ओसामा बिन लादेन के सफाये केबाद आतंकवाद के खिलाफ लम्बे अरसे से चल रहे अभियान को बल मिला है। पाकिस्तान अब बुरी तरह विश्व बिरादरी के सामने बेनकाब हुआ है। यह साफ हुआ है कि वह ही विश्व आतंकवाद का केंद्र है। भारत, पाक प्रायोजित आतंकी घटनाओं से लहू-लुहान है किंतु अंतरराष्ट्रीय मंच पर हम इस मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव नहीं बना रहे हैं। इसीलिए यह पड़ोसी देश मुम्बई हमले के दोषियों को सौंपने व दंडित करने तथा भारत विरोधी आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों के खात्मे के लिए तैयार नहीं दिखता। क्या अमेरिका भारत के खिलाफ हो रहे इस आतंकवाद की सुधि लेगा? 9/11 की घटना के बाद अमेरिका की चुस्ती के कारण ही वहां कोई आतंकी घटना नहीं हुई। उसके दस साल बाद ओसामा को पाकिस्तान में घुसकर ओसामा का सफाया करके अमेरिका ने अपने संकल्प का दुनिया भर में लोहा मनवा दिया। उसकी इस कार्रवाई से स्पष्ट हो गया है कि उसे जो चुनौती देगा, जिंदा नहीं बचेगा। किंतु पिछले एक दशक में भारत में आतंकवादी घटनाओं में लगभग 29 हजार लोग मारे जा चुके हैं। मुम्बई हमले में शामिल आतंकियों की सूची पाकिस्तान को दी जा चुकी है। इसलिए उन्हें सौंपने के लिए भारत को अब और दबाव बनाने की जरूरत है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि इस सवाल पर भी हमारे देश के राजनेताओं को वोट की राजनीति नजर आने लगती है। इसीलिए खूंखार आतंकवादी दाऊद इब्राहिम को सौंपने की पुरजोर मांग नहीं हो पा रही है तो संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी देने की पत्रावली इधर-उधर घूम रही है और कश्मीर आतंकियों की पनाहगाह बन चुका है। इसी कमजोरी के कारण ही हम अमेरिका की तरह आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ता नहीं दिखा पा रहे हैं। इस सवाल पर सरकार ‘एक कदम आगे-दो कदम पीछे’ की नीति अपना रही है तो अन्य राजनीतिक दल भी गम्भीर नहीं दिखते। इसलिए अब सभी राजनीतिक दलों को मिलकर आतंकवाद के उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए, अन्यथा आतंकवादी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर बचते रहेंगे। आज आतंकवाद की खूंखार तस्वीर पर नजर डालना आवश्यक हो गया है। मुम्बई हमले में मारे गये नौ आतंकवादियों में से बाबर, अल्ताफ के अलावा जेल में बंद कसाब को पाक अपना नागरिक मानता है। इस हमले का मास्टर माइंड जकीउर रहमान लखवी पाकिस्तान में है। भारत पाकिस्तान में पनाह पा रहे अन्य आतंकियों की मांग कर रहा है पर पाकिस्तान इस पर तवज्जो नहीं देता। अलबत्ता, इन्हीं आतंकियों के सहारे पाकिस्तान भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता है। एक रिपोर्ट के अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर में 22 आतंकी शिविर चल रहे हैं और 2,300 खूंखार आतंकवादी यहीं से भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। लगभग 29 हजार बेगुनाह लोग इनके हाथों मारे जा चुके हैं तथा 125 आतंकवादी हमारी विभिन्न जेलों में बंद हैं। ये लोग हरकत उल मुजाहिदीन और लश्करे तैयबा से जुड़े हैं और यही संगठन देश में आतंकी गतिविधियों को संचालित कर रहे हैं। अकेले जम्मू-कश्मीर में हुई आतंकी घटनाओं में एक दशक में लगभग 20 हजार लोग मारे जा चुके हैं तथा आतंक के चलते तीन लाख कश्मीरी पंडित पलायन कर चुके हैं। दुनिया के सभी देश इस सचाई से वाकिफ हैं कि पाकिस्तान आतंकियों के सहारे भारत को तबाह करने का कुचक्र चला रहा है पर सभी अपने स्वार्थो के चलते चुप हैं। इसके अलावा कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण भी हम पाकिस्तान की इन गतिविधियों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठा पा रहे हैं और न ही भारतीय जेलों में बंद आतंकवादियों को दंड देकर यह संदेश दे पा रहे हैं कि तबाही मचाने वालों के प्रति हमारी कोई हमदर्दी नहीं है। इसके बजाय हमारी राजनयिक अपरिपक्वता का नमूना जुलाई 2009 में शर्म-अल-शेख में जारी संयुक्त बयान में दिख जाता है जिसमें पाकिस्तान बड़ी चालाकी से बलूचिस्तान और उसके कुछ हिस्सों में होने वाली अशांति के मुद्दे को शामिल कराने में सफल रहा। इसीलिए आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगा पाने में भारत असफल है और समूचा देश आतंकी खतरे से जूझ रहा है। इस संकट के लिए देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नीति भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। राजनेता और राजनीतिक दल इसी भंवर में फंसे हुए हैं। राजनीति की महिमा गजब है जो आतंकियों से लड़ने की हमारी प्रतिबद्धता को उजागर करती है। अलकायदा सरगना लादेन को समुद्र में दफन किये जाने पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाते हुए कहा, ‘कोई कितना बड़ा आतंकी क्यों न हो, उसके अंतिम संस्कार में धार्मिक मान्यताओं और संवेदनशीलता का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए।’ ऐसा बयान देकर उन्होंने सभी को असहज कर दिया। ऐसा उनकी तरफ से पहली बार नहीं हुआ है। मुम्बई हमले के बाद कांग्रेस की भूमिका पर तत्कालीन अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने देश को जो संदेश भेजा था उसमें कहा गया था कि कांग्रेस ने धर्म की राजनीति खेली थी। 23 दिसम्बर, 2008 को भेजी गयी सूचना के अनुसार ‘कांग्रेस ने पहले अंतुले के बयान से खुद को अलग कर लिया, फिर दो दिन बाद एक विरोधाभासी बयान जारी किया, जिसमें षड्यंत्र की आशंका का आंख मूंद कर समर्थन कर दिया गया। कांग्रेस ने स्वार्थ के कारण अपनी राय बदली। वह इस उम्मीद में थी कि आगामी चुनाव में इससे मदद मिलेगी’। इसी तरह बाटला कांड पर विवादास्पद बयान के कारण भी दिग्विजय सिंह खूब सुर्खियों में रहे हैं। संसद हमले में सुप्रीम कोर्ट से दोषी करार दिये गये अफजल गुरु को सरकार फांसी पर लटकाने से डर रही है। ऐसे में आतंकवाद के खिलाफ मजबूत लड़ाई कैसे सम्भव है? ओसामा का अंत अमेरिका के लिए उपलब्धि है तो भारत के लिए चुनौती। सरकार ने अलकायदा के निशाने पर भारत के काफी ऊपर होने की आशंका जताई है क्योंकि ओसामा के पाकिस्तान में मारे जाने से यह साफ हो गया है कि पिछले कुछ समय से उसका पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना के साथ सहयोग काफी बढ़ गया था। यह सहयोग पाकिस्तान में उसके छिपने तक सीमित नहीं रहा होगा। भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में उसके समर्थन को इसकी स्वाभाविक परिणति माना जा रहा है क्योंकि अलकायदा भारत को अपना विरोधी मानता है। इसलिए भारत उसकी जद में आ सकता है। ऐसे में पाकिस्तान को बेनकाब करने की कोई कोशिश हमें छोड़नी नहीं चाहिए? लादेन को ही आधार बनाकर पाक पर आतंकी शिविर खत्म करने तथा लश्करे तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद व हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों को सहायता देना बंद करने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही हाफिज सईद, दाऊद इब्राहिम और मौलाना मसूद अजहर को पकड़ने के लिए जोर डालना होगा। इस बारे में पाकिस्तान कुछ नहीं कर रहा है जबकि कई दूसरे देशों से अबू सलेम, बंटी पांडे, इकबाल कास्कर तथा दाऊद के दो दर्जन सहयोगियों को भारत लाया गया है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान को मुम्बई हमले में शामिल पाकिस्तानी आतंकियों की सूची और उनकी हरकतों के प्रमाण के बारह दस्तावेज सौंपे गए हैं, जिसमें उसकी जमीन पर भारत के विरुद्ध षडयंत्र की तैयारियों और प्रशिक्षण के प्रमाण भी शामिल हैं। आज आतंकियों को पनाह और मदद देने के लिए पाकिस्तान कटघरे में है। अमेरिका भी उस पर लगाम कस रहा है। ऐसे में हमें उस पर इस तरह का दबाव बनाना चाहिए कि आतंकी घटनाओं पर विराम लग सके। अब यह उजागर हो गया है कि पाक आतंकवादियों की शरण स्थली बन चुका है। इसलिए अमेरिका ने भी उसे चेताया है कि यदि उसने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो वह उसकी जमीन पर घुसकर कार्रवाई करेगा। इन बदले हालात में भारत को अमेरिका को विश्वास में लेकर आतंकी शिविरों के सफाये और मुम्बई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद, लखवी और दाऊद इब्राहिम के साथ अन्य आतंकियों की दृढ़ता के साथ मांग करनी चाहिए। उसे इस तरह का कदम उठाना चाहिए कि पाक दशहत में आ सके क्योंकि ओसामा के सफाये ने भारत को नया अवसर दिया है कि वह दक्षिण एशिया में अग्रणी भूमिका निभाए। उसे दुनिया को बता देना चाहिए कि वह पाक द्वारा हो रही आतंकी कार्रवाई को अब बर्दाश्त नहीं करेगा क्योंकि पाक आतंकवाद का पनाहगार और प्रायोजक है और यह साफ हो चुका है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में वह शामिल नहीं है। इसलिए हमें सख्ती के इस क्रम में पाकिस्तान नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि वार्ता और आतंकवाद साथ नहीं चल सकते। 9/11 की घटना के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के सफाये के लिए वैश्विक अभियान शुरू किया था। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उसी को आगे बढ़ाया और ओसामा का सफाया हुआ। इसी तरह आतंकवाद से लड़ने के लिए राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए ताकि ऐसे संवेदनशील सवाल पर राजनीति न हो सके लेकिन फिलहाल ऐसा न होने के चलते आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई प्रखर नहीं हो पा रही है। क्या राजनीति से ऊपर उठकर सरकार और राजनीतिक दल सोचेंगे? इस बदले हालात में आतंकवाद के सफाये के सवाल पर सरकार के अगले कदम का इंतजार है।
Saturday, May 7, 2011
अब भारत की बारी
ओसामा बिन लादेन के सफाये केबाद आतंकवाद के खिलाफ लम्बे अरसे से चल रहे अभियान को बल मिला है। पाकिस्तान अब बुरी तरह विश्व बिरादरी के सामने बेनकाब हुआ है। यह साफ हुआ है कि वह ही विश्व आतंकवाद का केंद्र है। भारत, पाक प्रायोजित आतंकी घटनाओं से लहू-लुहान है किंतु अंतरराष्ट्रीय मंच पर हम इस मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव नहीं बना रहे हैं। इसीलिए यह पड़ोसी देश मुम्बई हमले के दोषियों को सौंपने व दंडित करने तथा भारत विरोधी आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों के खात्मे के लिए तैयार नहीं दिखता। क्या अमेरिका भारत के खिलाफ हो रहे इस आतंकवाद की सुधि लेगा? 9/11 की घटना के बाद अमेरिका की चुस्ती के कारण ही वहां कोई आतंकी घटना नहीं हुई। उसके दस साल बाद ओसामा को पाकिस्तान में घुसकर ओसामा का सफाया करके अमेरिका ने अपने संकल्प का दुनिया भर में लोहा मनवा दिया। उसकी इस कार्रवाई से स्पष्ट हो गया है कि उसे जो चुनौती देगा, जिंदा नहीं बचेगा। किंतु पिछले एक दशक में भारत में आतंकवादी घटनाओं में लगभग 29 हजार लोग मारे जा चुके हैं। मुम्बई हमले में शामिल आतंकियों की सूची पाकिस्तान को दी जा चुकी है। इसलिए उन्हें सौंपने के लिए भारत को अब और दबाव बनाने की जरूरत है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि इस सवाल पर भी हमारे देश के राजनेताओं को वोट की राजनीति नजर आने लगती है। इसीलिए खूंखार आतंकवादी दाऊद इब्राहिम को सौंपने की पुरजोर मांग नहीं हो पा रही है तो संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी देने की पत्रावली इधर-उधर घूम रही है और कश्मीर आतंकियों की पनाहगाह बन चुका है। इसी कमजोरी के कारण ही हम अमेरिका की तरह आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ता नहीं दिखा पा रहे हैं। इस सवाल पर सरकार ‘एक कदम आगे-दो कदम पीछे’ की नीति अपना रही है तो अन्य राजनीतिक दल भी गम्भीर नहीं दिखते। इसलिए अब सभी राजनीतिक दलों को मिलकर आतंकवाद के उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए, अन्यथा आतंकवादी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर बचते रहेंगे। आज आतंकवाद की खूंखार तस्वीर पर नजर डालना आवश्यक हो गया है। मुम्बई हमले में मारे गये नौ आतंकवादियों में से बाबर, अल्ताफ के अलावा जेल में बंद कसाब को पाक अपना नागरिक मानता है। इस हमले का मास्टर माइंड जकीउर रहमान लखवी पाकिस्तान में है। भारत पाकिस्तान में पनाह पा रहे अन्य आतंकियों की मांग कर रहा है पर पाकिस्तान इस पर तवज्जो नहीं देता। अलबत्ता, इन्हीं आतंकियों के सहारे पाकिस्तान भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता है। एक रिपोर्ट के अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर में 22 आतंकी शिविर चल रहे हैं और 2,300 खूंखार आतंकवादी यहीं से भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। लगभग 29 हजार बेगुनाह लोग इनके हाथों मारे जा चुके हैं तथा 125 आतंकवादी हमारी विभिन्न जेलों में बंद हैं। ये लोग हरकत उल मुजाहिदीन और लश्करे तैयबा से जुड़े हैं और यही संगठन देश में आतंकी गतिविधियों को संचालित कर रहे हैं। अकेले जम्मू-कश्मीर में हुई आतंकी घटनाओं में एक दशक में लगभग 20 हजार लोग मारे जा चुके हैं तथा आतंक के चलते तीन लाख कश्मीरी पंडित पलायन कर चुके हैं। दुनिया के सभी देश इस सचाई से वाकिफ हैं कि पाकिस्तान आतंकियों के सहारे भारत को तबाह करने का कुचक्र चला रहा है पर सभी अपने स्वार्थो के चलते चुप हैं। इसके अलावा कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण भी हम पाकिस्तान की इन गतिविधियों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठा पा रहे हैं और न ही भारतीय जेलों में बंद आतंकवादियों को दंड देकर यह संदेश दे पा रहे हैं कि तबाही मचाने वालों के प्रति हमारी कोई हमदर्दी नहीं है। इसके बजाय हमारी राजनयिक अपरिपक्वता का नमूना जुलाई 2009 में शर्म-अल-शेख में जारी संयुक्त बयान में दिख जाता है जिसमें पाकिस्तान बड़ी चालाकी से बलूचिस्तान और उसके कुछ हिस्सों में होने वाली अशांति के मुद्दे को शामिल कराने में सफल रहा। इसीलिए आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगा पाने में भारत असफल है और समूचा देश आतंकी खतरे से जूझ रहा है। इस संकट के लिए देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नीति भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। राजनेता और राजनीतिक दल इसी भंवर में फंसे हुए हैं। राजनीति की महिमा गजब है जो आतंकियों से लड़ने की हमारी प्रतिबद्धता को उजागर करती है। अलकायदा सरगना लादेन को समुद्र में दफन किये जाने पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाते हुए कहा, ‘कोई कितना बड़ा आतंकी क्यों न हो, उसके अंतिम संस्कार में धार्मिक मान्यताओं और संवेदनशीलता का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए।’ ऐसा बयान देकर उन्होंने सभी को असहज कर दिया। ऐसा उनकी तरफ से पहली बार नहीं हुआ है। मुम्बई हमले के बाद कांग्रेस की भूमिका पर तत्कालीन अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने देश को जो संदेश भेजा था उसमें कहा गया था कि कांग्रेस ने धर्म की राजनीति खेली थी। 23 दिसम्बर, 2008 को भेजी गयी सूचना के अनुसार ‘कांग्रेस ने पहले अंतुले के बयान से खुद को अलग कर लिया, फिर दो दिन बाद एक विरोधाभासी बयान जारी किया, जिसमें षड्यंत्र की आशंका का आंख मूंद कर समर्थन कर दिया गया। कांग्रेस ने स्वार्थ के कारण अपनी राय बदली। वह इस उम्मीद में थी कि आगामी चुनाव में इससे मदद मिलेगी’। इसी तरह बाटला कांड पर विवादास्पद बयान के कारण भी दिग्विजय सिंह खूब सुर्खियों में रहे हैं। संसद हमले में सुप्रीम कोर्ट से दोषी करार दिये गये अफजल गुरु को सरकार फांसी पर लटकाने से डर रही है। ऐसे में आतंकवाद के खिलाफ मजबूत लड़ाई कैसे सम्भव है? ओसामा का अंत अमेरिका के लिए उपलब्धि है तो भारत के लिए चुनौती। सरकार ने अलकायदा के निशाने पर भारत के काफी ऊपर होने की आशंका जताई है क्योंकि ओसामा के पाकिस्तान में मारे जाने से यह साफ हो गया है कि पिछले कुछ समय से उसका पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना के साथ सहयोग काफी बढ़ गया था। यह सहयोग पाकिस्तान में उसके छिपने तक सीमित नहीं रहा होगा। भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में उसके समर्थन को इसकी स्वाभाविक परिणति माना जा रहा है क्योंकि अलकायदा भारत को अपना विरोधी मानता है। इसलिए भारत उसकी जद में आ सकता है। ऐसे में पाकिस्तान को बेनकाब करने की कोई कोशिश हमें छोड़नी नहीं चाहिए? लादेन को ही आधार बनाकर पाक पर आतंकी शिविर खत्म करने तथा लश्करे तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद व हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों को सहायता देना बंद करने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही हाफिज सईद, दाऊद इब्राहिम और मौलाना मसूद अजहर को पकड़ने के लिए जोर डालना होगा। इस बारे में पाकिस्तान कुछ नहीं कर रहा है जबकि कई दूसरे देशों से अबू सलेम, बंटी पांडे, इकबाल कास्कर तथा दाऊद के दो दर्जन सहयोगियों को भारत लाया गया है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान को मुम्बई हमले में शामिल पाकिस्तानी आतंकियों की सूची और उनकी हरकतों के प्रमाण के बारह दस्तावेज सौंपे गए हैं, जिसमें उसकी जमीन पर भारत के विरुद्ध षडयंत्र की तैयारियों और प्रशिक्षण के प्रमाण भी शामिल हैं। आज आतंकियों को पनाह और मदद देने के लिए पाकिस्तान कटघरे में है। अमेरिका भी उस पर लगाम कस रहा है। ऐसे में हमें उस पर इस तरह का दबाव बनाना चाहिए कि आतंकी घटनाओं पर विराम लग सके। अब यह उजागर हो गया है कि पाक आतंकवादियों की शरण स्थली बन चुका है। इसलिए अमेरिका ने भी उसे चेताया है कि यदि उसने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो वह उसकी जमीन पर घुसकर कार्रवाई करेगा। इन बदले हालात में भारत को अमेरिका को विश्वास में लेकर आतंकी शिविरों के सफाये और मुम्बई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद, लखवी और दाऊद इब्राहिम के साथ अन्य आतंकियों की दृढ़ता के साथ मांग करनी चाहिए। उसे इस तरह का कदम उठाना चाहिए कि पाक दशहत में आ सके क्योंकि ओसामा के सफाये ने भारत को नया अवसर दिया है कि वह दक्षिण एशिया में अग्रणी भूमिका निभाए। उसे दुनिया को बता देना चाहिए कि वह पाक द्वारा हो रही आतंकी कार्रवाई को अब बर्दाश्त नहीं करेगा क्योंकि पाक आतंकवाद का पनाहगार और प्रायोजक है और यह साफ हो चुका है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में वह शामिल नहीं है। इसलिए हमें सख्ती के इस क्रम में पाकिस्तान नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि वार्ता और आतंकवाद साथ नहीं चल सकते। 9/11 की घटना के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के सफाये के लिए वैश्विक अभियान शुरू किया था। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उसी को आगे बढ़ाया और ओसामा का सफाया हुआ। इसी तरह आतंकवाद से लड़ने के लिए राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए ताकि ऐसे संवेदनशील सवाल पर राजनीति न हो सके लेकिन फिलहाल ऐसा न होने के चलते आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई प्रखर नहीं हो पा रही है। क्या राजनीति से ऊपर उठकर सरकार और राजनीतिक दल सोचेंगे? इस बदले हालात में आतंकवाद के सफाये के सवाल पर सरकार के अगले कदम का इंतजार है।
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