खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान जरूरी
आतंकी हमलों को रोकने के लिए दुनिया भर के देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान अहम है। इसके लिए विकसित और विकासशील देशों में मजबूत खुफिया तंत्र की आवश्यकता है। भारत में आईबी और रॉ मजबूत खुफिया तंत्र हैं। अमेरिका के पास सीआईए है। यह वही सीआईए है जिसने ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान और सद्दाम हुसैन को इराक में ढूंढ़ निकाला। सीआईए को पेंटागन और एफबीआई से पूरा बैकअप मिलता है। इसी तरह से चीन और रूस के खुफिया तंत्रों का भी कोई सानी नहीं है। भारत में भी एक मजबूत और एकीकृत खुफिया तंत्र होना चाहिए जिसकी मुख्य कमान सीधे प्रधानमंत्री के हाथ में हो। इसके अलावा दूसरे मुल्कों के खुफिया तंत्रों के साथ बेहतर संबंध पर बल देने की भी जरूरत है।
विदेश नीति में आंतरिक सुरक्षा को तरजीह
कूटनीति के सिद्धांतों के मुताबिक सरकार बदल जाती है लेकिन विदेश नीति नहीं। भारत शुरू से ही पंचशील के सिद्धांतों का पालन करता रहा है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम अपनी विदेश नीति में व्यापक फेरबदल करें। हमें उन देशों पर कड़ी निगाह रखनी होगी जो हमारे देश की आतंरिक व्यवस्था को ध्वस्त करना चाहते हैं। मसलन पाकिस्तान को ही लीजिए। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाक फौज लगातार भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं लेकिन इससे इतर हम पाकिस्तान की गतिविधियों पर पर्याप्त निगाह नहीं रखते हैं। पड़ोसी मुल्कों की वैसी नीति जो हमें प्रभावित कर सकती है, उस पर एतराज जताना भी आधुनिक विदेश नीति है। इससे सामने वाला देश बचाव की मुद्रा में आ जाता है।
मजबूत काउंटर टेररिज्म की जरूरत
पिछले कु छ सालों में भारत ने मजबूत काउंटर टेररिज्म को विकसित किया है। लेकिन सच मानिए ये अभी भी नाकाफी है। हमें अपने देश के सुरक्षा तंत्र को चाक-चौबंद रखना होगा। इसके लिए काफी हद तक एक अलग सुरक्षा बल की स्थापना करनी होगी जिसे आतंकियों से लड़ने की विशेष शक्तियां प्राप्त हो। वैसे हमारे यहां नेशनल सिक्युरिटी फोर्स अच्छी तरह काम कर रहा है। 26/11 हमले के दौरान इस तंत्र ने बखूबी काम किया। लेकिन घटनास्थल पर पहुंचने और जवाबी कार्रवाई करने में काफी वक्त लगा। इसकी एक वजह एनएसजी की कई क्षेत्रीय इकाइयों का नहीं होना था। हालांकि सरकार अब नेशनल सिक्युरिटी हब्स का गठन करने का इरादा बना रही है। लेकिन इसमें त्वरित प्रतिक्रिया देने वाली टीम होगी या नहीं, इसका कोई विशेष उल्लेख नहीं है। दूसरी तरफ ओसामा पर अमेरिकी फोर्स के विशेष अंग नेवी सिल्स ने जिस तरह से हमले किए वह काबिले-तारीफ है। 40 मिनट में ऑपरेशन सफल हो गया और ओसामा बिन लादेन मारा गया। इससे भी हमें सबक सीखने की जरूरत है।
आतंकवाद पर सख्त कानून की दरकार
हमारे यहां आतंकवाद से लड़ने के लिए खास कानून नहीं है। सख्त कानून के तौर पर पोटा को लाया गया था। लेकिन ये अपने उद्देश्य में असफल रहा। दरअसल, आतंकवाद की जड़ पर प्रहार करने के लिए आतंकियों को सख्त सजा दिलानी होगी। इसके लिए पूरे न्यायिक तंत्र को चुस्त-दुरु स्त होना होगा। आतंकवाद सरीखे मुद्दे के लिए अलग कोर्ट की स्थापना होनी चाहिए जिसमें फास्ट ट्रायल के तहत मुकदमा चलाना और सजा दिलाना सम्भव हो सके। 9/11 हमले के बाद आतंकवाद से लड़ने के लिए अमेरिका ने काफी सख्त कानून बनाए। ग्वांतानामो बे में कै दियों के साथ अमानवीय व्यवहार के मामले भी सामने आए। हालांकि इतनी सख्ती की जरूरत नहीं है। लेकिन नरमी भी इतनी न हो कि कोई आतंकी वर्षो जेल में आराम से काट दे या मानवीय आधार पर रिहा हो जाए।
नागरिक रहें जागरूक
हमारे यहां आतंकी वारदातों के बाद एक-दो महीने तक नागरिक सजग रहते हैं। आस-पास की घटनाओं पर पैनी नजर रखी जाती है। लेकिन जैसे-जैसे आतंकी घाव पुराना होता जाता है हम टीस के आदी हो जाते हैं और पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। इस दौरान किसी सेलिब्रिटी की एयरपोर्ट पर चेकिंग हो जाती है तो काफी हो-हल्ला मच जाता है। बाजार में मौजूद सीसीटीवी खराब हो जाते हैं। बिना जान पहचान के नौकरों की भर्ती की जाती है और किसी अनजान शख्स को किराए पर मकान दे दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में काफी सतर्कता बरती जाती है। हमें वहां के नागरिकों की तरह सजग रहने की आवश्यकता है।
आतंकी मुल्कों को करें बेपर्दा
इस मुद्दे पर भारत की भूमिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम हो सकती है। अब तक के आतंकी हमले की जानकारी, उस पर भेजे गए डोजियर और सबूतों की मदद से भारत चाहे तो पाकिस्तान पर दबाव बना सकता है। खासकर इन दिनों में पाकिस्तान का लादेन के बारे में पैंतरा सभी मुल्कों के सामने बेपर्दा हो चुका है। अमेरिका भी इससे अच्छी तरह वाकिफ है। इंटरपोल, संयुक्त राष्ट्र संघ समेत दुनिया भर के फोरम पर हमें अपनी मांग को मजबूती से रखना होगा। तभी आतंकवाद पर नकेल कसी जा सकेगी।
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