अमेरिका में रविवार की देर रात जैसे ही यह खबर फैली कि राष्ट्रपति बराक ओबामा कुछ संदेश देनेवाले हैं, लोगों को समझते देर नहीं लगी कि सूचना क्या हो सकती है। उन्होंने जैसे ही कहा, 'न्याय किया जा चुका है (जस्टिस हैज बीन डन)' चारों ओर उत्साह की लहर फल गई। लोग न्यूयॉर्क के ग्राउंड जीरो तक पहुंचकर जश्न मनाने लगे। पिछले तीन-चार दिनों से संकेत मिलने लगे थे कि अमेरिकी फौजें ओसामा बिन लादेन के करीब पहुंच चुकी हैं। 9/11 के रूप में अमेरिकी अपनी पूंजावादी सभ्यता की उच्चतम आकांक्षाओं के प्रतीक र्वल्ड ट्रेड टावर का ध्वंस भूले नहीं हैं। 11 सितम्बर 2001 को वाशिंगटन में रक्षा विभाग के मुख्यालय और र्वल्ड ट्रेड टावर पर हवाई हमला हुआ था जिसमें 3000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। तबसे पूरा अमेरिका प्रतिशोध की ज्वाला में जी रहा था। इसलिए राष्ट्रपति द्वारा इस घोषणा के साथ कि ओसामा बिन लादेन उनके सैनिकों द्वारा पाकिस्तान में मारा जा चुका है और उसका शव कब्जे में ले लिया गया है, अमेरिकी लोग झंडा लिए खुशियां मनाने लगे। अमेरिका द्वारा एक दशक से भी ज्यादा समय से जारी आतंकवाद विरोधी युद्ध के संदर्भ में कई प्रश्न उठाए जा सकते हैं। पाकिस्तान की भूमि पर लादेन का होना बहुत बड़ा मुद्दा है पर इस समय अमेरिकी सैनिकों द्वारा लादेन को मारे जाने से बड़ा विजयोत्सव या रोमांचकारी घटना कुछ नहीं हो सकती। इसलिए ओबामा का इस क्षण को ऐतिहासिक कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं। ओबामा ने इसे अल कायदा को पराजित करने के राष्ट्र के प्रयास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। 9/11 हमले के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने लादेन को अमेरिका का दुश्मन नं. एक बताते हुए घोषणा की थी कि उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़ना हमारा लक्ष्य है। वह बुश का नहीं अमेरिका का संकल्प था, जो अब जाकर पूरा हुआ है। लादेन के मारे जाने की खबर के साथ ओबामा ने वक्तव्य जारी किया कि 'आतंक के विरुद्ध संघर्ष जारी रहेगा, लेकिन आज रात अमेरिका ने एक सुस्पष्ट संदेश दिया है कि चाहे जितना भी समय लगे, न्याय अवश्य किया जाएगा।'
बुश को अफसोस होगा तो केवल इसका कि उनके कार्यकाल में ऐसा क्यों नहीं हो सका। यह भी याद करना चाहिए कि 9/11 हमले के पूर्व सात अगस्त 1998 को केन्या व तंजानिया के अमेरिकी दूतावासों पर हमला करके अल कायदा ने 301 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। मरने वालों में 12 अमेरिकी भी थे। उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने प्रक्षेपास्त्र हमला किया था लेकिन लादेन बच गया। 2000 में अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस कोली पर भी लादेन की योजना से हमला हुआ जिसमें 17 लोग मारे गए थे। वास्तव में 1998 से सीआईए का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य लादेन का अंत करना था जो 11 सितम्बर के हमले के बाद सर्वप्रमुख राष्ट्रीय उद्देश्य बन गया। ओबामा ने बुश एवं क्ंिलटन दोनों से इस प्रगति पर बातचीत की कि उनका उद्देश्य साफ है। वे देश को इससे राष्ट्रीय एकता का संदेश देना चाहते हैं। यानी क्लिंटन से लेकर बुश और उन तक राष्ट्रीय संकल्प का क्रम बना रहा और जो परिणाम आया है, उसमें सबका योगदान है। दरअसल पिछले कुछ समय से दुनिया में इस बात पर लगभग सहमति हो चुकी थी कि लादेन को जिंदा पकड़ना या मारना दोनों में कुछ भी अमेरिका के वश का नहीं। कहा जाने लगा था कि लोदन अब एक रहस्य बना रहेगा। यानी वह मर जाए या जिन्दा रहे, अमेरिका उसकी पुष्टि तक करने की हालत में नहीं होगा। अमेरिका के आलोचकों का एक वर्ग ऐसा भी था जो कह रहा था कि लादेन काफी पहले मर चुका है, लेकिन युद्ध जारी रखने के बहाने के तौर पर अमेरिका इसे स्वीकार नहीं करेगा। समय ने सारी बातों का जवाब दे दिया है। सच कहा जाए तो लादेन दुनिया में असाधारण शैतान का स्थान प्राप्त कर चुका था। उसने जिस जेहाद की घोषणा की, उसने दुनिया भर में अनुसरणकर्ता पैदा किये। अल कायदा अन्य संगठनों की तरह विश्वव्यापी संगठित तंत्र न होकर जेहाद का मुख्य वैचारिक स्रेत बन गया। चाहे वह स्पेन के मैड्रिड पर 11 मार्च 2004 का हमला हो या लंदन के अंडरग्रांउड रेलवे पर 7 जुलाई 2005 का, इनका अल कायदा से सीधा संबंध स्थापित नहीं हो सका, लेकिन स्पष्ट था कि लादेन के अखिल विश्व जेहाद के नारे से प्रभावित होकर ये हमले किए गए। हाल में अमेरिका पर हमले के जितने प्रयास विफल हुए, सबके पीछे एकमात्र प्रेरणा लादेन का ही विचार था। अमेरिका ने इराक हमले के पीछे सद्दाम हुसैन के पास मारक हथियारों के साथ अल कायदा से संबंधों को भी आधार बनाया था। हालांकि सद्दाम से अल कायदा का सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ, पर वहां की अस्थिरता का लाभ उठा अल कायदा ने आतंकवादियों को जिस हिंसा के लिए प्रेरित किया उसमें करीब 5000 अमेरिकी सेना मारी गई। सच कहें तो लादेन अमेरिका के लिए एक ऐसी टीस बन चुका था, जिसका अंत ही नहीं दिखता था। अमेरिका लादेन के मामले में प्रकारांतर से पराजय की मानसिकता में ही जी रहा था। सात अक्टूबर 2001 को अफगानिस्तान पर हमले के कुछ ही देर बाद लादेन तोराबोरा की पहाड़ियों पर घिर गया था, लेकिन बचने में सफल रहा। तब से वह कुछ-कुछ अंतराल पर पहले वीडियो संदेश द्वारा और बाद में केवल ध्वनि संदेश द्वारा अमेरिका एवं उसके सहयोगी देशों को धमकी और चेतावनी देता रहा। एक ओर दुनिया भर में आतंकवाद विरोधी युद्ध पर अमेरिका का प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर से ज्यादा का खर्च और दूसरी ओर समय-समय पर धमकियां देता दुश्मन नंबर एक का दुस्सहास। विश्व की इस महाशक्ति के लिए इससे बड़ी टीस और क्या हो सकती थी। उसका हर बयान अमेरिका में भय का गहरा मनोविज्ञान पैदा कर देता था। सब जानते हैं कि वैश्विक आतंकवाद के संबंध में इस घटना का महत्व कितना बड़ा है किंतु ओबामा को भावी चुनौतियों का भान भी है। उन्होंने कहा कि ओसामा की मृत्यु हमारे प्रयासों का अंत नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि अल कायदा हम पर हमले का प्रयास जारी रखेगा। हमें सतर्क रहना चाहिए और हम रहेंगे। 11 सितम्बर हमले के बाद लादेन केवल एक व्यक्ति नहीं, ऐसा विचार पुंज हो चुका था जिससे प्रेरणा लेकर न जाने कितने मुस्लिम युवा दुनिया भर में खून और विध्वंस का तांडव मचाने और अपनी जान गंवाने को तैयार हो रहे थे। यह प्रक्रिया आज तक नहीं रुकी है। लादेन से मिलने वाले पत्रकारों ने अपने विवरणों में लिखा है कि उसके लड़ाके मृत्य से कतई नहीं डरते हैं। वस्तुत: जेहाद की भावना से मृत्यु को गले लगाने का जज्बा लादेन का ऐसा उत्पाद सिद्धांत है जिससे मुक्त होने में दुनिया को न जाने कितने वर्ष लगेंगे। जाहिर है, जो व्यक्ति अपने अनुसरणकर्ताओं के अंदर मृत्यु का भय समाप्त कर जान दे देने को सामान्य स्वभाव बना देता हो, उसकी मृत्य उस विचार के लिए बड़ी घटना नहीं हो सकती। इसलिए आतंकवाद विरोधी युद्ध में अभी कई मोड़ दिखेंगे। किंतु दूसरी ओर एक सच यह भी है कि उसके समर्थक व अनुसरण करनेवालों में एक बड़ा वर्ग यह भी मानने लगा था कि वह अलंघ्य है, उसको विजित नहीं किया जा सकता। वह अमेरिका को पराजित करके इस्लामी देशों को उसके प्रभाव से आजाद करा लेगा। ऐसे वर्ग के लिए ओसामा बिन लादेन की पराजय और मौत दोनों इतना बड़ा आघात है जिससे उबरना आसान नहीं होगा। अमेरिका सहित दुनिया को इस दूसरे पहलू का भी लाभ उठाने का प्रयास करना होगा।
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