अफगान रक्षा मंत्रालय में 18 अप्रैल को हुए आतंकी हमले से पता चलता है कि तालिबान किस तरह काबुल और इस्लामाबाद के खिलाफ सामरिक पैठ की बदनाम रणनीति पर अमल कर रहा है। पाकिस्तान की सेना और खुफिया तंत्र ने अपने पड़ोसियों की राज-व्यवस्थाओं में तोड़फोड़ के इरादे से परोक्ष युद्ध के लिए तालिबान का गठन किया था। तालिबान को सेना के विशेषज्ञों ने ट्रेनिंग दी थी और हथियार मुहैया कराए थे। लेकिन अब इस घातक सिद्धांत और सैन्य ट्रेनिंग का रुख पाक और अफगान की ओर ही मुड़ गया है। अच्छे या बुरे तालिबान के बारे में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। तालिबान की पहचान उग्रवाद, धार्मिक असहिष्णुता और राजनीतिक आतंकवाद है। पाकिस्तान राष्ट्र और सूफीवाद बराबर तालिबान के निशाने पर हैं। पिछले पांच सालों में पाकिस्तान में सूफी दरगाहों पर तालिबान हमलों में बराबर वृद्धि हुई है। डेरा गाजी खां में साखी सरवर की दरगाह पर हिंसक हमले से पहले भी पाकिस्तान की कई सूफी दरगाहों पर ऐसे हमले हो चुके हैं। ये हमले उस तालिबान के कारनामे हैं जो आतंकवाद के जरिए सत्ता हथियाना चाहते हैं और जो अपने से अलग विचारधाराओं को मानने वालों को तबाह करना चाहता है। तालिबान और अन्य जिहादी तत्वों द्वारा सूफी दरगाहों पर घातक हमलों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। पिछले साल पहली जुलाई को दाता दरबार, लाहौर की दरगाह पर हमला हुआ था। इसके बाद कराची में सूफी संत अब्दुल्ला गाजी की दरगाह पर हमला हुआ। इन हमलों के बाद पाकिस्तान और भारत में बाबा फरीद के नाम से मशहूर बाबा फरीदुद्दीन मसूद शहर गंज की दरगाह पर एक बम धमाका हुआ। सूफी दरगाहों पर हमलों का यह सिलसिला 2011 में भी जारी है। द्रोण गाजी खास जिले में सखी सरवर की दरगाह और इसके बाद बलूचिस्तान व खैबर पख्तूनख्वा में भी दरगाहों को निशाना बनाया गया। लगता है कि पाकिस्तान सरकार भी सीधे तालिबान से मुकाबले में डर रही है और जम्मू-कश्मीर में परोक्ष युद्ध तथा अफगानिस्तान में सामरिक पैठ के हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल करना चाहती है। उसकी तालिबान के खात्मे में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। आतंक के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई को समर्थन के बारे में इसने बड़े-बड़े दावे तो किए, पर इस लड़ाई की प्रमुख सेना तालिबान पर अंकुश लगाने और उसे पराजित करने के लिए उसने कुछ नहीं किया। दरअसल, आतंकवाद के खिलाफ कथित लड़ाई का नकारात्मक असर हुआ है। इसने अमेरिका के कथित सहयोगी देश पाकिस्तान में ही अमेरिका के खिलाफ माहौल को जन्म दिया है। पाकिस्तान का दुलारा आतंकी बच्चा अब खुद पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए एक भारी खतरे के रूप में उभर रहा है। पाक आर्मी और पुलिस प्रशासन पर आए दिन हमले हो रहे हैं। पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में तालिबान के मदरसे और ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं। सरकार उनकी ओर से आंखें फेर लेती है और सेना उन्हें देख कर संतुष्ट होती है। इस बारे में हर कोई जानता है, लेकिन बोलता नहीं। तालिबान की ताकत बढ़ती जा रही है और वह राष्ट्र को कमजोर करने की उम्मीद लगाए बैठा है। राष्ट्र तो अपनी भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं में बंधा है, जबकि तालिबान के लिए कोई सीमा, राष्ट्रीयता और पैसे की कमी नहीं है। राजनयिक रूप से पाकिस्तान के हमदर्द कई मुस्लिम देशों से उन्हें रंगरूट, साजोसामान और पैसा मिल जाता है। सलमान तसीर की हत्या ने दिखा दिया कि अपने एक सूत्रीय एजेंडे के लिए यह आतंकी तंत्र किस हद तक जा सकता है। असल लड़ाई तालिबान की सामरिक पैठ और पाक व अफगान राष्ट्रों के बीच है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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