Monday, May 9, 2011

उनकी विरासत की जंग में झुलसेंगे भारत और अमेरिका


अमेरिकी सुरक्षा अनुसंधान संस्थान कान्रेजी एंडोवमेंट वाशिंगटन ने अमेरिकी कांग्रेस को ओसामा की मौत के बाद जो कुछ कहा वह हमें यानी भारत के विशेषज्ञों को काफी पहले से मालूम था। रक्षा और शांति के मामलों का अध्ययन करने के लिए विख्यात इस संस्थान को अमेरिका में ‘थिंक टैंक’ यानी बौद्धिक कोष माना जाता है। संस्थान के एक विशेषज्ञ ने अमेरिकी कांग्रेस के सामने बयान दिया कि ओसामा की मौत बाद पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन लश्कर अल कायदा का नेतृत्व संभालने की कोशिश कर सकता है। स्टीफन टेंकल को नहीं लगता कि वर्तमान स्थिति में लश्कर अल कायदा का अपहरण कर पाएगा लेकिन वे मानते हैं कि यह संगठन रिक्तता का लाभ उठा कर पाकिस्तान से बाहर एक विश्वव्यापी छवि बनाने का प्रयास तो करेगा ही। भारत में कुछ और हिंसाकांडों का आयोजन करते हुए लश्कर-ए-तैय्यबा अब अमेरिका के विरुद्ध भी प्रमुख आतंकवादी संगठन बन सकता है। टेंकल के अनुसार लश्कर ने छोटे-छोटे आतंकी संगठनों को अपने साथ मिला कर पाकिस्तान सेना और आईएसआई के पूर्व सिपाहियों, अधिकारियों और संदेशवाहकों की भर्ती बड़े पैमाने पर कर दी है।
लश्कर का कश्मीर जंग
इस बयान में अगर कोई नई बात है तो यह कि ओसामा की विरासत को हथियाने के लिए कई दावेदार हैं, जिनमें लश्कर अपने आप को भी शामिल करना चाहता है। लेकिन अल कायदा अब अफगानिस्तान या पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है। सभी अरब और अफ्रीकी देशों में इसकी सक्रिय शाखाएं हैं। लश्कर के लिए कश्मीर मुद्दे से अपने आप को अलग करना संभव नहीं और अतंरराष्ट्रीय भूमिका में आने की उसकी कोशिश के बावजूद लश्कर अपने क्षेत्रीय चरित्र से बाहर नहीं आ सकता। टेंकल का कहना है कि कश्मीर इस संगठन का प्रमुख सरोकार है लेकिन कश्मीर का मामला इतना स्थिर हो चुका है कि इस मोचेर्ं पर बहुत कुछ नाटकीय न कर पाने के बावजूद लश्कर भारत में और अमेरिकी हितों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयां तो कर ही सकता है। लादेन का पाकिस्तान में मारा जाना अमेरिका के लिए तात्कालिक तौर पर राहत का कारण हो सकता है लेकिन पाकिस्तान के जिन पड़ोसियों को पाकिस्तान में पनप रहे आतंकी हमलों के शिकार बनना पड़ता है, उन के लिए यह कोई राहत का कारण नहीं है। अल कायदा के शिखर नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा क्या रूप लेती है, यह अभी नहीं बताया जा सकता है। लेकिन जो बात तय है वह है कि पाकिस्तान में आतंकवादी गुटों के बीच नए माहौल में इस्लामी कट्टरता के विश्व अभियान में अपनी जगह तय करने की होड़ आरम्भ हो जाएगी।
तेज होंगे भारत पर हमले
इस प्रतिस्पर्धा में कश्मीर के बहाने भारत पर हमले तेज ही होंगे। पाकिस्तान में लश्कर ने आम तौर पर पाकिस्तान के सरकारी अमले या सरकारी संस्थाओं पर हमले नहीं किए हैं। सरकार या उसमें जमे हुए आईएसआई और दूसरे वगोर्ं के साथ लश्कर की लक्ष्य की सहमति रही है। दोनों का लक्ष्य कश्मीर को भारत से अलग करना रहा है। पाकिस्तान और लश्कर ने आम जनता के बीच अपनी यही छवि बना ली है। कश्मीर को मजहबी पुनरोत्थान के लिए एक बड़ा मील का पत्थर मान लिया गया है। इस लिए दोनों के बीच एक अघोषित समझौता है। पाकिस्तान को दूसरे आतंकवादी गुटों से बचाव के लिए भी लश्कर के कवच की आवश्यकता रही है लेकिन ओसामा की मौत के लिए उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करने वाले गुटों ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया तो वर्तमान पाक सरकार के लिए हालात बहुत नाजुक हो जाएंगे। अमेरिकी विशेषज्ञ का मानना है कि मुंबई कांड के बाद भारत और अमेरिका ने लश्कर को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान से कई बार अनुरोध किया लेकिन आज भी यह संगठन पाकिस्तान में सुरक्षित ही है।
पाक के वश का नहीं
इसका कारण अमेरिकियों की नजर में यह है कि पाकिस्तान सरकार को स्वयं भी आतंकवादी संगठनों से खतरा पैदा हो गया है और उन्हें काबू करना नागरिक सरकार के बस की बात नहीं रह गई है। ऐसी स्थिति में पाक सरकार को पूरी तरह पूरी तरह एक बंधुआ प्रशासन माना जा सकता है। ऐसे प्रशासन से अमेरिका को क्या उम्मीद है ? तार्किक तौर पर तो पाकिस्तान पर अब किसी प्रकार का भरोसा करना राजनीतिक बुद्धिमता नहीं कही जा सकती है लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान के मामले में इस तरह फंसा हुआ है कि बिना पाकिस्तान की सहायता के वह बहुत कुछ नहीं कर सकता है।
भारत के लिए जरूरी
इन हालात में भारत क्या कर सकता है? पाकिस्तान और अफगानिस्तान में काम करने वाले अतिवादी गुटों और इन देशों में सरकारों की ताकत और कमजोरियों का सही आकलन आवश्यक है। लश्कर के अतिरिक्त इस इलाके में दो और महत्त्वपूर्ण आतंकवादी ताकतें हैं, अल कायदा का संगठन जो अभी बिखरा नहीं है और तालिबान, जो आज भी सक्रिय है। तीनों के बीच कोई सामरिक सांठगांठ भारत और अमेरिका के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति पैदा कर सकती है। अल कायदा आज भी इस इलाके में बाहरी हस्तक्षेप की तरह है। जमीन पर इसका समर्थन भले ही हो, इस का निर्देशक मण्डल अधिकतर विदेशी ही है। समर्थ स्थानीय नेतृत्व के बिना यह इस क्षेत्र में अपने ही बूते नहीं टिक सकता है। तालिबान सही मायने में अफगानिस्तान की उपज हैं। इस मुहिम को अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों ने पाला-पोसा और एक लड़ाकू मशीन में बदल दिया था। सोवियत अतिक्रमण के दौरान सोवियत फौजों के विरुद्ध यह दोनों देशों का हरावल दस्ता था। अगर इस तंत्र को विघटित नहीं किया जा सकता है तो समरनीति का तकाजा है कि इसके साथ सौदा किया जाए। याद रखना होगा कि आज भी अमेरिका और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई का तालिबान के साथ संपर्क है। करजई ने कोशिश आरम्भ कर दी है कि तालिबान को प्रशासन में शामिल करके इस खतरे को समाप्त कर दिया जाए। बहुत से तालिबान नेताओं को इस बात का मलाल है कि पहले उन्हें अमेरिका और पाकिस्तान ने इस्तेमाल किया और जब वे जीत के निकट पहुंचे तो सागर पार से ओसामा आ पहुंचा। बीस बरस से प्यादों की तरह इस्तेमाल होने वाले कुछ तालिबान नेताओं के मन में बादशाह न सही, वजीर बनने की आकांक्षा उत्पन्न हो गई हो तो कोई आश्र्चय की बात नहीं होगी। अगर अमेरिका इस समर नीति पर चल रहा है तो कुछ और समय के लिए उसे पाकिस्तान को सहन करना ही होगा और भारत को चौकन्ना ही रहना होगा ।

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