Wednesday, August 24, 2011

उल्फा प्रमुख ने पाकिस्तान दौरा कबूला


उल्फा के प्रमुख अरविंद राजखोवा ने मंगलवार को माना कि असम में 1990 में ऑपरेशन बजरंग के समय वह पाकिस्तान चले गए थे। हालांकि इस बात से इंकार किया कि उनके संगठन को पड़ोसी देश के इस्लामिक कट्टरपंथियों का समर्थन प्राप्त था। साथ ही उन्होंने चीन से मदद मिलने की बात को भी नकार दिया। उनका कहना है कि अगर ऐसा सशक्त देश हमें मदद कर रहा होता तो हम बहुत पहले ही असम को आजाद कर लेते। राजखोवा ने कहा, ऑपरेशन बजरंग के दौरान हम पाकिस्तान अवश्य गए थे। क्योंकि उस समय हालात अलग थे। दुश्मन का दुश्मन हमारा दोस्त होता है। तब असम-भारत विवाद था। उन्होंने कहा कि यात्रा का यह अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान ने हमें सारे हथियार दिए थे। संगठन के लिए हमने विभिन्न स्रोतों से हथियार हासिल किए, जिनमें हथियारों के सौदागर और अन्य संगठन शामिल हैं। पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठनों द्वारा समर्थन को लेकर आई खबरों के संबंध में उल्फा प्रमुख ने कहा, हमारा संगठन सांप्रदायिकतावाद और कट्टरपंथ के खिलाफ है। इसलिए कट्टरपंथी संगठनों के साथ हमारे खड़े होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। राजखोवा ने कहा, हम न केवल पाकिस्तान गए, बल्कि हम बांग्लादेश, भूटान और म्यामां भी गए। हम यूरोप और अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक भी गए ताकि हम अपने लिए समर्थन जुटा सकें। किसी देश में रहने का यह अर्थ नहीं है कि उस देश ने हमारी मदद की। ऑपरेशन बजरंग को सेना ने 28 नवंबर 1990 में असम में उल्फा उग्रवादियों को निकाल बाहर करने के लिए शुरू किया था। परेश बरुआ समाधान के पक्ष में अरविंद राजखोवा ने संगठन में किसी तरह की टूट से इंकार किया है और यह दावा किया है कि कमांडर इन चीफ परेश बरूआ भी तीन दशक से चले आ रहे संघर्ष का समाधान चाहते हैं। एक साक्षात्कार में राजखोवा ने कहा, उल्फा में किसी तरह का विरोध है। यह सिर्फ मीडिया ही है जो कहती है कि संगठन के एक धड़े का नेतृत्व परेश बरुआ कर रहे हैं और दूसरे धड़े का नेतृत्व अरविंद राजखोवा। राजखोवा ने कहा कि हमारे संगठन का प्रधान सेनापति होने के नाते बरुआ संभवत: सैन्य समाधान चाहते हैं और अध्यक्ष होने के नाते मैं राजनीतिक समाधान चाहता हूं लेकिन हम दोनों इस संघर्ष का समाधान चाहते हैं। मैं बरूआ के संपर्क में हूं।




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