पूरी दुनिया में अभी आतंकवाद जिस स्थिति में उसके लिए ओसामा बिन लादेन का मारा जाना एक बड़ा झटका है। इस घटना के बाद आतंकवाद की धारा तो बदलेगी लेकिन अभी इस बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी कि यह धारा किस दिशा में जाएगी। उम्मीद है कि अगले 15 दिनों में आतंकवाद की दिशा को लेकर स्पष्टता आएगी। हालांकि, कुछ बातें हैं जिन पर वैश्विक आतंकवाद की आगे की दिशा निर्भर करती है। इसमें सबसे पहली बात यह है कि इस घटना के बाद पाकिस्तान किस तरह की नीति अपनाता है। पाकिस्तान चाहे लाख बातें करे लेकिन इस घटना से यह बात साफ हो गई है कि आतंकवाद को लेकर वह दोहरा रवैया अपनाए हुए है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वैश्विक समुदाय के साथ कदमताल करने का नाटक भी करता है और दूसरी तरफ आतंकवाद का पोषण भी। देखने वाली बात होगी कि पाकिस्तान आतंक का पोषण जारी रखता है या फिर मुख्यधारा की सियासत की राह चुनता है। आतंकवाद की दिशा इस बात पर भी निर्भर करेगी कि अल कायदा का नेतृत्व अब किसके हाथों में जाता है। नेतृत्व के आधार पर फंडिंग तय होगी। यह देखने वाली बात होगी कि अलकायदा का नेतृत्व किसे मिलता है। अगर इस व्यक्ति पर पैसा देने वालों का भरोसा रहेगा तो फंडिंग बरकरार रहेगी नहीं तो फंडिंग पर असर पड़ेगा। इस वजह से आतंकवाद की जड़ें भी कमजोर होंगी। वैश्विक आतंकवाद की दिशा काफी हद तक इस बात पर भी निर्भर करेगी कि अमेरिका की अफगानिस्तान और पाकिस्तान नीति क्या रुख लेती है? इस नीति के तहत अमेरिका ने अफगानिस्तान से 2014 तक निकल जाने की बात की है। ओसामा की मौत के बाद सम्भव है कि दुनिया के कई देशों में कुछ आतंकी गतिविधियां दिखें। यह जरूरी नहीं है कि इन गतिविधियों को अलकायदा ही अंजाम दे। अलग-अलग देशों में अलग-अलग आतंकी समूह सक्रिय हैं और वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार बदले की भावना के साथ कुछ आतंकी कार्रवाई कर सकते हैं।
पाक बनेगा मुख्य मैदान
इसमें निश्चित तौर पर मुख्य निशाना अमेरिका और अमेरिकी होंगे लेकिन सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान को है। सही मायने में कहा जाए तो पाकिस्तान अब आतंकवाद की लड़ाई का मुख्य मैदान बन सकता है। ऐसे में पाकिस्तान की नीति पर काफी कुछ निर्भर करता है। इतना तो तय है कि ओसामा का मारना अमेरिका का अंतिम लक्ष्य नहीं था। यह आतंकवाद को लेकर उनके कई लक्ष्यों में से एक जरूर था। इसलिए अमेरिका ओसामा को मारकर चुप नहीं बैठने वाला है। अमेरिका ने 14 और आतंकवादियों की सूची तैयार की है। कहा जा रहा है कि लादेन के ठिकाने से जो हार्ड डिस्क अमेरिकी जवान ले गए हैं, उनमें इनके बारे में काफी सूचनाएं हैं। इनके आधार पर अमेरिका या तो इन्हें पकड़ने या फिर मारने के लिए अपनी गतिविधियों में तेजी लाएगा।
सबसे ज्यादा धन सऊदी अरब से
ओसामा के मारे जाने के बाद आतंकवाद की फंडिंग को लेकर भी कई तरह की बातें चल रही हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि आतंकवाद को सबसे ज्यादा धन सऊदी अरब से मिल रहा है। दरअसल, फंडिंग कई बातों पर निर्भर करती है। इनमें सबसे पहली बात तो यह है कि जो पैसा दे रहा है, उसका नेतृत्व में कितना भरोसा है। जब तक ओसामा था, पैसा देने वालों को लगता था कि वह इस्लाम की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ रहा है। इसलिए वे आंख मूंदकर पैसा झोंकते थे। पैसे का आते रहना इस बात पर निर्भर करेगा कि अलकायदा की अगुवाई कौन करता है। अगर अल जवाहिरी आता है तो पैसे की कोई कमी नहीं होगी लेकिन अगर अलकायदा की अगुवाई सुहैब कामिरी करेगा तो फंडिंग पर नकारात्मक असर पड़ेगा क्योंकि जवाहिरी के मुकाबले सुहैब पर पैसा देने वालों कम भरोसा करते हैं। इसके अलावा आतंकवाद को पोषित करने का काम नशीले पदार्थो के कारोबार के जरिये भी होता है। साथ ही जो लोग हज पर जाते हैं; वे भी इन संगठनों को पैसे देते हैं। वहां अलग-अलग कायरे के लिए अलग-अलग बॉक्स बने होते हैं और इनमें आतंकवाद को पोषित करने के लिए धन एकत्रित करने वाला बॉक्स भी है।
पोषक है पाकिस्तान भी
इसके अलावा फिलीपींस और पाकिस्तान जैसे देशों से भी छोटे दान इन आतंकवादी संगठनों को मिलते रहते हैं। आतंकवादी संगठनों को कुछ पैसा जकार्ता से भी मिलता है। यह पैसा यह कहकर जुटाया जा रहा है कि आतंकवादी इस्लाम की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। अगर आतंकवादी संगठनों पर चोट करना है तो इनकी फंडिंग के तंत्र पर भी चोट करना होगा। इसमें सबसे पहली बात तो यह है कि नशीले पदार्थो के व्यापार के सिंडिकेट पर कठोर से कठोर कार्रवाई करनी होगी। सबसे ज्यादा पैसा इसके जरिए ही आतंकवादी संगठनों को मिल रहा है। ये सिंडिकेट दोनों तरफ काम कर रहे हैं। अफगानिस्तान जैसे देशों में जब ये गांजा और अफीम जैसे नशीले पदार्थो की खेती करते हैं तो अमेरिकी सेना को कहते हैं कि वे आतंकवादियों के खिलाफ सूचनाएं मुहैया कराएंगे। ये ऐसा करते भी हैं। पर दूसरी तरफ ये आतंकवादी संगठनों की भी मदद करते हैं। ये आतंकी संगठनों को काफी पैसा देते हैं और इन्ही पैसों से आतंकवादियों का काम आगे बढ़ता रहता है।
मध्यपूर्व का माहौल फंडिंग के विरुद्ध
हालांकि, मध्य पूर्व में सत्ता के खिलाफ जिस तरह से आवाज उठने लगी है, उससे इन आतंकवादी संगठनों की फंडिंग पर नकारात्मक असर पड़ेगा। अब लोगों को यह लगने लगा है कि ये संगठन उनकी समस्याओं को नहीं दूर कर पा रहे हैं। इसलिए अब नया आंदोलन नागरिक समाज के जरिये हो रहा है। अब राजनीतिक मांगों को लेकर लोगों के ढंग बदल रहे हैं। इसमें सबसे अच्छी बात यह हुई है कि लोगों की इन कोशिशों के जरिए बदलाव होते दिख रहे हैं। यह आतंकी संगठनों की सेहत के लिए ठीक नहीं है। आतंकवादी संगठनों को पंगु बनाने के लिए यह भी जरूरी है कि इन संगठनों की फंडिंग को लेकर संयुक्त राष्ट्र के जो भी प्रस्ताव पारित हुए हैं, उन्हें कड़ाई से लागू किया जाए। साथ ही वैश्विक स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाए कि पाकिस्तान दोहरा रवैया बदले। कुछ समय पहले तक पाकिस्तान में अल कसीद नाम का ट्रस्ट काम कर रहा था। इससे काफी पैसा अल कायदा को मिला। जब बात खुली तो इसका नाम बदल दिया गया। अगर पाकिस्तान यह रवैया बरकरार रखता है तो आतंकवाद के खात्मे में काफी मुश्किलें आएंगी। पाकिस्तान के लिए भी यह जरूरी है कि वह अपराध और आतंकवाद आधारित अपनी नीतियों को सियासी बनाने से बाज आए।(हिमांशु से बातचीत पर आधारित)
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