Tuesday, May 3, 2011

आतंक के प्रतीक का अंत


अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन का खात्मा आतंकवाद के सबसे बड़े प्रतीक का बहुप्रतीक्षित अंत है। दस वर्ष बाद ही सही, ओसामा का अंत अमेरिका के लिए एक उल्लेखनीय सफलता है। अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि वह अपने इरादों के प्रति अटल है और अपने शत्रुओं का सफाया करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ओसामा के खात्मे की सूचना सार्वजनिक होते ही अमेरिका और दुनिया भर में खुशी की एक लहर उमड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि एक ऐसे शख्स का अंत हुआ जो आतंक का पर्याय बन गया था, लेकिन यह मानकर नहीं चला जाना चाहिए कि ओसामा के अंत के साथ आतंकवाद के विरुद्ध छेड़े गए युद्ध का समापन हो गया। फिलहाल ऐसा कुछ होने के संकेत दूर-दूर तक नजर नहीं आते, क्योंकि अलकायदा का न केवल अनेक देशों में विस्तार हो गया है, बल्कि उसके जैसे अन्य अनेक संगठन भी उठ खड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक दशक में अलकायदा ने विचारधारा का रूप ले लिया है। आतंकवाद को खाद-पानी देने वाली इस विचारधारा का हाल-फिलहाल अंत होता नहीं दिखता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अलकायदा ने अमेरिका के नेतृत्व में छेड़े गए आतंकवाद विरोधी अभियान को इस्लाम पर हमले का रूप दे दिया है। यही कारण है कि अनेक मुस्लिम देशों में पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका के प्रति नफरत बढ़ती चली जा रही है। हालांकि जब से बराक ओबामा ने अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला है तब से वह यह स्पष्ट करने के लिए सक्रिय हैं कि अमेरिका अथवा पश्चिम का इस्लाम से कोई बैर नहीं, लेकिन अभी बात बनती नहीं दिखाई दे रही। इस्लाम का आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं, इस धारणा को बल देने के लिए मुस्लिम देशों के शासकों, बुद्धिजीवियों और धर्म गुरुओं को आगे आना चाहिए। सच तो यह है कि यह एक ऐसा कार्य है जिसमें दुनिया के सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए। ओसामा बिन लादेन जिस तरह पाकिस्तान की राजधानी से करीब सौ किलोमीटर दूर एक पाकिस्तानी सैन्य अकादमी के बिल्कुल निकट एक किलेनुमा घर में मारा गया उससे पाकिस्तान की न केवल पोल खुली है, बल्कि उसकी रही-सही प्रतिष्ठा भी तार-तार हो गई है। अब यह और अधिक स्पष्ट हो गया कि ओसामा इतने दिनों तक इसीलिए बचा रहा, क्योंकि उसे पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों का सहयोग, समर्थन और संरक्षण मिल रहा था। शायद यही कारण है कि ओसामा के मारे जाने के तत्काल बाद पाकिस्तान सरकार कोई प्रतिक्रिया देने से बचती रही। बाद में पाकिस्तानी सरकार और सैन्य प्रमुख की ओर से जो बयान जारी किए गए उन पर यकीन करना मुश्किल है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान एक बार फिर अपनी भद्द पिटने के बावजूद चिर-परिचित इनकार की मुद्रा अपनाने जा रहा है। भले ही अमेरिका और पाकिस्तान की ओर से यह कहा जा रहा हो कि ओसामा को मार गिराने के अभियान की भनक पाकिस्तानी सेना को नहीं थी, लेकिन यह संभव नहीं जान पड़ता। जानकारी के इस कथित अभाव के पीछे अमेरिका की भी अपनी कोई रणनीति हो सकती है और पाकिस्तान की भी। यदि अमेरिका अफगानिस्तान से लौटने की जल्दबाजी दिखाता है और वहां पाकिस्तान की भूमिका बढ़ जाती है तो इसका मतलब है ओसामा का अंत एक विशेष रणनीति के तहत हुआ। ऐसी कोई स्थिति भारत के लिए खतरे की घंटी ही होगी। यदि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद काबुल में पाकिस्तान का हस्तक्षेप बढ़ जाता है तो आतंकवाद का नए सिरे से उभार लेना तय है और यदि ऐसा हुआ तो भारत सबसे अधिक प्रभावित होगा। वैसे भी यह एक तथ्य है कि आतंकवाद का Fोत पाकिस्तान है, न कि अफगानिस्तान। समस्या यह है कि अमेरिका आतंकवाद की जड़ों पर ध्यान केंद्रित करने से इनकार कर रहा है। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि आतंकवाद विरोधी युद्ध का नेतृत्व करने वाला अमेरिका आतंकी संगठनों के सबसे बड़े समर्थक देश को न केवल अपना मित्र मान रहा है, बल्कि उसकी सहायता से आतंकवाद का खात्मा करने का स्वप्न देख रहा है। आतंकवाद का खात्मा तो तब होगा जब उसकी जड़ों को नष्ट किया जाएगा। बेहतर हो कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लिए प्रयासरत भारत और अधिक सतर्कता का परिचय दे, क्योंकि ओसामा बिन लादेन के खात्मे के बावजूद उसकी चिंताओं का समाधान होता नजर नहीं आता।


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