता है। हमें अपनी आंखों को अब खोलना ही पड़ेगा। सरकार पर हमला : अमेरिका के पूर्व खुफिया अधिकारी रिचर्ड आयर्स के मुताबिक यह हमला सरकार पर किया गया है। ब्रिव्रिक अपनी सरकार की उस नीति से घृणा करता था जिसमें मुस्लिम अप्रवासियों को देश में ज्यादा से ज्यादा स्थान दिया जा रहा था। उसने इस नीति पर हमला किया, यानी यह सरकार पर हमला था। लंदन के थिंक टैंक के सदस्य जेम्स ब्रैंडन ने कहा कि ऐसे में जब हर देश मुस्लिम चरमपंथियों को सुरक्षा के लिए खतरा मान रहा है, नॉर्वे की इस घटना ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि गोरे दक्षिणपंथी चरमपंथी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनकर पैदा हो रहे हैं। खेती की आड़ में : उसने दस्तावेजों में बताया है कि किस प्रकार हमलों की तैयारी के लिए खनन और खेती का व्यवयास शुरू किया। ब्रिविक ने लिखा है, इसका मकसद यह था कि यदि मैं विस्फोटक सामग्री की खरीद या तस्करी के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता हूं तो मैं खनन और खेती के बिजनेस की आड़ लेकर खुद का बचाव कर सकता हूं। पूरा नॉर्वे इस घटना से सकते में है और यह समझ पाने में विफल है कि शांति के दूत के नाम से मशहूर यह देश कैसे इस प्रकार की हिंसा का शिकार हो सकता है। रविवार को नॉर्वे के किंग हेराल्ड पंचम, प्रधानमंत्री जेंस स्टोलटेनबर्ग और अन्य मंत्री ओस्लो कैथड्रेल में आयोजित एक प्रार्थना सभा में शामिल हुए। शुक्रवार को हुए हमले कार बम से शुरू हुए थे जिनमें स्टोलटेनबर्ग के कार्यालय समेत कई सरकारी इमारतों को निशाना बनाया गया था। ऐसा समझा जाता है कि हमलावर ने ओस्लो में कार बम विस्फोटों को अंजाम देने के बाद उटोइया द्वीप जाने के लिए नौका पकड़ी। उसने पुलिसवर्दी से मिलता जुलता स्वेटर पहन रखा था। द्वीप पर पहुंचने के बाद उसने खुद को बम हमले का जंाचकर्ता बताया और आटोमैटिक गन से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। हमलावर के पिता सकते में : ब्रिविक के पिता को जब से बेटे की करतूत की खबर मिली वह सकते में हैं। उसके पिता जेंस ब्रिविक ने नॉर्वे के अखबार वेरडेंस गेंग से कहा, मैं इंटरनेट पर खबरें पढ़ रहा था और तभी मैंने उसका नाम और तस्वीर देखी। मैं सकते में आ गया। जेंस फ्रांस में रहते हैं। जेंस ने बताया कि वह बेटे के बारे में ज्यादा नहीं जानते क्योंकि जब वह 16 साल का था, तबसे दोनों के बीच संपर्क नहीं हुआ।
26/11 के आरोपियों की आवाज के नमूने दे पाक
भारत ने मुंबई हमलों के सात आरोपियों की आवाज के नमूने मुहैया करने के लिए पाक पर दबाव डाला है और हमले के साजिशकर्ताओं को न्याय के दायरे में लाने के लिए त्वरित सुनवाई की भी मांग की। गृहमंत्री पी चिदंबरम ने दक्षेस देशों के गृहमंत्रियों की बैठक से इतर अपने पाकिस्तानी समकक्ष रहमान मलिक से मुलाकात के दौरान यह बात कही। रविवार को संयुक्त बयान में कहा गया है, भारत के गृहमंत्री ने उस अनुरोध का जिक्र किया, जो उनकी पिछली बैठक के बाद से पाकिस्तान में लंबित है। बयान में यह नहीं बताया गया कि अनुरोध क्या था। यह पाकिस्तानी गृहमंत्रालय में लंबित अनुरोध से जुड़े हैं। यह संभवत: भारत के उन अनुरोधों से जुड़ा है जिसके तहत मुंबई हमलों के सिलसिले में पाकिस्तान द्वारा गिरफ्तार किए गए सात आरोपियों की आवाज के नमूने मांगे गए थे। इन आरोपियों में लश्कर ए तैयबा का कमांडर जकी उर रहमान लखवी भी शामिल है। भारत उन आरोपियों की आवाज के नमूने मांग रहा है, जो 26 नवंबर 2008 के हमलों के दौरान 10 आतंकवादियों को निर्देश दे रहे थे। मलिक ने कहा कि पाक न्यायिक आयोग की यात्रा कराने पर काम कर रहा है। इस यात्रा का लक्ष्य मुंबई हमले के दौरान पकड़े गए कसाब का इकबालिया बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेट आरवी सावंत वाघुले का बयान रिकार्ड करना है। मलिक ने बताया कि यात्रा निर्धारित समय से पहले होगी। भारत मुंबई हमले के सिलसिले में एक जांच टीम को पाकिस्तान भेजेगा, जिसपर मार्च में नई दिल्ली में गृह सचिव स्तर की वार्ता के दौरान सहमति बनी
देश की आंतरिक सुरक्षा में सेंध लगा रहा बांग्लादेश
रांची भारत के दम पर जिस बांग्लादेश का निर्माण हुआ, दुर्भाग्य से वही हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा में सेंध लगा रहा है। झारखंड के सीमावर्ती इलाकों पाकुड़ जिले के 6 रास्तों से बांग्लादेशी घुसपैठियों का प्रवेश बदस्तूर जारी है। साहिबगंज व गोड्डा के भी कुछ हिस्से इनके प्रभाव क्षेत्र में हैं। इस रास्ते पशु, पत्थर, कोयला, लकड़ी, मादक पदार्थ, हथियार आदि की बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है। देह व्यापार भी इसका एक हिस्सा है। घुसपैठ की वजह से सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या असंतुलन की स्थिति तो उत्पन्न हो ही गई है, घुसपैठिए राज्य की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि बिहार, बंगाल, असम और झारखंड के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर ग्रेटर बांग्लादेश बनाने की नीयत से इन घुसपैठियों ने रिक्शा, ठेला, मजदूरी के विविध क्षेत्रों, कृषि, गृह निर्माण, ईट भट्ठों, लघु उद्योगों, छोटे व्यवसाय आदि पर बहुत हद तक कब्जा जमा लिया है। चोरी, अपहरण, महिलाओं पर अत्याचार, डकैती, तस्करी एवं अन्य आपराधिक घटनाओं के साथ-साथ आतंकी संगठनों को हथियार की आपूर्ति के अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए जाली नोटों के कारोबार तक में इनकी संलिप्तता उजागर हो रही है। आकलन के मुताबिक बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों से सटे झारखंड व बिहार की सीमा से हर वर्ष ढाई से तीन लाख घुसपैठिए देश की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। भाषाई समानता की वजह से ये आसानी से सीमावर्ती क्षेत्रों में अपने ठिकाने बना रहे हैं। पाकुड़ के पाकुडि़या, महेशपुर और समीपवर्ती इलाके, साहिबगंज के कोदालपोखर, राजमहल, बरहरवा, लालबथानी, गुमानी नदी के उस पार के कई गांव और निकटवर्ती इलाके, गंगा के दियारा क्षेत्र आदि इलाकों में इनकी मौजूदगी प्रमाणित हो चुकी है। चुनाव तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले इन घुसपैठियों को परोक्ष रूप से राजनीतिक दलों का भी संरक्षण प्राप्त है। मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और यूआइडी कार्ड से लैस ये घुसपैठिए संबंधित क्षेत्रों में बहुसंख्यक बन चुके हैं। एक बानगी : संथाल परगना के सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठियों की सक्रियता को भांपकर साहिबगंज के तत्कालीन उपायुक्त सुभाष शर्मा ने 2005-06 में 12 से 14 हजार लोगों को चिन्हित किया था। लगभग डेढ़ दशक पहले बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने के आरोप में पाकुड़ नगर थाना के डीएसपी व थानेदार जेल की हवा तक खा चुके हैं। तकरीबन छह माह पूर्व रेलवे पुलिस ने साहिबगंज में कई घुसपैठियों को धर दबोचा था। संथाल परगना क्षेत्र के विविध स्टेशनों से गाहे-बगाहे ये पकड़े जाते रहे हैं।
फई नेटवर्क के तार खंगाल रहा भारत
नई दिल्ली आइएसआइ के इशारे पर अमेरिका में भारत विरोधी जहर उगलते रहे गुलाम नबी फई की गिरफ्तारी के बाद नई दिल्ली ने फई-नेटवर्क के बिखरे तारों को टटोलने की कवायद तेज कर दी है। भारत की कोशिश है कि ब्रिटेन और बेल्जियम में भी फई जैसे पाक समर्थित कश्मीरी हमदर्दो की असली कारगुजारियां बेनकाब हों। सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत अपने तरीके से इस मामले पर काम कर रहा है और भारतीय एजेंसियां ब्रिटेन और बेल्जियम की जांच एजेंसियों के साथ संपर्क में हैं। साथ ही नई दिल्ली ने वाशिंगटन स्थित अपने दूतावास को फई नेटवर्क की पड़ताल में जारी एफबीआइ जांच पर भी पूरी नजर रखने की हिदायत दी है। सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तान से हासिल धन से अमेरिका में जनमत प्रभावित करने में लगे फई के आर्थिक तार भारत से जुड़े हैं या नहीं इसकी भी पड़ताल होगी। हालांकि इसके पहले नई दिल्ली अमेरिका में इसकी जांच पूरी होने का इंतजार कर रहा है। इस संबंध में अमेरिका के विधि विभाग के साथ भी भारत संपर्क में है। उल्लेखनीय है कि फई के कश्मीर एक्शन काउंसिल की ही तर्ज पर ब्रिटेन में नजीर शॉल और ब्रुसेल्स में अब्दुल मजीद ट्रांबू भी कश्मीर पर पाकिस्तानी रुख के खुले हिमायती हैं। इतना ही नहीं, फई के साथ दोनों का न केवल तालमेल है बल्कि कश्मीर एक्शन काउंसिल की ही तर्ज पर शॉल का जस्टिस फाउंडेशन एंड कश्मीर काउंसिल और ट्रांबू का कश्मीर सेंटर सेमीनार आयोजित करता रहा है। ऐसे में भारतीय खेमे को उम्मीद है कि करीब दो दशक से सक्रिय फई की गतिविधियों की परत उधड़ने के बाद ब्रिटेन और बेल्जियम में भी पर्दे के पीछे पाकिस्तान और खासकर आइएसआइ की आर्थिक मदद से चलने वाले कारगुजारियां भी जांच के घेरे में आएगी। फई की गिरफ्तारी के बाद भारतीय खेमा इस बात से खासा उत्साहित है कि पाकिस्तान की आर्थिक शह पर कश्मीर के अलगाववाद की खातिर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की दशकों से जारी साजिश बेपर्दा हुई है। सूत्र बताते हैं कि फई को लेकर भारत ने कई बार अमेरिका को आगाह किया था। सूत्र इस बात से भी इंकार नहीं करते कि लंबे समय से सक्रिय फई की गिरफ्तारी पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में आई खटास का नया नमूना है।
महताब की भी आतंकी संगठनों से साठगांठ
पूर्णिया किशनगंज के पौआखाली से पकड़े गए बांग्लादेशी आतंकी आकाश खान उर्फ रियाजुल के मामले की जांच में जुटी पुलिस व आइबी को हर रोज नई जानकारी हाथ लग रही है। पुलिस को इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि जिस महताब के घर में आकाश खान रहता था, उसके भी आतंकी संगठन से साठगांठ रही है। शक को महताब एवं आकाश खान की गिरफ्तारी के बाद उसके परिजनों के घर छोड़कर फरार होने की घटना ने और पुख्ता कर दिया है। पुलिस अब इसकी जांच में जुट गई है कि कहीं महताब के परिजन उस लैपटाप को लेकर फरार तो नहीं हो गए, जिसमें पकड़े गए आतंकी के कई राज थे। पुलिस को इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि महताब हर माह किसी खास व्यक्ति से मिलने दिल्ली व पश्चिम बंगाल जाता था। महताब के मोबाइल प्रिंट आउट भी इस मामले में कई राज उगल रहे हैं। उसके मोबाइल नंबरों से भी देश के कई शहरों में बात की गई है। पकड़े गए आतंकी आकाश खान के मोबाइल के स्क्रीन पर लिखा हुआ मिला, अल्लाह आपकी हिफाजत करे। यही वाक्य महताब के मोबाइल के स्क्रीन पर लिखा हुआ पाया गया है। पुलिस को पकड़े गए आतंकी के मोबाइल प्रिंट आउट से इस बात की जानकारी मिली है कि 13 जुलाई को जिस दिन बम विस्फोट की घटनाओं से मुंबई दहली थी, उस रात डेढ़ बजे तक उसने मुंबई के कई नंबरों पर बात की। कुछ नंबरों पर तो इसके बात करने का समय काफी लंबा है। इसके बाद 14 जुलाई को भी सुबह से ही इस आतंकी ने अपनी बातचीत का दौर शुरू कर दिया था। पुलिस और जांच एजेंसी इस बात की जांच कर रही है कि जब आकाश खान का कोई संबंध मुंबई से नहीं था तो वह किससे और इतने देर तक क्यों बात कर रहा था? आकाश खान ने सिर्फ इस बात को स्वीकार किया था कि कुछ वर्ष पूर्व उसने मुंबई के बांद्रा में रहकर एक बिल्डर के यहां काम किया था।
Sunday, July 24, 2011
India-B’desh border haat reopens after 40 years
‘Bilateral trade worth US $ 20 million will take place annually from the border haats’
By our Reporter
KALAICHAR (West Garo Hills), July 23: Union Minister of Commerce, Industry and Textiles Anand Sharma and his Bangladesh counterpart Muhammad Faruk Khan jointly inaugurated the border haat at Kalaichar in West Garo Hills district on Saturday.
Speaking on the occasion, Sharma said: “The haats will focus on the importance of restoring economic and commercial ties between the people living on both sides of the border.”
Kalaichar is about 70 km from Tura, the headquarters of West Garo Hills district, and is located close to Baliamari of Bangladesh’s Kurigram district.
Sharma also announced that the second border haat proposed at Balat on Indian side of the border and Lauwaghar in Bangladesh would also be inaugurated in October. “I am confident that the opening of border haats will make the border villages on both sides more prosperous through improved market accessibility for their locally produced goods. It is estimated that bilateral trade worth US $ 20 million will take place annually from the border haats,” he said.
It was an emotional moment when traders from both India and Bangladesh met with each other after 40 years. Once, a thriving centre of trade and commerce, the border haat was shut down after the creation of Bangladesh in 1971. Sharma recalled that during the recent visit of Indian External Affairs Minister to Bangladesh, the Bilateral Investment Promotion and Protection Agreement (BIPPA) had been exchanged to facilitate two-way investment. The agreement aims at creating favourable conditions for fostering and encouraging investments between the two countries.
Both the countries have made significant move to develop the power sector, including establishment of grid, supply 500 MW of power from India out of which 250 MW will be at a preferential rate. India responded positively to Bangladesh’s request for the setting up of a high-technology joint venture thermal power plant of 1320 MW capacity at Khulna, and has completed the feasibility report.
“Going back to my childhood time, I remember people carrying goods in bullock carts and proceeding towards Kalaichar for trading with their Bangladesh counterparts. Jackfruit is the most popular product during those days,” said Mukul Sangma, Meghalaya Chief Minister, in his speech during an impressive function held at Kalaichar.
Speaking to a vendor from Baliamari, Mohammad Abul Kasham said that the border haat would help people supplement their income. He also said that till the early 1970s, traders from both sides had converged along the two border villages of Kalaichar and Baliamari to do business.
“In those days, people would sell cows, bulls, bamboo products and clothes. I had witnessed those days personally,” Kasham said.
“This haat today symbolizes the will of the people. It is also a symbol of friendship and brotherhood,” said Mohammad Faruk Khan, Bangladesh Commerce Minister, while speaking on the occasion.
The border haats aim at promoting the well-being of the people dwelling in remote areas across the borders of India and Bangladesh by establishing traditional system of marketing of local produce. They also aim at reducing informal trade and prevention of cross-border smuggling.
The commodities traded shall be locally produced vegetables, food items, fruits, spices, minor local forest produce like bamboo, bamboo grass, and broom sticks (excluding timber), products of local cottage industries like gamcha and lungi; small locally produced agriculture household implements like dao, plough, axe, spade and chisel; locally produced garments, melamine products, processed food items, fruit juice and others. Commodities are allowed to be exchanged in the designated border haats in local currency and or on a barter basis.
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