| अमेरिका की आतंकी संगठनों की सूची में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का भी नाम शामिल है, इससे अमेरिका की सोच भी पाकिस्तान के बारे में साफ जाहिर हो रही है। भारत को इस वक्त सिर्फ अमेरिका और विश्व के अन्य देशों पर पाकिस्तानी आतंकी आकाओं के बाबत दबाव बनाने की जरूरत है, क्योंकि सुबूत तो अमेरिका के पास ही काफी हैं..नाढ्य उमी मोहम्मद बिन लादेन के 52 बच्चों में 17वें नंबर की संतान ओसामा बिन लादेन आतंक का पर्याय यूं ही नहीं बन गया। अपने हित के लिए अमेरिका ने ही ओसामा को इस राह पर डाला था और नेटवर्क व शक्ति अर्जित कर लेने के बाद वह अमेरिका से लगातार मदद की आशा करता रहा, लेकिन जब अमेरिका ने अपना हित पूरा होने के बाद ओसामा को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया तो वही ओसामा अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया। अलकायदा भले ही दुनिया में आतंक का पर्याय बन गया हो, लेकिन उसके निशाने पर अधिकांशत: अमेरिकी ही रहते थे। ओसामा बिन लादेन को कलियुग का रावण कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी, क्योंकि ओसामा जितना बड़ा दुराचारी था, उतना ही बड़ा विद्वान भी था। उसेभाषा, अस्त्र-शस्त्र, धार्मिक व अन्य कई तरह का तकनीकी ज्ञान था और तभी उसे मात देना किसी के लिए आसान नहीं था। 1980 में सोवियत सेना के विरुद्ध अमेरिकी अभियान में साहसी व कुशल कमांडर के रूप में उसने पहचान बनाई और वह युवाओं का आइडियल बनने लगा। धार्मिक नेता उसे भाषण देने के लिए मुख्य तौर पर बुलाने लगे और धीरे-धीरे वह विश्व स्तर पर पहचाना जाने लगा। उसने अपना नेटवर्क स्थापित कर अपार शक्ति अर्जित कर ली और वर्ष 1990 में जब अमेरिका इराक में कुवैत को खदेड़ने के लिए पुन: उतरा तो ओसामा ही आड़े आ गया और गैर-इस्लामिक सेना की मदद न करने की अपील करने लगा। साथ ही उसने यहूदियों के विरुद्ध भी जेहाद का ऐलान कर दिया। ओसामा के अंदर अमेरिका के प्रति घृणा इतनी बढ़ गई कि वह अमेरिका को तबाह करने के सपने देखने लगा। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश को तबाह कर पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है, फिर भी हाल के वर्षो में ओसामा ने अमेरिका का जितना नुकसान किया है, उतना नुकसान किसी ने नहीं किया। वर्ष 1998 में अफ्रीका में अमेरिकी दूतावासों पर उसने हमला बोला, इसी तरह वर्ष 2000 में अदन के बंदरगाह पर अमेरिका के यूएसएस कोल पर हमला करके अमेरिकियों को मौत के घाट उतार दिया और 9 सितम्बर 2011 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को निशाना बनाकर तो उसने अमेरिका को पूरी तरह हिला ही दिया। अमेरिका इन घटनाओं को शायद ही कभी भूल पाएगा। खैर, 9/11 की घटना के बाद ही अमेरिका की आंखें खुलीं और उसने ओसामा पर ढाई करोड़ का इनाम घोषित कर दिया, साथ ही अमेरिकी सैनिक ओसामा को भूखे भेड़िए की तरह खोजने लगे। इस बीच ओसामा को भी लगने लगा कि अमेरिका से बच पाना मुश्किल है तो वह भी बेहद सतर्क हो गया और पहाड़ियों में जाकर छिप गया। लेकिन बीमारी के चलते उसका इस तरह जीवित रहना मुश्किल था और आईएसआई व पाकिस्तानी हुक्मरानों से संपर्क करके वह पाकिस्तान में आकर रहने लगा। यह जानकारी सीआईए को शुरू से ही थी, पर पाकिस्तानी हुक्मरान लगातार खंडन करते आ रहे थे, जिससे अमेरिका का भरोसा पाकिस्तान पर लगातार कम होता जा रहा था। अमेरिका की इस गोपनीय और चाणक्य-चाल को पाकिस्तान समझ नहीं पा रहा था, जो भारत के लिए अच्छी बात ही कही जाएगी। अब यह भी साफ हो गया है कि ओसामा बिन लादेन को आईएसआई के साथ सभी पाकिस्तानी शासकों का समर्थन हासिल था, तभी पूर्व जनरल शासक परवेज मुशर्रफ उसके मारे जाने की आशंका व्यक्त करते रहे हैं। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी ओसामा के मारे जाने की बात कही, इसके विपरीत गृहमंत्री रहमान मलिक ओसामा के अरब या यमन में होने की आशंका जताते रहे हैं, लेकिन अब सभी का झूठ सामने आ गया है। तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए सच्ची बात यह है कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के अंदर मारा गया और वह भी अति संवेदनशील क्षेत्र में, जहां किसी भी नए व आम आदमी का रह पाना नामुमकिन ही कहा जाएगा। क्या खूब कि दुनिया का मोस्ट वांटेड आतंकी ओसामा एबटाबाद में सालों से रह रहा था। इसलिए भारत के लिए यह समय और अवसर स्वर्णिम ही कहा जाएगा, क्योंकि अभी चार दिन पहले खबर आई थी कि अमेरिका की आतंकी संगठनों की सूची में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का भी नाम शामिल है, इससे अमेरिका की सोच भी पाकिस्तान के बारे में साफ जाहिर हो रही है। भारत को इस वक्त सिर्फ अमेरिका और विश्व के अन्य देशों पर पाकिस्तानी आतंकी आकाओं के बाबत दबाव बनाने की जरूरत है, क्योंकि सुबूत तो अमेरिका के पास ही काफी हैं। अब देखना यह है कि भारत सरकार इस कार्य को कितने बेहतर ढंग से अंजाम दे पाती है। |
Wednesday, May 4, 2011
अवसर का लाभ उठाए भारत
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