Monday, May 9, 2011

सारा दारोमदार अमेरिका पर


अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को आतंकवाद की शरणस्थली में मार गिराना अमेरिका की अब तक की अहम उपलब्धियों में एक है। एक आतंकी की मौत, खासकर वह आतंकी जिसकी तलाश दुनिया भर के मुल्कों को थी, जिसने आतंक के खौफ को जन्म दिया, पाला पोसा और बड़ा किया, कई मायनों में दुनियाभर की शांति के लिए श्रेष्ठकर है। लेकिन लादेन की मौत से कई कूटनीतिक और सामाजिक सवाल खड़े होते हैं। कूटनीतिक दायरे में कुछ अहम सवाल हैं-आखिर किसने लादेन को मारा अमेरिका ने या अमेरिका- पाकिस्तान साझा अभियान ने। या आतंकवाद का वह दलदल जिसे लादेन ने खुद तैयार किया था, लादेन की मौत के बाद अमेरिका की अगली कार्रवाई क्या होगी? अफगानिस्तान से नाटो सेना कब बाहर जाएगी? क्या अब पाकिस्तान में ड्रोन हमले बंद होंगे? क्या पाकिस्तान से अमेरिकी रिश्ते पहले से और बेहतर होंगे? या आतंकियों के पनाह देने के मसले पर पाकिस्तान अमेरिका के निशाने पर होगा? क्या 9/11 हमले के गुनहगार को मार गिराने से इंसाफ हो गया? क्या 26/11 हमले के गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए भारत को अकेले लड़ाई लड़नी होगी? इससे भी ज्यादा आतंकवाद से जुड़े सामाजिक सवाल हैं; क्या ओसामा की मौत से आतंकवाद का खात्मा हो गया? या, अब आतंकवाद और ख़्ातरनाक रूप लेगा? ओसामा को एक आतंकी बनाने के पीछे किस देश की सबसे अहम भूमिका थी? क्या अल कायदा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठन राज्य प्रायोजित आतंकवाद से भी बड़ा ख़्ातरा है? इनमें से ज्यादातर कूटनीतिक सवालों के जवाब अमेरिका के पास हैं और सब कुछ अमेरिका के अगले कदम पर ही निर्भर करेगा। आतंकवाद से जुड़े सामाजिक सवालों पर दुनिया भर के मुल्कों में व्यापक बहस और समान सहमति होनी चाहिए।
लड़ाई को पुख्ता पहचान मिली
बहरहाल, 11 सितम्बर 2001 को न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हुए आतंकी हमले के करीब 10 साल बाद अमेरिका को इतनी बड़ी कामयाबी मिली है। सचमुच यह ओबामा प्रशासन और अमेरिका के लिए राहत की खबर है। आर्थिक मंदी के दौर में भी अमेरिका ने अफगानिस्तान-पाकिस्तान में अरबों-खरबों डॉलर उड़ेले। वह भी तब जबकि दुनिया भर में आतंकवाद के नाम पर अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना हो रही थी। इस्लामिक मुल्कों में अमेरिका की छवि और बदतर हुई। अमेरिकी दृष्टिकोण से इसके काफी व्यापक मायने हैं इससे आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई को एक पुख्ता पहचान मिल गई। अब तक इस लड़ाई को ढकोसला बताने वाले देश भी अमेरिका की वाहवाही कर रहे हैं। अमेरिकी नागरिकों ने भी बदलाव के लिए ओबामा को राष्ट्रपति चुना था। एक तो मंदी की मार और ऊपर से अफगानिस्तान-इराक युद्ध में बेहिसाब खर्च ने अमेरिकी जनता को त्रस्त कर रखा था। चुनाव में ओबामा का चेहरा ज्यादा उदारवादी माना गया। अरब मुल्कों ने भी ओबामा को काफी सराहा लेकिन बदलाव के प्रतीक चिह्न ओबामा की सारी दूरदृष्टि पहले कार्यकाल में सटीक बैठ नहीं पाई। ऐसे में ओबामा ने खुद को बचाए रखने के लिए पूर्ववर्ती नेताओं का ही तरीका अपनाया। अब ओबामा फिर से राष्ट्रपति की चुनावी दौड़ में कूदने वाले हैं। ओसामा की मौत उनके लिए डूबते को तिनके के सहारे जैसा ही है।
आतंकवाद का सफाया बाकी
हालांकि वैश्विक जगत के लिए ओबामा को मार गिराना एक सांकेतिक कार्रवाई भर ही है। जेहादियों का प्रेरणास्रेत और आतंकवाद का सबसे बड़ा चेहरा ओसामा के खात्मे भर से आतंकवाद का सफाया नहीं हो जाएगा। इससे इतर इस्लामिक आतंकवाद के फलने-फूलने की आशंका और बढ़ गई है। एक ज़िंदा और कमजोर ओसामा दुनिया भर के लिए ज्यादा फायदेमंद था। सब जानते हैं कि पिछले दस सालों से ओसामा अफगानिस्तान की तोरा-बोरा पहाड़ियों से लेकर कबायली इलाकों में भागता फिर रहा था। कई ठिकानों को उसने बदले। ऐसे में लोगों के जेहन में उसका भगोड़ा चेहरा ज्यादा मूर्त रूप ले चुका है। ओसामा की मौत उसे आतंकियों के बीच शहीद का दर्जा दिलाता है। दरअसल, न्यूयॉर्क र्वल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका के आक्रामक रु ख को देखते हुए अलकायदा दबाव में आ गया था। इसके बाद जैसे-जैसे अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने हमले तेज किए, अलकायदा का जेहादियों पर से नियंतण्रउठता गया। साल 2005 में ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का गठन हुआ। इसमें अल कायदा समेत दुनिया भर के इस्लामी आतंकी संगठन शामिल हुए। मसलन, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए- तालिबान के आतंकी भी इस जमात में आए। इससे काफी हद तक इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा मिला और आतंकियों के बीच जेहाद सार्वभौमिक लक्ष्य बना। इस दौरान कई इस्लामिक देशों से फंडिंग हुई। यहां तक कई मुल्कों से परमाणु हथियार भी आतंकी संगठन को मिले।
लोकल ग्रुपों से ज्यादा खतरा
कूटनीति के स्तर पर माना जा सकता है कि साल 2005 में ओसामा बिन लादेन को मजबूती मिली है लेकिन इससे हटकर देखें तो जेहादी आंदोलन और आतंकवाद स्थानीय स्तर पर एक पेशा बनकर उभरा। पाकिस्तान-अफगानिस्तान के कबायली इलाकों में छोटे-छोटे आतंकी संगठनों का जन्म हुआ। लोकल ग्रुपों तक बम, बारूद और विस्फोटक पहुंचाए जाने लगे। देखा जाए तो आतंकवाद का सामंतवाद और बड़े आतंकियों का नियंतण्रटूटने लगा। ओसामा अपने लक्ष्य में सफल तो हुआ लेकिन उसका कद छोटा हो गया। मौजूदा आतंकवाद ओसामा बिन लादेन से काफी आगे चला गया है। ओसामा के जाने के बाद भी आतंकवाद का बाजार चलता रहेगा जो कि भारत और अमेरिका के लिए चिंता की बात है। इसमें संदेह नहीं कि लादेन ने अमेरिका और भारत को अपना शत्रु बताया था लेकिन उसके जाने के बाद ऐसा नहीं है कि भारत में आतंकवाद सिमट जाएगा। भारत में आतंकवाद को बढ़ाने के पीछे आईएसआई और खुद पाक फौज है। यानी भारत में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद है। तभी तो ओसामा के कमजोर पड़ने के बावजूद भारत में सीमापार से घुसपैठ और आतंकी हमले बढ़े हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान- अफगानिस्तान सीमा पर तालिबानी लड़ाकों और हक्कानी ग्रुप का खौफ बढ़ा है। इसलिए दक्षिण एशियाई देशों में आतंकवादी हरकतें कायम रहेंगी। यहीं नहीं, नाटो के ड्रोन हमले भी कबायली इलाकों में जारी रहेंगे। दरअसल, नाटो, जिसमें कई देश शामिल हैं, का इन इलाकों में हथियारों को खपाने का भी दबाव है।
सहमति का दिखावा जरूरी था
वैसे, आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान की दोहरी भूमिका एक फिर जगजाहिर हो गई है। इस्लामाबाद के पास दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी लादेन महल बनाकर रह रहा था और पाकिस्तान इससे बेखबर रहा। ओसामा की मौजूदगी की जानकारी भी अमेरिका से साझा नहीं की गई थी। सीआईए के ऑपरेशन से भी पाकिस्तान ने खुद को अलग रखा। लेकिन बराक ओबामा ने पाकिस्तान को धन्यवाद देकर मुहिम में गिलानी सरकार को शामिल कर लिया है। अमेरिका पाकिस्तान की गृह नीति और विदेश नीति को प्रभावित कर रहा था। ऐसे में एक आम सहमति का दिखावा जरूरी था। हाल ही में पाकिस्तान दौरे पर अमेरिकी कमांडर मुलेन ने आईएसआई को आतंकियों का मालिक बताया था। उधर, सीआईए प्रमुख पेनेटा ने साफ कर दिया है कि हमले की सूचना पाकिस्तान को नहीं दी गई थी क्योंकि डर था कि कहीं पाकिस्तान सूचना को लीक न कर दे। इस तरह से अब आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का कद और बढ़ जाता है। उसे भारतीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए कई सार्थक कदम उठाने होंगे। बगैर 26/11 के दोषियों को सजा दिलाए, इंसाफ की बात बेमानी है। (श्री सिंह और श्री नकवी के विचार श्री प्रभाकर की बातचीत पर आधारित)

No comments:

Post a Comment