दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा के खात्मे के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान में ही पनाह लेकर रह रहे दूसरे खतरनाक आतंकवादी दाऊद इब्राहीम को पस्त-नष्ट करने वाली मुहिम छेड़ी जाएगी? ऐसा सोचने के दो प्रमुख कारण हैं। दाऊद सिर्फ हिन्दुस्तान में काम कर रहे संगठित आपराधिक साम्राज्य का सरगना ही नहीं है, इंटरपोल की सूची में भी अंतरराष्ट्रीय दहशतगर्द के रूप में उसका नाम काफी ऊपर है। दूसरी बात यह है कि ओसामा के विनाश को सुनिश्चित करने वाले अमेरिकी हमले ने पाकिस्तान को बुरी तरह बेनकाब कर दिया है। जिस तरह वह यह नकारता था कि ओसामा को उसने शरण नहीं दे रखी है, वैसी ही सफाई वह दाऊद के बारे में भी देता रहा है। दाऊद का शूल निकाल फेंकने की सुझाने वाले दो तरह की रणनीति सामने रख रहे हैं। एक के अनुसार, ‘हिन्दुस्तानियों को अमेरिकी कार्रवाई से सबक लेकर खुद इस काम को अंजाम देना चाहिए।’ दूसरे का मानना है, ‘खुद हमें इस जंजाल में पड़ने की जरूरत नहीं। हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि अमेरिकियों के जरिए पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह दाऊद को हमारे हवाले कर दे।’
पाक के लिए एसेट
यह भुलाना असम्भव है कि जहां तक हिंदुस्तान का सवाल है, हमें ओसामा बिन लादेन और अल कायदा से कहीं ज्यादा लहूलुहान दाऊद इब्राहीम और उसकी डी कम्पनी ने किया है। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद इंतकाम के लिए किए गए मुम्बई धमाकों में उसी का हाथ था और उसके बाद से हुई दर्जनों वारदातों की साजिश इसी खूंखार अपराधी ने रची है। इस बारे में सबूत जुटाने की और शक-शुबहो दूर करने की कोई जरूरत बची नहीं। हिन्दुस्तान के पास इसके अकाट्य प्रमाण हैं कि कभी मुम्बई में नशीले पदार्थो की तस्करी और रंगदारी वसूल करने वाला हत्या की सुपारी लेने वाला पेशेवर अपराधी कैसे माफिया सरीखे बहुराष्ट्रीय कारोबार का सीईओ बना? पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई ने अपना उल्लू साधने के लिए उसकी परवरिश एक दुर्लभ संसाधन (एसेट) के रूप में की। इसके साथ ही दूरदर्शी दाऊद ने हिंदुस्तान की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति का भरपूर फायदा उठाया। जब तक कुछ ईमानदार और देशप्रेमी पुलिसकर्मियों ने उसका हिन्दुस्तान में रहना दूभर नहीं कर दिया था, तब तक उसे उन राजनेताओं का संरक्षण भी प्राप्त था, जो खुद को अल्पसंख्यक समुदाय के हितैषी और रक्षक पेश करते हैं। संयोग से मुंबई में उसके प्रतिद्वंद्वी अपराधी संगठन को उग्र राष्ट्रवादी आक्रामक हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का संरक्षण प्राप्त था।
आईएसआई ने निखारा
जब उसने भारत छोड़ा तो अपना डेरा दुबई में डाला और वहीं से हिंदुस्तान में अपने कठपुतलों को नचाता रहा। यह स्थान इस कुख्यात अध्याय के पन्ने पलटने का नहीं है पर यह बात रेखांकित की जानी जरूरी है कि नाजायज हथियार, विस्फोटक और जाली दस्तावेज़ वगैरह सुलभ कराने हो या काले धन की बेनामी धुलाई, इन सभी धंधे में दाऊद की जन्मजात प्रतिभा को आईएसआई के प्रशिक्षण और संरक्षण ने निखारा है। यह बात किसी से छिपी नहीं कि दाऊद कराची के पॉश इलाके में रहता है और पारिवारिक जलसों में या अय्याश मेहमाननवाजी के मौकों पर यह ‘भाई’
अक्सर नज़र आता है। ओसामा भले ही पाकिस्तान में पनाह लेने के बाद गुमनामी की जिंदगी बसर करने को मजबूर रहा हो, दाऊद के सामने कभी ऐसी दिक्कत पेश नहीं आई। यही सबसे पेचीदा सवाल हमारे सामने खड़ा होता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय दाऊद को सिर्फ खतरनाक अपराधी ही नहीं मानता बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय दहशतगर्द के रूप में भी पहचानता है। अमेरिका खुद यह बात स्वीकार करता है कि दाऊद की कमाई का एक खासा बड़ा हिस्सा अल कायदा जैसे संगठनों की गतिविधियों को फाइनेंस करने के लिए खर्च किया जाता है। तब फिर क्यों अमेरिका उसके खात्मे के लिए कोई कारगर कदम उठाने में अब तक हिचकिचाता रहा है? और आगे भी ऐसा कुछ करने के लिए खास उत्सुकता नहीं दिखला रहा? इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि ओसामा ने अमेरिका को अपना निशाना बनाया था और दाऊद ने ऐसी कोई अहंकारी नादानी नहीं की है। पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था ने इस जहरीले तीर का निर्माण सिर्फ हिन्दुस्तान के मर्मस्थल को बेधने के लिए किया है।
’भाई’ से क्यों भिड़ेगा अमेरिका
अमेरिकनों को इस बात की कोई जरूरत नहीं महसूस होती कि वह इस भिड़ों के छत्ते में अकारण छेड़छाड़ करे। खासकर ओसामा के कत्लनुमा कार्रवाई के बाद तो गुत्थी और भी उलझ जाती है। भले ही इस दिलेर कार्यवाही में पाकिस्तान की सम्प्रभुता का खुल्लम- खुल्ला उल्लंघन हुआ और अंतरराष्ट्रीय कानून की धज्जियां उड़ाई गई पाकिस्तान की औकात सिवाय कराहते हुए शिकायत करने के और कुछ करने की नहीं। आने वाले दिनों में उसकी मजबूरी यह प्रमाणित करने की बनी रहेगी कि इस्लामी राज्य होते हुए भी उसने जिहादी नेता ओसामा के साथ गद्दारी की और मेहमान का सुराग उसके जानलेवा दुश्मन तक नहीं पहुंचाया। इस बात की संभावना प्रबल है कि वह हिन्दुस्तान में सक्रिय जिहादी आतंकवादी तत्वों को अपना समर्थन बढ़ाएगा ताकि इस तिलमिला देने वाली घटना से इस्लामी भाई- बंधुओं का ध्यान बंट सके। पाकिस्तान का शासक वर्ग अमेरिका से प्राप्त होने वाली आर्थिक और सैनिक सहायता पर बुरी तरह निर्भर है और उसका जीवनयापन पिछले आधी सदी से एक परजीवी के रूप में ही होता रहा है। दाऊद को उसका संरक्षण मिलता रहेगा।
अमेरिका-पाक के हित
जहां तक अमेरिका का प्रश्न है, ओबामा आज भी इस बात को दोहरा रहे हैं कि पाकिस्तान अमेरिका का मित्र राष्ट्र है और संधि-संगठन में साझेदार। कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ लड़ाई में उसे साथ रखना जरूरी है। ओसामा की मृत्यु के बाद इस बात की जमीन तैयार हो चुकी है कि अमेरिका की नज़र में ‘अच्छे’
तालिबान अफगानिस्तान लौट सके। बदले निजाम में हालात पर काबू रखने के लिए पाकिस्तान की सामरिक संवेदनशीलता बरकरार रहेगी। वह हिन्दुस्तान की जान के बवाल दाऊद के संकट को भी वैसे ही अनदेखा करते रहेंगे जैसे उन्होंने एक्यू खान की परमाणविक तस्करी के सिलसिले में किया था। दाऊद की उपयोगिता पाकिस्तान के लिए एक और तरह से भी है। कराची में रहकर वह असामाजिक अपराधी मुहाजिर तबकों की अगुवाई करता है और उन असरदार संगठनों के नेताओं के सिर पर खूनी तलवार बनकर मंडराता रहता है जो पंजाबी-पठान नेताओं के लिए सिर दर्द पैदा करते रहते हैं। याद रहे बेनजीर भुट्टो के एक करिश्माई भाई की मौत एक साम्प्रदायिक गै़ंग वॉर में ही हुई थी। यह सोचना बेवकूफी है कि ओसामा की मृत्यु से दाऊद कमज़ोर होगा। हमारी मुसीबत जस की तस है।
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