ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद आतंकी वारदात के लिहाज से आने वाले दो-चार महीने अहम साबित हो सकते हैं। लादेन के नहीं रहने से दो तीन बातें एक साथ होंगी। पहली बात तो यही है कि उसकी मौत के बाद अलकायदा की ताकत कुछ कम हो जाएगी। इस लिहाज से अलकायदा को फंडिंग करने वाले लोगों को भी लगेगा कि अब यह संगठन काम नहीं कर पाएगा। तो संगठन के मौजूदा लोग निश्चित तौर पर आने वाले महीनों में कोई बड़ी आतंकी घटना को वारदात देकर दुनिया भर को यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि अलकायदा अब भी जिंदा है। चूंकि ओसामा बिन लादेन पिछले कई सालों से खुद बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं था, लिहाजा अलकायदा का नेटवर्क इस काम को ओसामा के बिना भी आसानी से कर सकता है। इतना जरूर है कि अलकायदा के इस हमले का मुख्य निशाना भारत नहीं होगा। अलकायदा निश्चित तौर पर अमेरिका को ही निशाना बनाएगा, उसके दूतावास भी उसके टारगेट होंगे और पाकिस्तान के अहम स्थलों पर भी हमला हो सकता है। एक बात और है, 11 सितम्बर 2001 के बाद अलकायदा ने कोई ऐसी वारदात नहीं की है जिससे लोग बाग में उसके प्रति खौफ का भाव पैदा हो। यानी अलकायदा को अपनी फंडिंग सही करने या फिर आतंकी संगठन के तौर पर अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए बड़ी आतंकी घटना की जरूरत है। ओसामा की मौत का इस्तेमाल संगठन अपनी आतंकी मंसूबों को पूरा करने के लिए कर सकता है।
पाकिस्तान से अंदेशा
इसके अलावा दुनिया भर के, खासकर पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन भी सक्रिय होंगे। अब तक अलकायदा की पहचान दुनिया भर के नम्बर एक आतंकी संगठन के तौर पर थी, दूसरे आतंकी संगठन उसकी जगह पर काबिज होना चाहेंगे। हिजबुल मुजाहिदीन और लश्करे तैयबा जैसे संगठन अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए सक्रिय हो सकते हैं। इन संगठनों के निशाने पर भारत हो सकता है। जहां तक भारतीय पहलू की बात है तो हमें समझना होगा कि अपने यहां किसी वारदात का असर ज्यादा से ज्यादा तीन सालों का होता है। तीन सालों का इसलिए होता है क्योंकि किसी वारदात के होने के बाद जो जांच कमेटी बैठती है, उसके अधिकारियों की अमूमन उस शहर या उस विभाग में पोस्टिंग तीन साल के लिए होती है। नये अधिकारियों के आने से उसकी जांच और अन्य प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है। इस लिहाज से 26 नवम्बर के मुम्बई हमले के भी तीन साल पूरे होने वाले हैं। अब आतंकी संगठन किसी दूसरे बड़े हमले की योजना बना सकते हैं। पाकिस्तान इन मंसूबों को हमेशा की तरह की मदद पहुंचा सकता है। दरअसल भारत एक आर्थिक ताकत के तौर लगातार मजबूत हो रहा है और पाकिस्तान इस बात को पचा नहीं पा रहा है। 26/11 का हमला अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य से ही किया गया। पाकिस्तान को लगता है कि अगर भारत में सब कुछ शांति से चलता रहा तो वहां विदेशी निवेशक कुछ ज्यादा आएंगे। देश आर्थिक तरक्की की राह पर बहुत आगे बढ़ जाएगा। इस कुंठा में वह भारत में आतंकी घटनाओं को बढ़ावा देता रहा है।
एंटी टेरर मैकेनिज्म की जरूरत
इन आतंकी हमलों से देश की सुरक्षा के लिए हरसम्भव कदम उठाने का दावा तो सरकार करती है, लेकिन अमल होने में कई चीजें बाकी रह जाती है। हमें हर हाल में अपने देश के अंदर एंटी टेरर मैकेनिज्म को मजबूत करने की जरूरत है। गृहमंत्री कहते हैं कि देश के अंदर साढ़े पांच लाख नये पुलिस बल की जरूरत है, जबकि नियुक्तिमहज डेढ़ लाख की हो पाती है। इस पहलू पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। हमें अपने सुरक्षा बलों को आधुनिकतम हथियार मुहैया कराने चाहिए और उन्हें आधुनिकतम तकनीकों से लैस करने पर ध्यान देना चाहिए। इस मामले में हम अमेरिका से सीख ले सकते हैं। दरअसल, पाकिस्तान हमारा कभी दोस्त हो ही नहीं सकता है, लेकिन देश में मनमोहन सिंह की पीढ़ी के ऐसे लोग हैं जो ख्वाब देखते हैं एक दिन ऐसा आएगा जब दोनों मुल्क एक हो जाएंगे। इन लोगों के नजरिये से भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी सम्बंध बातचीत से सही हो सकते हैं। लेकिन ओसामा के पाकिस्तान में मौजूद होने और उसके वहां पांच साल से लगातार रहने से यह बात तो साफ है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को अपने यहां पनाह देता है। इतने संवेदनशील इलाके में और इतने लम्बे-चौड़े घर में कोई आतंकवादी बिना सरकारी तंत्र के जाने इतना बड़ा आतंकवादी रह ही नहीं सकता। वैसे भी पाकिस्तान ऐसा देश है जहां की खुफिया एजेंसी हर एक शख्स पर नजर रखती है, कौन कहां फोन करता है, इन पर उनकी नजर होती है। कोई भी शख्स बिना उनकी इजाजत के उनके सेना की एकेडमी के इलाके में जा ही नहीं सकता है।साफ है कि वे लगातार झूठ बोल रहे हैं।
भारत को डिस्टर्ब करने की होगी कोशिश
ओसामा के मारे जाने के बाद उनके यहां भी कट्टरपंथी ताकतें सिर उठाएंगी और क्षेत्र में अशांति का माहौल पैदा होगा। ऐसे माहौल में वे भारत को भी डिस्टर्ब करने की कोशिश जरूर करेंगे। बहरहाल, भारत को अब हर हाल में पाकिस्तान में मौजूद हाफिज सईद, दाऊद इब्राहिम और मौलाना मसूद अजहर को वापस लाने का दबाव बनाना चाहिए। हमें अपने खुफिया एजेंसी के अधिकारी और एंटी टेररिस्ट स्क्वॉयड के पुलिस आफीसरों को इन लोगों को खत्म करने पर लगाना चाहिए। इसके लिए हमें पाकिस्तान पर किसी हमला करने की जरूरत नहीं है। यह काम चुपके-चुपके भी हो सकता है। मसलन, ईरान ने जब अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू किया तो इस्रइल ने अपने पुलिस आफीसरों को ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों को ठिकाने पर लगाने के काम में लगा दिया। उन लोगों ने बड़ी आसानी से यह काम कर दिखाया। अगर कोई भारतीय आफीसर पाकिस्तान में दाऊद इब्राहिम को मार गिराता है तो पाकिस्तान इस बात को आधार बनाकर भारत के साथ युद्ध तो नहीं ही छेड़ सकता है। हालांकि हमें पाकिस्तान के साथ बातचीत भी जारी रखनी चाहिए। लेकिन हमें यह बातचीत शीर्ष स्तर पर करने के बजाए ज्वाइंट सेक्रेटरी लेबल पर ही रखना चाहिए। बातचीत लगातार होनी चाहिए और हर बातचीत में भारत को यह मजबूती से कहना चाहिए कि हम भी आपसे अमेरिका वाला व्यवहार कर सकते हैं लेकिन दुनिया कह रही है कि आपसे बात करनी चाहिए। इसके अलावा हमें गर्वनेंस के मुद्दे पर पाकिस्तान को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहिए जिससे वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सके। (मारूफ रजा से प्रदीप कुमार की बातचीत पर आधारित)
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