Thursday, May 19, 2011

आतंक की विषबेल


अलकायदा के जनक ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में मार गिराने से आतंकवाद के खिलाफ जंग खत्म नहीं हो गई। लादेन आतंक के ऐसे विषबीज बो गया है, जिनकी विषबेल पूरी दुनिया और खास तौर पर मुस्लिम देशों में फैल गई है। इन बीजों को पोषण इस्लाम की गलत व्याख्या से मिल रहा है। जिहादी निर्दोष लोगों का नरंसहार कर रहे हैं और कह रहे हैं कि इन कृत्यों पर जन्नत में फरिश्ते भी खुश हो रहे होंगे। लादेन की मौत से आतंकवाद के खिलाफ दुनिया की लड़ाई तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक ये बीजाणु जिंदा हैं। अब पाकिस्तान की सफाई करने की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। उन्हें शुरुआत पाकिस्तान सेना से करनी होगी, जहां से यह आतंकवाद दुनियाभर में फैला है। सैन्य तानाशाह जिया उल हक ने पाक सेना को सऊदी अरब से लाए गए इस्लाम के परिवर्तित स्वरूप वहाबवाद से भर दिया था। इस प्रकार पाकिस्तान ने पेट्रो डॉलर की मदद से सऊदी विचारधारा का पोषण और अफगानिस्तान के सोवियत कब्जे के खिलाफ अमेरिकी भूराजनीति के लिए साधन तैयार करने का जिम्मा उठाया था। अमेरिका को अपने पापों का भी प्रायश्चित करना है, क्योंकि अपने स्वार्थ के लिए उसी ने बिन लादेन और इस्लामिक कट्टरता को अफगानिस्तान में पोषित और प्रोत्साहित किया था। अमेरिका को अच्छी-खासी जानकारी है कि पाक सेना ने अलकायदा, तालिबान और यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के बाकी शीर्ष नेताओं को कहां छुपा रखा है। लश्करे तैयबा के हाफिज सईद और दाऊद इब्राहीम जैसे लोग लाहौर और कराची में पूरी आजादी से रह रहे हैं। मुंबई के 26/11 आतंकवादी हमलों और 1993 के सीरियल धमाकों में उनकी भूमिका के बारे में सीआइए तथा अमेरिका द्वारा बनाई गई दूसरी एजेंसियों को भारत बार-बार सुबूतों का पुलिंदा भेज रहा है। फिर भी अमेरिका आतंकवाद को लेकर दोहरे मानदंड अपना रहा है। अमेरिका ने पाकिस्तान को इस हमले की पूर्व सूचना इसलिए नहीं दी थी कि उसे पता था कि खबर मिलते ही उसे सुरक्षित ठिकाने पर पहंुचा दिया जाएगा। पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ छोटे-मोटे छोटे-मोटे आतंकवादियों की सौदेबाजी से अमेरिका से अरबों डॉलर झटकने की बात स्वीकार कर चुके हैं, जबकि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के बड़े नेताओं को बचा लिया गया था। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनेता बने इमरान खान द्वारा प्रभुसत्ता के उल्लंघन का शोर मचाए जाने के बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान में ऐशोआराम से रह रहे दूसरे आतंकवादियों को ढूंढ निकालने का काम करना होगा। साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस बात पर भी जोर देना होगा कि भविष्य में दी जाने वाली आर्थिक मदद देश में प्रचलित शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन की शर्त पर हो, ताकि जिहाद और वहाबवाद के सभी तत्वों को खत्म किया जा सके। पूरी सहायता का उपयोग सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में किया जाना चाहिए, न कि पाकिस्तान आर्मी के लिए, जिसकी देश में सभी शीर्ष आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह प्रदान करने में सांठ-गांठ रही है। अमेरिका को सऊदी घराने के पेट्रो डॉलर पर भी नजर रखनी होगी, जिनसे दुनिया भर में फैले मदरसों में गरीब बच्चों की बुनियादी जरूरतों के नाम पर आतंकवादी तैयार करने में मदद मिल रही है। उत्तरी अफ्रीका और मिश्च में बदलाव की बहार चल रही है। अमरीका को चाहिए कि दरगाहों के रक्षक देश के बगीचे में भी इसे बहने दे। इस मिशन में अमेरिका को भारतीय सहायता लेनी होगी, क्योंकि इस्लाम के बरेलवी और देवबंदी स्कूलों की जड़ें इस उपमहाद्वीप के हमारे हिस्से में ही हैं। आतंकवाद की राख से अभी भी उदारवादी इस्लाम को पुनर्जीवित किया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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