ओसामा बिन लादेन की मौत से भले ही पश्चिमी देशों ने राहत की सांस ली हो, लेकिन इससे भारत की मुश्किलें बढ़ भी सकती है। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि आतंकियों की भर्ती से लेकर धन जुटाने में पूरी तरह आत्मनिर्भर भारत विरोधी आतंकी संगठन ओसामा की मौत को शहादत का दर्जा देते हुए अपनी गतिविधियां बढ़ा सकते हैं। इसके साथ ही अल कायदा के कमजोर होने की स्थिति में पाकिस्तान के कबाइली इलाकों में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन अपनी जड़ें भी जमा सकते हैं, जो भारत विरोध के लिए कुख्यात हैं। भारतीय खुफिया एजेंसी आइबी के पूर्व प्रमुख और विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक एके डोभाल के अनुसार भारत विरोधी आतंकी संगठन किसी भी रूप से अल कायदा पर निर्भर नहीं हैं। धन जुटाने से लेकर आतंकियों की भर्ती तक में वे खुद ही सक्षम हैं और इसके लिए उन्हें पाकिस्तान सरकार से खुला समर्थन मिला हुआ है। अब तक केवल बांग्लादेश स्थित हुजी भारत विरोधी गतिविधियों के लिए अल कायदा से आर्थिक व तकनीकी सहयोग लेता रहा है। इसके अलावा जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख अजहर मसूद के ओसामा से अच्छे संबंध थे। इसीलिए ओसामा समय-समय पर उन्हें आर्थिक मदद देता रहता था। जाहिर है इन दोनों संगठनों की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। भारतीय एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को पाक से मिल रहे खुले समर्थन को लेकर है। अल कायदा के कमजोर होने की स्थिति में भारत विरोधी ये संगठन पाक सरकार की मदद से कबाइली इलाकों में अपनी जड़ें जमा सकते हैं। वहीं डोभाल का मानना है कि अमेरिका के खिलाफ जेहाद में ओसामा को शहीद का दर्जा देकर कुछ आतंकी संगठन लोगों को कुर्बानी के लिए प्रेरित करने की कोशिश भी कर सकते हैं और इससे भारत में आतंकी गतिविधियां बढ़ सकती हैं। वहीं सेंटर फार कंफ्लिक्ट स्टडीज के अजय साहनी का मानना है कि भारत में आतंकी गतिविधियों का भविष्य पाकिस्तान पर पड़ने वाले अंतरराष्ट्रीय दबाव पर निर्भर करता है। उनके अनुसार ओसामा के पाकिस्तान में मिलने के बाद पाकिस्तान पर आतंकी की मदद रोकने के लिए जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा। पर इस दबाव के आगे पाकिस्तान के झुकने की स्थिति में ही भारत को आतंकियों से कुछ राहत मिल सकती है। भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनलाइसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख एएस दुल्लत का भी मानना है कि ओसामा की मौत का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा और हम केवल किनारे खड़े होकर ताली बजा सकते हैं।
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