Friday, August 12, 2011

अशफाक की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर


नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने भारत की शान, स्वाधीनता और संप्रभुता के प्रतीक लालकिले पर हमले के दोषी पाकिस्तानी नागरिक लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की फांसी पर बुधवार को अपनी मुहर लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने अशफाक की अपील खारिज करते हुए सत्र अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा है। 22 दिसंबर 2000 को रात करीब 9:00 बजे लालकिला परिसर में गोलीबारी हुई थी, जिसमें सेना के तीन जवान शहीद हुए थे। इस मामले में सत्र अदालत व दिल्ली हाईकोर्ट ने अशफाक को फांसी की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति वीएस सिरपुरकर व न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की पीठ ने अशफाक के अपराध को जघन्य करार देते हुए कहा कि यह वह मामला है जिसमें विदेशियों ने भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर सीधा हमला किया है। यह भारत माता पर हमला है। पीठ ने कहा कि भारत में षड्यंत्रकारियों के लिए कोई जगह नहीं है। विदेशी नागरिक अशफाक गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसा और उसने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए षड्यंत्र रचा। भारतीय सेना के तीन जवानों की हत्या की और विभिन्न अन्य अपराधों को अंजाम दिया। इस मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दोषी को सिर्फ मौत की सजा ही दी जा सकती है। पीठ ने कहा कि लालकिला भारत की स्वाधीनता और संप्रभुता का प्रतीक है। प्रत्येक भारतीय की भावनाएं इससे जुड़ी हैं। यही वह जगह है, जहां से भारत के पहले प्रधानमंत्री ने आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को देश को संबोधित किया था और तब से आजतक यह परंपरा कायम है। सुप्रीम कोर्ट ने सजा के खिलाफ अशफाक की ओर से दी गई सारी दलीलें खारिज कर दीं। अशफाक की ओर से दलील दी गई थी कि विदेशी, विशेषकर पाकिस्तानी नागरिक होने के कारण जांच एजेंसी और अदालतें उसके प्रति दुर्भावना से ग्रसित थीं। सुप्रीम कोर्ट ने ये दलीलें खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन अपना मामला साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है। कोर्ट ने मामले के जांच अधिकारी और जांच टीम की तारीफ करते हुए कहा कि यह अपनी तरह का एक ऐसा उलझा केस था, जिसमें कोई सुराग नहीं था। जांच टीम ने सिर्फ एक पर्ची के सहारे जांच की। कोर्ट ने कहा कि इस मामले की जांच पूरी तरह निष्पक्ष स्वतंत्र और वैज्ञानिक है। अशफाक को प्रताडि़त करने का न तो कोई आरोप है और न ही सबूत। इसके अलावा निचली अदालत के दुर्भावनाग्रस्त होने के भी कोई प्रमाण नहीं हैं। अभियुक्त को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया गया था।





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