दुज््रनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का खात्मा घोषित करने के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आतंकी इरादों को भांपते हुए खुलासा किया था नि:संदेह उसके संगठन अलकायदा के हमारे खिलाफ हमले जारी रहेंगे। हमें देश के अंदर तथा बाहर अपनी चौकसी बनाए रखनी है। बिन लादेन की मृत्यु के बारे में व्हाइट हाउस से जारी ओबामा के बयान के अनुसार यह अलकायदा की मौत नहीं है।’ निश्चित ही ओसामा की मौत से आतंकवाद के विरुद्ध मुहिम में पूर्ण विजय प्राप्त करने की सोच युक्तिसंगत नहीं होगी। बहरहाल, फौजी कार्यवाही करना एक आवश्यक विकल्प है अलबत्ता, ‘यह हथियार’ केवल एक आतंकी इरादे को विफल कर सकने में कामयाब हो सकता है। लेकिन इसके द्वारा आतंकवाद को जड़ से हटा सकना सम्भव न होगा। इसके लिए राजनीतिक तथा आर्थिक रास्ते अपनाने पड़ेंगे। इस अभियान में खुफिया और सुरक्षा यंत्रों का प्रयोग करते हुए अन्य देशों की मदद एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग परमावश्यक है। जहां तक आतंकवाद के समूल सफाये का मुद्दा है, यह विचार किया जाना आवश्यक है कि इस सम्बंध में क्या अन्य कोई रास्ता कामयाब हो सकेगा? शायद नहीं! वजह यह कि वर्तमान आतंकी केवल राजनीति या सिद्धांतों से प्रेरित नहीं है। उनकी नजर मूलत: आर्थिक मुद्दों पर है। आतंकवाद में बड़ी रकम लगी हुई है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद तथा बहुदेशीय अपराधों की परिधि 15 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की है। 1998 के आंकड़ों के आधार पर यह ब्रिटेन के जीडीपी का 17 प्रतिशत अंश है। अत: ऐसे संकट के मुकाबले के लिए उतने बड़े पैमाने पर तैयारी करनी पड़ेगी। उदाहरण के लिए पाकिस्तान ने आतंकवाद का सामना करने के निमित्त अमेरिका से दो सौ करोड़ डॉलर की मदद हासिल करने में सफलता प्राप्त कर ली। यह सर्वविदित तथ्य है कि आतंकवाद का हथियारों की तस्करी व कबूतरबाजी से सीधा सम्बंध है। शस्त्रों की अवैध बिक्री, मानव तस्करी, तेल एवं हीरे की गैरकानूनी खरीद-फरोख्त से आतंकी पनप रहे हैं। यही नहीं, दुनिया भर में अनगिनत समाजसेवी संस्थाओं का असली धंधा भी वास्तव में कालाबाजारी तथा अवैध व्यापार है। नशीली वस्तुओं के बाजार में आतंकियों की प्रमुख भूमिका है। विश्व में चोटी की व्यापारिक संस्थाओं तथा नामी बाजारों में आतंकियों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। परोक्ष रूप में उन्हें इस्लामी बैंक तथा समाजसेवी संस्थाओं से मदद मिल रही है। प्राय: अपने मुख्यालयों की नजर बचाकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्थानीय मैनेजर इन खतरनाक मुजरिमों की सहायता करते हैं। इन्हीं हरकतों से फिलिस्तीन लिबरेशन आग्रेनाइजेशन (पीएलओ) तथा हमास ने अपनी माली हालत काफी मजबूत कर ली है। अराफात के खुफिया खजाने में 700 मिलियन से दो बिलियन अमेरिकी डॉलर राशि जमा थी। आर्थिक रूप से इतने सम्पन्न आतंकियों का सामना करना आसान नहीं है। यही वजह है कि यूरोप ने आतंकवाद के खिलाफ मुहिम की एक कारगर नीति बनायी हुई है। इसके तहत आतंकवाद से बचाव व सुरक्षा के साथ उसका पीछा करने तथा सही अवसर पर समुचित प्रत्युत्तर देने पर ध्यान केंद्रित रखा गया है। ऐसा नहीं कि इतने मात्र से आतंकवाद को परास्त करने में कामयाबी मिली है लेकिन जब भी कोई चुनौती आयी है यूरोप के तमाम सुरक्षा विशेषज्ञों ने इसी कूटनीति के मुताबिक प्रभावी कार्रवाई की है। अकेले ओसामा बिन लादेन के न रहने से दुनिया में अलकायदा की पकड़ कमजोर नहीं होगी। अब अन्य अनुभवी आतंकी ओसामा की गद्दी संभालने के लिए आगे बढ़ेंगे। बहुत से सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अब नई पीढ़ी के आतंकवादी भी अधिक जिम्मेदारी निभाने के लिए तत्पर होंगे। आतंकवाद से निपटने के लिए जो सबसे जरूरी दिखता है वह यह कि अब देखा जाए कि अलकायदा तथा उससे सम्बंधित अन्य आतंकी दस्तों के फिलहाल क्या इरादे हो सकते हैं? सम्भवत: अब वे किसी बड़ी स्टाइल से अपनी ताकत की नुमाइश अमेरिका में करेंगे, या फिर आईएसआई के इशारे पर तालिबान व अन्य आतंकी तत्वों को भारत के विरुद्ध कार्यवाई के लिए उकसाना चाहेंगे। मुमकिन है कि वे भारत में उल्फा, बोडो या माओवादी इकाइयों की मदद के लिए बढ़ें। यह भी हो सकता है कि अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने की स्थिति में अलकायदा के आतंकवादी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की ओर अपना रुख अपनाएं। इसके अतिरिक्त ऐसे ‘नान स्टेट एक्टर’ अब परमाणु हथियारों को हासिल करने का प्रयास कर सकते हैं। पाकिस्तान के पंजाब राज्य में पैठ रखने वाले लश्कर- ए- तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद ‘इस्लामाबाद’ के इशारे पर ही सक्रिय हैं। ओसामा बिन लादेन के अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक मोर्चे की सदस्यता स्वीकार करते हुए ये अपने इरादों में अलकायदा के समर्थक रहे हैं। भारत में सक्रिय अन्य आतंकी दस्तों- लश्कर- ए- तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन, हरकत उल जिहादे इस्लामी, जमाइतुल मुजाहिदीन और जमातुल उद दावा आदि का भी इनसे किसी न किसी रूप में जुड़ाव रहा है। सोचना होगा कि इन हालात में भारतीय सुरक्षा के लिए क्या विकल्प हैं? मुम्बई हमले के बाद से पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय जनमत के आक्रोश को कम करने के मकसद से शांति के लिए ठोस कदम उठाने में समझदारी है लेकिन यह समय अपनी निगरानी में कोई कमी करने का नहीं है। देश की हिफाजत में कोई लापरवाही करना सुरक्षा की दृष्टि से घातक होगा। आतंकवादियों की सरगर्मियों का निशाना प्राय: सीमावर्ती इलाके होते हैं। इसलिए उन क्षेत्रों में सुरक्षा की बहुआयामी नीति बनायी जानी चाहिए और इसमें वहां विकास कायरे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि वहां के लोग अभावग्रस्तता से मुक्ति के उपायों की तलाश में भटक न सकें। ऐसे कुछ कदमों में सभी सीमावर्ती प्रदेशों में विकास योजनाओं की समान नीति सबसे जरूरी है। सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ औद्योगिक इकाइयों तथा बड़े कार्यालयों की सीमावर्ती इलाकों में स्थापना प्राथमिकता के साथ की जानी चाहिए। इन इलाकों में पिछड़े वगरे पर विशेष ध्यान दिया जाना भी जरूरी है ताकि उन्हें भारत विरोधी ताकतें गुमराह न कर सकें। गरीबी, अभावग्रस्तता के चलते हमेशा ही इसका अंदेशा बना रहता है। इन क्षेत्रों के लोगों की महानगरों की ओर विस्थापना रोकी जानी चाहिए। नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार सीमा पर द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने की नीति आतंकवाद पर रोकथाम के लिए प्रभावी कदम हो सकता है। इसके साथ पड़ोसी देशों की तुलना में अपने सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक तथा सैनिक क्षमता में वृद्धि का कार्यक्रम भी बनाया जाना चाहिए जिससे पड़ोसी देश भारत विरोधी कदम उठाने से तो सावधान रहें ही, वे भारत विरोधियों की मदद करने का भी विचार न रख सकें।
Monday, May 9, 2011
आतंक के बाजार पर चोट कीजिए
दुज््रनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का खात्मा घोषित करने के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आतंकी इरादों को भांपते हुए खुलासा किया था नि:संदेह उसके संगठन अलकायदा के हमारे खिलाफ हमले जारी रहेंगे। हमें देश के अंदर तथा बाहर अपनी चौकसी बनाए रखनी है। बिन लादेन की मृत्यु के बारे में व्हाइट हाउस से जारी ओबामा के बयान के अनुसार यह अलकायदा की मौत नहीं है।’ निश्चित ही ओसामा की मौत से आतंकवाद के विरुद्ध मुहिम में पूर्ण विजय प्राप्त करने की सोच युक्तिसंगत नहीं होगी। बहरहाल, फौजी कार्यवाही करना एक आवश्यक विकल्प है अलबत्ता, ‘यह हथियार’ केवल एक आतंकी इरादे को विफल कर सकने में कामयाब हो सकता है। लेकिन इसके द्वारा आतंकवाद को जड़ से हटा सकना सम्भव न होगा। इसके लिए राजनीतिक तथा आर्थिक रास्ते अपनाने पड़ेंगे। इस अभियान में खुफिया और सुरक्षा यंत्रों का प्रयोग करते हुए अन्य देशों की मदद एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग परमावश्यक है। जहां तक आतंकवाद के समूल सफाये का मुद्दा है, यह विचार किया जाना आवश्यक है कि इस सम्बंध में क्या अन्य कोई रास्ता कामयाब हो सकेगा? शायद नहीं! वजह यह कि वर्तमान आतंकी केवल राजनीति या सिद्धांतों से प्रेरित नहीं है। उनकी नजर मूलत: आर्थिक मुद्दों पर है। आतंकवाद में बड़ी रकम लगी हुई है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद तथा बहुदेशीय अपराधों की परिधि 15 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की है। 1998 के आंकड़ों के आधार पर यह ब्रिटेन के जीडीपी का 17 प्रतिशत अंश है। अत: ऐसे संकट के मुकाबले के लिए उतने बड़े पैमाने पर तैयारी करनी पड़ेगी। उदाहरण के लिए पाकिस्तान ने आतंकवाद का सामना करने के निमित्त अमेरिका से दो सौ करोड़ डॉलर की मदद हासिल करने में सफलता प्राप्त कर ली। यह सर्वविदित तथ्य है कि आतंकवाद का हथियारों की तस्करी व कबूतरबाजी से सीधा सम्बंध है। शस्त्रों की अवैध बिक्री, मानव तस्करी, तेल एवं हीरे की गैरकानूनी खरीद-फरोख्त से आतंकी पनप रहे हैं। यही नहीं, दुनिया भर में अनगिनत समाजसेवी संस्थाओं का असली धंधा भी वास्तव में कालाबाजारी तथा अवैध व्यापार है। नशीली वस्तुओं के बाजार में आतंकियों की प्रमुख भूमिका है। विश्व में चोटी की व्यापारिक संस्थाओं तथा नामी बाजारों में आतंकियों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। परोक्ष रूप में उन्हें इस्लामी बैंक तथा समाजसेवी संस्थाओं से मदद मिल रही है। प्राय: अपने मुख्यालयों की नजर बचाकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्थानीय मैनेजर इन खतरनाक मुजरिमों की सहायता करते हैं। इन्हीं हरकतों से फिलिस्तीन लिबरेशन आग्रेनाइजेशन (पीएलओ) तथा हमास ने अपनी माली हालत काफी मजबूत कर ली है। अराफात के खुफिया खजाने में 700 मिलियन से दो बिलियन अमेरिकी डॉलर राशि जमा थी। आर्थिक रूप से इतने सम्पन्न आतंकियों का सामना करना आसान नहीं है। यही वजह है कि यूरोप ने आतंकवाद के खिलाफ मुहिम की एक कारगर नीति बनायी हुई है। इसके तहत आतंकवाद से बचाव व सुरक्षा के साथ उसका पीछा करने तथा सही अवसर पर समुचित प्रत्युत्तर देने पर ध्यान केंद्रित रखा गया है। ऐसा नहीं कि इतने मात्र से आतंकवाद को परास्त करने में कामयाबी मिली है लेकिन जब भी कोई चुनौती आयी है यूरोप के तमाम सुरक्षा विशेषज्ञों ने इसी कूटनीति के मुताबिक प्रभावी कार्रवाई की है। अकेले ओसामा बिन लादेन के न रहने से दुनिया में अलकायदा की पकड़ कमजोर नहीं होगी। अब अन्य अनुभवी आतंकी ओसामा की गद्दी संभालने के लिए आगे बढ़ेंगे। बहुत से सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अब नई पीढ़ी के आतंकवादी भी अधिक जिम्मेदारी निभाने के लिए तत्पर होंगे। आतंकवाद से निपटने के लिए जो सबसे जरूरी दिखता है वह यह कि अब देखा जाए कि अलकायदा तथा उससे सम्बंधित अन्य आतंकी दस्तों के फिलहाल क्या इरादे हो सकते हैं? सम्भवत: अब वे किसी बड़ी स्टाइल से अपनी ताकत की नुमाइश अमेरिका में करेंगे, या फिर आईएसआई के इशारे पर तालिबान व अन्य आतंकी तत्वों को भारत के विरुद्ध कार्यवाई के लिए उकसाना चाहेंगे। मुमकिन है कि वे भारत में उल्फा, बोडो या माओवादी इकाइयों की मदद के लिए बढ़ें। यह भी हो सकता है कि अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने की स्थिति में अलकायदा के आतंकवादी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की ओर अपना रुख अपनाएं। इसके अतिरिक्त ऐसे ‘नान स्टेट एक्टर’ अब परमाणु हथियारों को हासिल करने का प्रयास कर सकते हैं। पाकिस्तान के पंजाब राज्य में पैठ रखने वाले लश्कर- ए- तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद ‘इस्लामाबाद’ के इशारे पर ही सक्रिय हैं। ओसामा बिन लादेन के अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक मोर्चे की सदस्यता स्वीकार करते हुए ये अपने इरादों में अलकायदा के समर्थक रहे हैं। भारत में सक्रिय अन्य आतंकी दस्तों- लश्कर- ए- तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन, हरकत उल जिहादे इस्लामी, जमाइतुल मुजाहिदीन और जमातुल उद दावा आदि का भी इनसे किसी न किसी रूप में जुड़ाव रहा है। सोचना होगा कि इन हालात में भारतीय सुरक्षा के लिए क्या विकल्प हैं? मुम्बई हमले के बाद से पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय जनमत के आक्रोश को कम करने के मकसद से शांति के लिए ठोस कदम उठाने में समझदारी है लेकिन यह समय अपनी निगरानी में कोई कमी करने का नहीं है। देश की हिफाजत में कोई लापरवाही करना सुरक्षा की दृष्टि से घातक होगा। आतंकवादियों की सरगर्मियों का निशाना प्राय: सीमावर्ती इलाके होते हैं। इसलिए उन क्षेत्रों में सुरक्षा की बहुआयामी नीति बनायी जानी चाहिए और इसमें वहां विकास कायरे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि वहां के लोग अभावग्रस्तता से मुक्ति के उपायों की तलाश में भटक न सकें। ऐसे कुछ कदमों में सभी सीमावर्ती प्रदेशों में विकास योजनाओं की समान नीति सबसे जरूरी है। सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ औद्योगिक इकाइयों तथा बड़े कार्यालयों की सीमावर्ती इलाकों में स्थापना प्राथमिकता के साथ की जानी चाहिए। इन इलाकों में पिछड़े वगरे पर विशेष ध्यान दिया जाना भी जरूरी है ताकि उन्हें भारत विरोधी ताकतें गुमराह न कर सकें। गरीबी, अभावग्रस्तता के चलते हमेशा ही इसका अंदेशा बना रहता है। इन क्षेत्रों के लोगों की महानगरों की ओर विस्थापना रोकी जानी चाहिए। नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार सीमा पर द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने की नीति आतंकवाद पर रोकथाम के लिए प्रभावी कदम हो सकता है। इसके साथ पड़ोसी देशों की तुलना में अपने सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक तथा सैनिक क्षमता में वृद्धि का कार्यक्रम भी बनाया जाना चाहिए जिससे पड़ोसी देश भारत विरोधी कदम उठाने से तो सावधान रहें ही, वे भारत विरोधियों की मदद करने का भी विचार न रख सकें।
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