Monday, May 9, 2011

अमेरिका अब पैदा न करे नये ओसामा


विश्व राजनीति की दृष्टि से देखें तो उसामा बिन लादेन का सफाया मुसोलिनी और हिटलर के सफाये से भी ज्यादा गम्भीर घटना है। मुसोलिनी और हिटलर तो खुला युद्ध लड़ रहे थे। उनके शत्रु-राष्ट्रों को पता था कि वे दोनों कहां हैं और उनकी पराजय होते ही वे मारे जाएंगे या पकड़े जाएंगे लेकिन ओसामा बिन लादेन के बारे में यह भी पक्की तौर पर पता नहीं था कि वह जिंदा भी है या नहीं। यदि जिंदा है तो कहां है? प्रथम और द्वितीय विश्व-युद्ध सिर्फ पांच-पांच साल चले लेकिन ओसामा का युद्ध तो पिछले दस साल से चल रहा है। मुसोलिनी और हिटलर खुद दिखाई पड़ते थे, उनके सगुण-साकार राष्ट्र थे, फौजें थीं और उनके राष्ट्र-राज्यों की सीमाएं भी थीं लेकिन ओसामा के आतंक का साम्राज्य तो सारे संसार में फैला हुआ था। वह असीम राज्य था। वह अदृश्य भी था। इस असीम और अदृश्य रियासत के अमीर असामा को पकड़ना या मारना लगभग असम्भव हो गया था। उसके आगे विश्व-शक्ति अमेरिका भी अपंग सा लगता था। अमेरिका और उसके राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रतिष्ठा प्रतिदिन पेंदे में बैठती चली जा रही थी। ऐसे में ओसामा के उन्मूलन को न सिर्फ ओबामा की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए हैं बल्कि सारी दुनिया में अमेरिका की धाक दोबारा जमा दी है। अब कोई यह नहीं कह सकता है कि अमेरिका को बेवकूफ बनाना बहुत आसान है। पाकिस्तान लम्बे समय तक अपनी तिकड़म में सफल रहा। आतंकवाद की लड़ाई में अमेरिका का भागीदार बनकर उसने अरबों-खरबों डॉलर उलीचे और वह ओसामा तथा अन्य आतंकवादियों को संरक्षण भी देता रहा लेकिन एवटाबाद की कार्रवाई ने सिद्ध कर दिया है कि अमेरिकियों को पाकिस्तानी फौज या सरकार पर रत्ती भर विश्वास भी नहीं है।
पाकिस्तान सम्प्रभु राष्ट्र नहीं
अमेरिकी सरकार को अब यह सिद्ध करने की जरूरत नहीं रह गई कि पाकिस्तान ही आतंकवाद का गढ़ है। अब रिपब्लिकन ही नहीं, डेमोक्रेट सीनेटरों ने भी खुलेआम यह मांग शुरू कर दी है कि पाकिस्तान को दी जा रही तीन बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष की मदद काटी जाए। राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान शुद्ध दलाल या चतुर चमचा है, यह भी इस घटना ने सिद्ध कर दिया है। चार विदेशी हेलिकॉप्टर लगभग एक घंटे तक उसकी छाती पर सवार रहे और वह कुछ नहीं कर सका, इससे भी सिद्ध होता है कि वह सम्प्रभु-राष्ट्र नहीं है। इसके अलावा उसका प्रतिरक्षातंत्र कितना लचर है कि उसकी वायुसेना की नींद खुली, उसके पहले ही अमेरिकी हेलिकॉप्टर अपना नाम पूरा करके वापस चले गये। ऐसे राष्ट्र के पास परमाणु बमों का होना कितना खतरनाक है, इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। कोई भी आतंकवादी गिरोह उसके परमाणु अड्डों पर कब्जा कर सकता है। इस घटना ने अब यह आशंका भी पैदा कर दी है कि कहीं अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों को एक साथ नष्ट करने का संकल्प न कर ले, जैसा कि 1983 में इस्रइल ने एराक के ओसिराक संयंत्र को उड़ाया था। ऐसा करना बहुत ही खतरनाक सिद्ध हो सकता है लेकिन अब इससे भी बड़ा खतरा यह है कि पाकिस्तानी परमाणु शस्त्रों को कहीं आतंकवादी उड़ा न ले जाएं और वे सारी दुनिया में सर्वनाथ का माहौल खड़ा न कर दें। डर यही है कि पाकिस्तान कहीं विश्व-विध्वंस को शरण देने वाला अनाथालय नहीं बन जाए।
अमेरिका के पास बेहतरीन मौका
ऐसे में अमेरिका क्या करे? सलमान रश्दी कहते हैं कि पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जाए। यह घोषणा अब से दस साल पहले होती तो बिल्कुल सही होता। उस समय मैंने इसकी मांग की थी। अमेरिका जब 2001 में अफगानिस्तान में घुस रहा था तो उसने गलती की थी। उसे उस समय पाकिस्तान में घुसना चाहिए था। आतंकवाद की जड़ पाकिस्तान में थी और वह अफगानिस्तान के पत्तों पर मट्ठा छिड़क रहा था। अब भी अगर वह अफगानिस्तान से अपनी ससम्मान वापसी चाहता हो तो उसे पाकिस्तान के समस्त आतंकवादी अड्डों पर इसी तरह के सीधे हमले करने होंगे जैसा कि उसने एवटाबाद में किया है। यदि इन हमलों में पाकिस्तान उसका साथ देता है तो बहुत अच्छा, अन्यथा अमेरिका को अकेले ही टूट पड़ना चाहिए। पाकिस्तान के नेताओं में कोई दम नहीं है और फौज अमेरिका से बैर मोल लेने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान की जनता अमेरिका का विरोध नहीं करेगी और यदि स्थिति इसकी उलट हो तो निश्चय ही पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करवाकर उसे पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध थोपे जाने चाहिए। अमेरिका को यह ऐसा मौका हाथ लगा है, जबकि पाकिस्तान के नेताओं, फौज और आईएसआई का मनोबल रसातल को छू रहा है। पाकिस्तान की जनता भी बड़ी दुविधा में है। ओसामा की मौत पर क्या उसने कोई जश्न मनाया? बिल्कुल नहीं!
इसका अर्थ क्या है? इसका एक अर्थ यह भी है कि पाकिस्तान की जनता अमेरिका से खफा है। सच्चाई तो यह है कि सारी खुराफात की जड़ अमेरिका ही है। ओसामा बिन लादेन, हिकमतयार, हक्कानी, दादुल्लाह और अन्य मुजाहिदीन को अपने कंधे पर किसने बिठाया था? रूस के खिलाफ उन्हें अफगानिस्तान में किसने इस्तेमाल किया था? अमेरिका ने। ‘मियां की जूती अब मियां के सिर’ पड़ रही है। ओसामा के मारे जाने के बावजूद अफगानिस्तान से अमेरिका का छुटकारा आसानी से नहीं होने वाला है। यदि अमेरिका चाहता है कि अगले दो-तीन वर्षो में अफगानिस्तान से उसकी ससम्मान वापसी हो जाए तो उसे इस काम में पाकिस्तान सीधी मदद बिल्कुल नहीं करेगा। वह चाहेगा कि वहां या तो अमेरिका टिका रहे या उससे भी बेहतर यह हो कि चीन आकर टिक जाए ताकि उसकी दुकान चलती रहे। वह आतंकवाद और तालिबान से समझौते जैसे सवालों पर भी दोमुंही चालें चलता रहेगा। इसका उपाय एक ही है। अगले एक वर्ष में अमेरिका भारत की मदद से अफगानिस्तान में पांच लाख जवानों की मजबूत फौज खड़ी कर दे। यह फौज आतंकवादियों के धक्के तो छुड़ा तो छुड़ा ही देगी, उनके संरक्षकों की हड्डियों में भी कंपकंपी दौड़ा देगी। इस महान अभियान में पाकिस्तान को भी शामिल किया जाए लेकिन भारत-घृणा के कारण वह यदि साथ न आए तो अमेरिका से हकलाने की जरूरत नहीं है। वह उसे छोड़े और भारत की मदद से दक्षिण एशिया का उद्धार करे।
भारत भय से ग्रस्त है पाकिस्तान
यह ठीक है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपना पांचवां प्रांत बनाना चाहता है लेकिन उसकी विध्वंसक विदेश नीति का मूल मुद्दा कुछ और ही है। वह है, भारत भय! अमेरिका को अपनी पड़ी हुई है। उसने भारत के मुद्दे को अपना मुद्दा कभी बनाया ही नहीं। उसने न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर का बदला तो ले लिया लेकिन क्या उसे भारत की संसद, अक्षरधाम और मुम्बई के ताज होटल की भी कोई याद है? ओसामा के बाद अब क्या कभी इन कांडों के दोषियों पर भी सीधा हमला होगा? यदि नहीं तो अमेरिका को अफगानिस्तान के नाम पर बुद्धू बनाया जाता रहेगा। अमेरिका का सर्वोच्च कर्त्तव्य यह है कि वह पाकिस्तान को भारत-भय से मुक्त करे। भारत से फिजूल डरने और बांग्लादेश का बदला चुकाने की पाकिस्तानी हसरत का खमियाजा पाकिस्तानी जनता भुगत रही है। फौज उसकी छाती पर सवार है। पाकिस्तान उसको मिलने वाली हर सहायता का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है। वह सहायता रूसियों से या अफगानिस्तान के कम्युनिस्टों से या फिर चाहे आतंकवादियों से लड़ने के नाम पर ही क्यों न मिली हो। यदि अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान ‘चौपट राज्य’ न बन जाए तो उसे अपनी दक्षिण एशियाई नीति में कुछ मौलिक परिवर्तन करने होंगे और दूरदर्शिता का परिचय देना होगा। ओसामा के उन्मूलन के बाद यदि उसका मन इस क्षेत्र से उसी तरह उचट गया, जैसे कि काबुल की कम्युनिस्ट सरकार के गिरने के बाद उचटा था तो यह निश्चित मानिए कि सैकड़ों नये ओसामाओं को पैदा करने का दोष अमेरिका के माथे ही आएगा।

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