सामरिक विश्लेषक अमेरिका को अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में इस्लामाबाद के करीब मार गिराने में जो सफलता मिली, उसका आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जंग में विशेष महत्व तो है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि 11 सितंबर की घटना के बाद जो लड़ाई छेड़ी गई थी वह जीत ली गई है। लादेन का मारा जाना अमेरिका के लिए एक प्रतीकात्मक सफलता है, खासकर राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए। लड़ाई इसलिए खत्म नहीं हुई है, क्योंकि वह विचारधारा अभी खत्म नहीं हुई है जिससे अल कायदा और लादेन ने पूरी दुनिया को डराया। इस विचारधारा की एक झलक लादेन के मारे जाने से एक दिन पहले ही अफगानिस्तान में आत्मघाती हमलावर के रूप में 12 वर्षीय एक बच्चे द्वारा किए गए बम विस्फोट से मिलती है। यदि कट्टरपंथ की जड़ें इतनी गहराई तक फैल चुकी हैं तो फिर एक लादेन को मार गिराने से काम खत्म नहीं हो जाता, फिर भी अमेरिका को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने बेहद सटीक खुफिया अभियान के जरिये एक तरह से पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान की नाक के नीचे आतंकवाद के सबसे बड़े प्रतीक को मार गिराया। अमेरिका की इस सफलता से पाकिस्तान का दोहरा चरित्र एक बार फिर उजागर हो गया है, जो एक ओर तो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का साथ देने का दिखावा करता है और दूसरी ओर लादेन सरीखे आतंकियों को अपने घर में पनाह देता है। यह स्वाभाविक नहीं जान पड़ता कि लादेन एक ऐसे स्थान पर छिपकर रह रहा था जो पाकिस्तानी सेना के एक ठिकाने से महज 6 सौ मीटर दूर है। पाकिस्तान के बारे में दुनिया यह अच्छी तरह जानती है कि वह हमेशा से इंकार की मुद्रा में रहा है। लादेन से लेकर अजमल कसाब और यहां तक कि अब्दुल कादिर खान के मामलों में उसने अपनी जिम्मेदारी को कभी स्वीकार नहीं किया। अब अमेरिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तान के रवैये में हमेशा नजर आने वाला विरोधाभास खत्म हो। अमेरिका इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि उसने जिस पाकिस्तान पर भरोसा किया उसने लगभग एक दशक तक लादेन को सुरक्षित बचाए रखा। ऐसा लगता है कि आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा पिछले दिनों जब वाशिंगटन गए थे तो उनको ओबामा प्रशासन ने यह इशारा कर दिया था कि अब अमेरिका अपने तरीके से कार्रवाई करेगा। ऐसा ही हुआ भी, क्योंकि इस थ्योरी को स्वीकार करना कठिन है कि इस्लामाबाद के आसपास रात में किसी अन्य देश के हेलीकॉप्टर उड़ान भरें और पाकिस्तानी सेना तथा खुफिया एजेंसी को इसका पता ही न चले। लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान में आतंकी तत्वों के पलटवार की आशंका इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि वहां कट्टरपंथी तत्व निरंतर मजबूत होते जा रहे हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब एक गवर्नर की एक कट्टरपंथी के हाथों हत्या होने के बाद उन्हें दफनाने के लिए एक भी मौलवी आगे नहीं आया था। ऐसा ही कुछ अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी की हत्या के बाद भी देखने को मिला। भट्टी के पक्ष में एक शब्द भी सुनने को नहीं मिला। पूरी दुनिया को अमेरिकी राष्ट्रपति के इस कथन पर ध्यान देना चाहिए कि लड़ाई इस्लाम के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जो इस्लाम के नाम पर बेगुनाहों का खून बहा रहे हैं। उनका यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दुष्प्रचार को भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में हवा दी जा रही है कि यह पश्चिम बनाम इस्लाम की लड़ाई है। जो लोग इस विचार को आगे बढ़ा रहे हैं वे लादेन को इस्लाम का प्रतीक बनाने पर लगे थे। नि:संदेह उनके हौसले पस्त हुए हैं, लेकिन इस विचार को परास्त करने में अभी लंबा समय लगेगा।
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