Tuesday, May 3, 2011

एक सफलता है, लेकिन पूर्ण नहीं


संयुक्त राज्य अमेरिका ने अलकायदा नेता ओसामा बिन लादेन को मार दिया है और उसका शरीर प्राप्त कर लिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस घोषणा के साथ ही आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। इस समय लादेन का अलकायदा पर कितना प्रभाव था, यह कहना मुश्किल है, लेकिन लादेन अलकायदा का प्रतीक था और इसकी गतिविधियां उसी की कमांडिंग में संपन्न होती थीं। इसलिए लादेन की मौत का अलकायदा की मृत्यु जैसा मूल्य होना स्वाभाविक है। इसलिए अमेरिका इस घटना को महान विजय के रूप में घोषित कर सकता है, लेकिन क्या अलकायदा इसे आत्मोत्सर्ग या प्राणोत्सर्ग के रूप में घोषित करेगा? यह समझ पाना मुश्किल है कि इस समय इस घटना का अर्थ क्या निकाला जाए, लेकिन यह ओबामा प्रशासन को विजय की घोषणा करने की अनुमति अवश्य देती है। कम से कम अलकायदा पर आंशिक रूप से तो जरूर ही। इसने अफगानिस्तान से सम्मानजनक वापसी की शुरुआत के द्वार भी खोल दिए हैं। चूंकि अफगानिस्तान में अमेरिका का मिशन था अलकायदा को मात देना और लादेन की मौत से यह दावा किया जा सकता है कि मिशन पूरा हुआ। हालांकि आइएसआइ के पूर्व प्रमुख इसे राष्ट्रपति बराक ओबामा का झूठा प्रोपेगैंडा बता रहे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक अमेरिका पहले भी कई बार ऐसा कर चुका है। चूंकि हामिद गुल का तालिबान, लादेन और अलकायदा के प्रति हमेशा ही सहानुभूतिपूर्ण रवैया रहा है, इसलिए उनकी बात पर बहुत ध्यान देने की जरूरत नहीं है। फिलहाल ओबामा प्रशासन के लिए यह कई अर्थो में महत्वपूर्ण है। एक तो यही कि जुलाई 2011 से नाटो फौजों की वापसी की घोषणा की तिथि जैसे-जैसे करीब आ रही थी, वैसे-वैसे अमेरिका का दम फूल रहा था और अमेरिकी प्रशासन के पास यह जवाब नहीं था कि पिछले एक दशक में उसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर जो खर्च किया है, उसका अंतिम परिणाम सफलता के रूप में कितना आया है। उधर, राष्ट्रपति बराक ओबामा की गिरती हुई लोकप्रियता चिंता का विषय बनी हुई थी। खासकर दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव को देखते हुए। तीसरी यह कि अब अमेरिकी प्रशासन से पूछा जाने लगा था कि आखिर वह ओसामा का पता लगाने में अब तक नाकाम क्यों रहा? क्या वास्तव में उसकी मंशा लादेन को पकड़ने या मार देने की है? अब इन प्रश्नों पर तो विराम लग जाएगा, लेकिन अभी बहुत से ऐसे प्रश्न हैं, जिनका जवाब उसे देना है। पहला प्रश्न तो यही कि क्या वास्तव में अमेरिका अब तक जानता ही नहीं था कि लादेन अफगानिस्तान की तोरा-बोरा पहाडि़यों में छुपा है या फिर पाकिस्तान में पनाह लिए हुए है? क्या अमेरिका को यह पता नहीं था कि अलकायदा को पाकिस्तान की सेना और आइएसआइ संरक्षण प्रदान कर रही है? अक्टूबर 2010 में ही नाटो के सेना के एक प्रमुख कमांडर ने दावा किया था कि लादेन पाकिस्तान में है। मीडिया के माध्यम से इस अधिकारी ने बताया था कि लादेन और उसका खास सहयोगी अल जवाहिरी काबुल की किसी गुफा में नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिमी पााकिस्तान में पूरी सुविधाओं के बीच आइएसआइ के संरक्षण में छिपे हुए हैं। इस अधिकारी का तो यह भी दावा था कि तालिबान नेता मुल्ला उमर भी पाकिस्तान में पनाह लिए हुए है। आखिर यह खबर सच निकली। लादेन इस्लामाबाद से लगभग 150 किलोमीटर दूर एबटाबाद में एक महलनुमा आवास में छुपा था। लादेन भले ही अलकायदा का प्रतीक था, लेकिन पिछले आधे दशक में अलकायदा पूरी तरह से धु्रवीकृत हो चुका है। इस दौर में इसका नया स्वर्ग सोमालिया, यमन, चाड, नाइजीरिया, मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया बना। इस दौर में सोमालिया के कट्टरपंथी इस्लामी गुट यमन के इस्लामी विद्रोही, उत्तरी अफ्रीकी आतंकी समूह, जो अपने आपको अलकायदा इन द इस्लामिक मगरेब (एक्यूआइएम) कहता है, के बीच अजीब-सी एकता देखी गई है। 2005 के बाद से ही ये सभी संगठन नजदीकियां बनाने लगे थे, जिनका उद्देश्य था अमेरिका और यूरोप को कमजोर करना। इन स्थितियों को देखते हुए लादेन की मौत प्रतीकात्मक शक्ति को तो कमजारे कर सकती है, लेकिन धु्रवीकृत आतंकवाद की जो नई रणनीति विकसित हो चुकी है, उस पर शायद विशेष असर नहीं पड़ेगा। इसलिए यह एक अहम सफलता है, लेकिन आतंकवाद पर पूर्ण विजय नहीं।


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