लेखक अमेरिका को पाकिस्तान में आतंक के ठिकानों पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं…
अमेरिकी विशेष बल के हाथों इस्लामाबाद के करीब एबटाबाद में एक शानदार बंगले में ओसामा बिन लादेन की मौत और इससे पहले अनेक अलकायदा नेताओं की पाकिस्तानी शहरों से हुई गिरफ्तारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह अफ-पाक सीमा या भारत सीमा पर नहीं, बल्कि पाकिस्तान के बीचोबीच हैं। इससे एक और मूलभूत सच्चाई रेखांकित होती है कि पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व समाप्त किए बिना तथा वहां कट्टरपंथ को समाप्त किए बगैर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ जंग नहीं जीती जा सकती। इसके लिए पाकिस्तान में नागरिक-सैन्य संबंधों को फिर से संतुलित करने और आइएसआइ पर लगाम कसने की सख्त जरूरत है। 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान से पकड़े गए अन्य आतंकवादी नेताओं में अलकायदा के तीसरे नंबर का नेता शालिद शेख मोहम्मद, नेटवर्क व्यवस्था का प्रमुख अबु जुबैदिया, यासर जजीरी, अबु फरज फर्ज शामिल हैं। इन तमाम गिरफ्तारियों में एक समान कड़ी यह है कि ये सब पाकिस्तानी शहरों से पकड़े गए हैं। इस आलोक में यह हैरानी की बात नहीं है कि बिन लादेन कबीलाई इलाकों के बजाए पाकिस्तान की राजधानी के निकट शहर में मारा गया। अगर हैरानी है तो इस बात की कि ओसामा बिन लादेन इस्लामाबाद के बगल में एबटाबाद में रह रहा था। यहां पाकिस्तानी सेना का बड़ा आधार शिविर, सैन्य अकादमी, सैन्य अस्पताल और अनेक वरिष्ठ सैन्य व खुफिया अधिकारियों व पूर्व अधिकारियों के आवास हैं। इससे यह भी रेखांकित होता है कि अमेरिका को लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने में इसलिए एक दशक का समय लगा, क्योंकि उसे पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ तत्वों का संरक्षण हासिल था। वर्तमान अभियान को सफलता इसलिए मिली, क्योंकि पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ से संबंध खराब होने की परवाह किए बिना अमेरिका ने पाकिस्तान के अंदर बड़ी संख्या में सीआइए एजेंट और स्पेशल ऑपरेशन फोर्सेज को तैनात किया था। इस अभियान की भनक पाक सेना को भी नहीं लगने दी गई। सीआइए एजेंट रेमंड डेविस की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान के दो सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्तियों-सैन्य प्रमुख अशफाक परवेज कयानी तथा आइएसआइ के मुखिया अहमद शुजा पाशा ने अमेरिका से मांग की थी कि वह सीआइए द्वारा पाकिस्तान में तैनात तमाम ठेकेदारों व स्पेशल फोर्सेज को वापस बुला ले तथा पाकिस्तान में खुफिया गतिविधियों पर रोक लगाए, किंतु एबटाबाद सैन्य अकादमी के बगल में आराम से रह रहे ओसामा बिन लादेन के खिलाफ सफल अभियान के बाद अब पाकिस्तान के मुख्य भागों में स्वतंत्र खुफिया ऑपरेशनों की जरूरत बढ़ गई है। लंबे समय से अमेरिका पाकिस्तानी जिहादियों के किले पंजाब और कराची के बजाय वजीरिस्तान पर ध्यान केंद्रित किए हुए था। वास्तव में, कभी एक देश को प्रायोजित करने वाले विश्व के सबसे बड़े आतंकी सरगना की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का मूल बिंदु राष्ट्र प्रायोजित आतंकवाद के खतरे का खात्मा होना चाहिए। बिन लादेन की मौत के बाद अलकायदा में अल जवाहिरी के अलावा कोई अन्य बड़ा आतंकी नहीं बचा है, किंतु वह आतंकी तंत्र चलाने में समर्थ नहीं है। हालिया वर्षो में, वरिष्ठ नेताओं की धरपकड़ और बिन लादेन के पाकिस्तान में छुपे होने से अलकायदा की बड़ा अंतरराष्ट्रीय हमला करने या फिर अमेरिका के सामने चुनौती पेश करने की क्षमता खत्म हो गई थी। बिन लादेन के मरने के बाद अलकायदा संगठन बिखरने के कगार पर पहुंच गया। फिर भी, इसकी खतरनाक विचारधारा जिंदा रहेगी और राज्य प्रायोजित गैरसरकारी तत्वों को प्रोत्साहित करती रहेगी। ये ऐसे तत्व हैं जो 26/11 जैसे बड़े हमले करने की क्षमता रखते हैं। यहां तक कि अफगानिस्तान में भी अमेरिका का बड़ा दुश्मन अलकायदा नहीं, तालिबान है, जिसे पाकिस्तान में सुरक्षित पनाह मिलती है। लादेन की मौत के बाद अब पाकिस्तान में आतंकी परिसर और सरकार व गैरसरकारी तत्वों के संबंध निशाने पर होंगे। महत्वपूर्ण है कि जैसे ही सीआइए बिन लादेन के करीब पहुंची, यूएस ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि पाकिस्तानी सेना और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना पर हमले करने वालों के बीच निकट संबंध हैं। अमेरिका के लिए पाकिस्तान खासतौर पर कठिन चुनौती है। 9/11 के बाद से पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग के लिए 20 अरब डॉलर देने के बावजूद अमेरिका को बदले में छद्म सहयोग और धोखा ही मिला है। आज, अमेरिकावाद के खिलाफ उठे ज्वार और कयानी व पाशा की मांगों के बाद अमेरिका की पाक नीति की विफलता जाहिर हो जाती है। बिन लादेन की मौत पर आज अमेरिकी जश्न जरूर मना रहे हैं, लेकिन वाशिंगटन को इस पर विचार करना चाहिए कि उसकी विफल पाक नीति का ही नतीजा है कि आज पाकिस्तान आतंकवादियों की शरणस्थली बन चुका है। पाकिस्तान में नागरिक संस्थानों को मजबूती प्रदान करने के बजाए वाशिंगटन जिहादियों में पैठ रखने वाले पाक सैन्य प्रतिष्ठान को मजबूत करने में लगा रहा। तानाशाह परवेज मुशर्रफ की बेदखली के बाद नई नागरिक सरकार ने आइएसआइ को गृह मंत्रालय के अधीन करने के आदेश जारी किए थे, लेकिन उसे अमेरिका से समर्थन नहीं मिला और पाक सेना ने इस आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा ने अफगानिस्तान में सैन्य बल में बढ़ोतरी करने के साथ-साथ पाक की आर्थिक सहायता में भी वृद्धि की। इससे अमेरिका गलत युद्ध में उलझ गया, क्योंकि इस राशि के एक हिस्से से पाकिस्तान अफगान तालिबान को पोषित करने में लगा रहा। पाकिस्तान में आतंकवाद के प्रसार में मुल्लाओं से अधिक स्कॉच पीने वाले सैन्य अफसरों का हाथ है, लेकिन उन्होंने बड़ी चतुराई से इसका दोष मुल्लाओं के सिर मढ़ दिया और अमेरिका की निगाह में पाक-साफ बने रहे। पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ में सुधार के बिना आतंकवाद को खत्म नहीं किया जा सकता और न ही इसके बिना पाकिस्तान में राष्ट्र निर्माण संभव है। जब तक सत्ता पर सेना की पकड़ बनी रहेगी तब तक पाकिस्तान विश्व के लिए आतंकी चुनौती बना रहेगा। अलकायदा के पुनरुत्थान की एकमात्र सूरत यह है कि 2014 के बाद पाक सेना अफगानिस्तान में छद्म सरकार का गठन करने में कामयाब हो जाए। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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