ओसामा बिन लादेन का मारा जाना आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। खासतौर से इस मायने में कि आतंक के पर्याय लादेन ने सिर्फ अमेरिका को ही नहीं परेशान किया, दक्षिण एशिया समेत यूरोपीय मुल्कों की नाक में भी दम कर रखा था। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हुए हमले के लिए लादेन का आतंकी संगठन अलकायदा ही जिम्मेदार था, जिसमें तीन हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। आतंकवाद के इतिहास में यह सबसे बड़ी घटना थी। इस आतंकी हमले के महीने भर बाद ही अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। अफगानिस्तान से अभी तालिबानों का सफाया भी नहीं हुआ था कि जार्ज बुश की अदूरदर्शिता के कारण अमेरिका का ध्यान इराक में बंट गया। इस दौरान तालिबान ने अपनी सैन्य शक्ति पुनर्गठित और मजबूत कर ली। लिहाजा, अमेरिका को अफगानिस्तान में नए सिरे से अपनी ताकत लगानी पड़ी। इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिकी सेना ने तालिबान के मंसूबों पर पानी फेर दिया है। कहा जाता है कि विगत 18 महीनों में करीब एक हजार तालिबान लड़ाके गिरफ्तार हुए या मारे गए और कंधार तथा हेलमंड प्रांतों में अमेरिकी सैनिकों ने कई महत्वपूर्ण स्थान उनसे छीन लिए हैं। मुल्ला मुहम्मद उमर अफगानिस्तान से भाग गया है, लिहाज तालिबान में नेतृत्व का संकट है। यह सब होते हुए भी फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि अफगानिस्तान में तालिबान की कमर टूट गई है।
पाक ने दी थी पनाह
इधर कई सालों से यह सवाल तैर रहा था कि ओसामा बिन लादेन जिंदा भी है या नहीं। और यदि जिंदा है तो कहां छिपा हुआ है? कुछ अमेरिकी विशेषज्ञ यह बराबर कह रहे थे कि वह पाकिस्तान में अफगान सीमा से लगे क्षेत्र में भूमिगत है, लेकिन जिन परिस्थितियों में ओसामा मारा गया, उससे साफ है कि वह पाकिस्तान सरकार की जानकारी में और उसकी सुरक्षा में इस्लामाबाद से महज 150 किलोमीटर दूर एबटाबाद में था। यहां उसके लिए एक विशाल इमारत या यों कहें कि एक छोटा-सा किला 2005 में बना दिया गया था। भवन की दीवारें 12 से 16 फुट ऊंची थीं और उसके अंदर किसी को भी आने-जाने की अनुमति नहीं थी। स्थानीय लोगों को बता दिया गया था कि यह किसी अफगान रईस का भवन है। स्पष्ट है कि विगत पांच वर्षो में लादेन का अधिकांश समय यहीं बीता। एबटाबाद में ही पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी है। पाक की राजधानी इस्लामाबाद और मिलिट्री अकादमी के निकट लादेन का होना पाकिस्तान सरकार से उसकी साठगांठ का अकाट्य प्रमाण है। एक तरफ तो पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अमेरिका का साथ देने का स्वांग भरता रहा और दूसरी ओर लादेन व संभवत: अन्य तालिबान नेताओं को संरक्षण प्रदान करता रहा।
पाक भी था अभियान में साथ!
लादेन के मारे जाने की घटना में अमेरिकन स्पेशल फोर्सेज (नेवी के सील कमांडोज) ने अहम भूमिका निभाई। ऐसा प्रतीत होता है कि तीन हेलीकॉप्टरों द्वारा उन्हें भवन के अंदर उतारा गया, जहां 40 मिनट तक गोलीबारी चली। इस ऑपरेशन में लादेन, उसका एक बेटा और तीन सुरक्षाकर्मी मारे गए। इसके अलावा उसके छह अन्य बेटे, तीन पत्नियां और चार सहयोगी गिरफ्तार किए गए। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस ऑपरेशन में पाकिस्तान को विश्वास में नहीं लिया गया। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिक्रिया के डर से यह बयान दिया गया है। पाकिस्तान के ही पत्रकार हामिद मीर ने यह खुलासा किया है कि पाकिस्तानी फौज ने जमीन से इस ऑपरेशन में सहायता दी और संदिग्ध क्षेत्र को घेर लिया था। अमेरिकी हेलीकॉप्टर अफगानिस्तान से उड़कर वहां आए और उन्होंने भवन के अंदर अपने कमांडोज को उतारकर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। एक हेलीकॉप्टर मौके पर ही ध्वस्त हो गया। हो सकता है कि लादेन के सुरक्षाकर्मियों ने उसे रॉकेट-लांचर से गिरा दिया हो, लेकिन अमेरिका के सरकारी बयान के अनुसार उसके किसी सैनिक का कोई नुकसान नहीं हुआ। दक्षिण एशिया के लिए क्या मायने बिन लादेन का मारा जाना पूरे विश्व खासतौर से दक्षिण एशिया के लिए एक बहुत बड़ी घटना है। इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया होगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने मुखिया के हमले से बौखलाए अलकायदा द्वारा एक फरमान जारी होगा कि अमेरिकी प्रतिष्ठानों पर जहां भी मौका मिले, हमले किए जाएं और अमेरिकी नागरिकों की हत्या की जाए। ऐसी घटनाएं विश्व में कहीं भी हो सकती हैं, लेकिन आशंका यमन, सोमालिया, उत्तर अफ्रीका और अफगानिस्तान में ज्यादा है। अमेरिका में भी ऐसी घटनाएं हो सकती हैं। न्यूयार्क के टाइम्स स्क्वॉयर में एक मई, 2010 को विस्फोट का प्रयास हुआ था, परंतु लोगों की सतर्कता से वह विफल हो गया था। यूरोप में भी वारदातों को अंजाम दिया जा सकता है। विशेष रूप से फ्रांस और डेनमार्क में। सरकोजी के बुर्का विरोधी अभियान से मुस्लिम समाज काफी उद्वेलित है। डेनमार्क में मुहम्मद साहब के कार्टून से जो आक्र ोश पैदा हुआ था, वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान के भीतर लादेन का मारा जाना एक भयंकर प्रतिक्रिया की शुरुआत हो सकती है। कट्टरपंथी संगठन पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तानी फौज दोनों को ही दोषारोपित करेंगे। आत्मघाती घटनाओं की संख्या में वृद्धि होगी, अराजकता का वातावरण होगा। ताज्जुब नहीं कि जरदारी का तख्ता पलट भी हो जाए। जनरल कयानी और आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा को भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। भारत के लिए यह घटना एक सबक है। अमेरिका को दस साल जरूर लग गए, लेकिन ओसामा बिन लादेन को ठिकाने लगाकर ही उसने दम लिया।
अमेरिका ने दिखाई राह
अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अपने बयान में कहा है कि हम अपने सामने जो लक्ष्य रखते हैं, उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। सराहना करनी होगी ऐसे देश की और उसके नेतृत्व की। दूसरी तरफ अपना देश है, जहां हम आतंकवाद के सामने घुटने टेकते रहते हैं, सख्त कानून बनाने में घबराते हैं और अपने वोट बैंक को राष्ट्रीय सुरक्षा के ऊपर प्राथमिकता देते हैं। कहने को हमारे पास भी इंटेलीजेंस एजेंसियां हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में वह न तो अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहीम के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई कर पाती है और न ही लश्करे तैयबा प्रमुख हाफिज सईद के विरुद्ध। हम सुपर पॉवर जरूर बनना चाहते हैं, लेकिन एक तरफ आस्तीन में सांप पालते रहते हैं और दूसरी ओर सीमा पार के जो लोग भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं, उनके खिलाफ कई दशकों में भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। पाकिस्तान में जो भी उथल-पुथल होगी, उसका कालांतर में भारत पर प्रभाव अवश्य पड़ेगा। इसमें संदेह नहीं कि पाकिस्तान में निकट भविष्य में कट्टरपंथियों के समर्थन से ऐसी सरकार बनेगी, जो भारत के प्रति आक्रामक रवैया अपनाएगी। देश में आतंकवाद की घटनाएं बढ़ सकती हैं और 26/11 जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो सकती है। क्या हमारी सरकार इन चुनौतियों का सामना करने के लिए कृतसंकल्प है? (लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी हैं)
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