मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ की भूमिका पुख्ता हो गई है। 26/11 हमले को लेकर अमेरिकी अदालत में चल रही पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा के खिलाफ सुनवाई में मुख्य आरोपी पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी ने मंगलवार को गवाही दी। 26/11 मामले में अपनी भूमिका स्वीकार चुके, अभियोजन पक्ष के गवाह हेडली ने कहा कि हमले की साजिश रचने में आइएसआइ, उसके संचालक मेजर इकबाल और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज मुहम्मद सईद ने मदद की और उसे जिहाद के लिए उकसाया। सईद ने उससे कहा कि जिहाद में शामिल होना सौ साल की इबादत के बराबर है। हेडली मौत की सजा से बचने के लिए राणा के खिलाफ गवाही देने को तैयार हुआ है। साजिश की शुरुआत : हेडली ने जज हैरी डी. लीननवेबर से कहा, आइएसआइ और लश्कर ने मिलकर साजिश रची। आइएसआइ ने ही लश्कर को वित्तीय और सैन्य सहायता दी। पाकिस्तान में सैनिक स्कूल से राणा के दोस्त रहे हेडली ने कहा कि मुंबई पर हमलों से दो साल पहले मेजर इकबाल से मिली 25 हजार डॉलर (करीब 11 लाख रुपये) की रकम से उसने साजिश का खाका बनाने पर काम शुरू कर दिया था। जब लश्कर नेताओं ने उससे भारत पर संभावित हमले के बारे में पूछा तो उसने इसमें शामिल होने की इच्छा जताई। उसने कहा, मैंने कहा कि मैं अपना नाम बदल लेता हूं और भारत में प्रवेश के लिए एक नया पासपोर्ट बनवा लेता हूं। इस आतंकी ने बताया कि उसने लश्कर के साथ एक दशक पहले ही पाकिस्तान में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। लश्कर संचालकों ने हेडली का चुनाव इसलिए किया क्योंकि वह अमेरिकी था, इस कारण लोग उस पर आसानी से संदेह नहीं करेंगे। हेडली ने बताया कि सईद और इकबाल के अलावा मेजर अब्दुर रहमान पाशा, जकी साब, साजिद मीर ने उसकी मदद की। अभियोजक सारा स्ट्राइकर ने जज लीननवेबर को बताया कि हेडली ने भारत के प्रमुख परमाणु संस्थान भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) की टोह ली थी और वह मंुबई स्थित शिव सेना के मुख्यालय भी गया था। राणा शुरू से ही हेडली के नापाक मंसूबों से वाफिक था। हेडली डबल एजेंट : दूसरी ओर, राणा के वकील चार्ली स्विफ्ट ने अब्दुर रहमान पाशा और हेडली के बीच हुई वार्ता का एक टेप भी अदालत को सुनाया, जिसमें उसने राणा का मजाक उड़ाया है। स्विफ्ट ने कहा कि हेडली एक डबल एजेंट था, जो एक ही समय आइएसआइ, अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए और ड्रग इंफोर्समेंट एडमीनिसट्रेशन (डीइए) के लिए काम कर रहा था।
Wednesday, May 25, 2011
साजिशकर्ताओं ने बड़े हमले में छोटी-छोटी बातों का रखा ख्याल
अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली ने अपनी गवाही में कहा है कि मुंबई पर आतंकी हमले की साजिश रचते समय पाकिस्तानी साजिशकर्ताओं ने छोटी से छोटी बातों का ख्याल रखा। उसने सोमवार को अदालत में हमले की असाधारण तस्वीर पेश की, जिसके कारण तीन दिन तक भारत असहाय सा नजर आया था। 50 वर्षीय हेडली ने 26/11 हमले की साजिश से संबंधित सभी 12 आरोपों में अपना दोष स्वीकार लिया है। उसने प्ली बार्गेन के तहत अभियोजन पक्ष के साथ समझौता किया है। इसके तहत उसे संघीय अभियोजकों के साथ पूरा सहयोग करना है। अमेरिका के सहायक अटार्नी डेनियल कोलिंस ने साजिश के सभी प्रमुख एवं मामूली विवरणों को उससे जानने की कोशिश की। हेडली ने लश्कर के संचालक मेजर साजिद मीर के साथ हुई बातचीत का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि उसे यह तक बताया गया था कि माथे पर मिहराब से बचने के लिए नमाज कैसे अदा की जाए। लगातार नमाज अदा करते समय सिर झुकाने से माथे पर निशान बन जाता है, जिसे मिहराब कहते हैं। यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि हेडली को अमेरिकी पासपोर्ट पर मंुबई की यात्रा करनी थी। लिहाजा माथे पर काले निशान से उस पर संदेह पैदा हो सकता था। उसे जमीन पर माथा टिकाए बगैर नमाज अदा करने की सलाह दी गई। चार घंटे की गवाही के दौरान हेडली ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी। उसने साजिद मीर और मेजर इकबाल को बताया था कि मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पर गाडि़यों के आगमन-प्रस्थान की घोषणाएं अंग्रेजी और मराठी में होती हैं। अगर हमलावरों को अंग्रेजी नहीं आती होगी तो वे संकट में फंस सकते हैं। उसने वर्ष 2002 में गुजरात में हुए गोधरा दंगों का भी जिक्र किया। हेडली ने बताया कि वर्ष 2002-07 के दौरान लश्कर को गुजरात के मुसलमानों के सैकड़ों पत्र मिले थे, जिसमें उन्होंने मदद की गुहार लगाई थी। हेडली की गवाही कुछ दिनों तक जारी रह सकती है।
हेडली की डायरी में पाक अफसर
मंुबई हमलों के मुख्य आरोपी डेविड कोलमैन हेडली की डायरी से पाकिस्तानी सेना के उच्चाधिकारियों और आतंकियों के कई अन्य मददगारों के फोन नंबर मिले हैं। ये सबूत हमलों की साजिश में पाक सेना, आइएसआइ और आतंकी संगठन जमात-उद-दावा (जेयूडी) की संलिप्तता को पुख्ता करते हैं। हेडली और सह आरोपी तहव्वुर राणा के बयानों और उनसे मिले दस्तावेजों के बाद अब अमेरिका को आइएसआइ का आतंकी चेहरा नजर आने लगा है। इसी का नतीजा है कि अमेरिका जांच और खुफिया एजेंसियां हेडली-राणा के मुकदमे के एक- एक बिंदु पर नजर रख रही हैं। आइएसआइ पर शिकंजा कसने में अमेरिका को राणा हेडली के बयानों से बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है। अमेरिकी अदालत में 26/11 के सह-आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने हेडली की हस्तलिखित डायरी के दो पेज पेश किए। इनमें आइएसआइ के अधिकारी मेजर इकबाल और एक अन्य मेजर एसएम के नाम और फोन नंबर भी लिखे थे। सबूत के तौर पर पेश डायरी के इस भाग को गवर्नमेंट एक्जीबिट डीसीएच-5 नाम दिया गया है। इसमें जेयूडी के आतंकी अब्दुर रहमान मक्की का भी नाम है, जो कि जेयूडी प्रमुख हाफिज सईद का मुख्य सहयोगी माना जाता है। डायरी में वासी का भी नाम और नंबर लिखा है। माना जाता है कि मंुबई हमलों को अंजाम देने वाले दस पाकिस्तानी आतंकियों को वासी ने ही निर्देश दिए थे। डायरी में लिखे अन्य नाम और नंबरों में जहांगीर इनाम, तहसीन, इजाज एम, ताहिर, मंजूर और खालिद का भी नाम है। कुछ संक्षिप्त नामों के तौर पर एआर, एमएच, एमबी और सीबी भी लिखे हैं। डायरी में पाकिस्तानी लोगों के नंबरों के अलावा दुबई के भी दो नंबर हैं। डायरी में फिल्मकार महेश भट्ट के पुत्र राहुल का भी फोन नंबर राहुल बी के नाम से है। इस पर राहुल से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा, हां, नंबर तीन माह पहले तक मेरा था लेकिन व्यक्तिगत कारणों से मैंने इसे वापस कर दिया। हेडली की डायरी में दर्ज उस नंबर पर जब फोन लगाया गया तो अक्षय नाम के किसी व्यक्ति ने फोन उठाया और कहा कि उसे यह नंबर 20 दिन पहले ही मिला है। हेडली और राणा द्वारा 26/11 कांड में संलिप्तता की स्वीकारोक्ति और उनसे मिले दस्तावेजों के बाद अमेरिका की आइएसआइ के प्रति सोच बदलने लगी है। हेडली-राणा के खुलासे के बाद अमेरिका को पहली बार आइएसआइ का आतंकी चेहरा भी नजर आया है। केंद्र सरकार के उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, हेडली-राणा से भारतीय दल को खुलकर पूछताछ करने तक में शर्ते और नियम लगाते रहे अमेरिका के रुख में बदलाव नजर आ रहा है। पहले लादेन का इस्लामाबाद में होना, फिर आइएसआइ की गीदड़ भभकी और अब अमेरिकी अदालत में हेडली के कुबूलनामे के बाद अमेरिका की चिंताएं आतंक के दूसरे स्वरूपों पर जा टिकी हैं। खासतौर से लादेन की मौत का बदला लेने के लिए जिस तरह से इस्लामी आतकंी जगत में हलचल हुई है, उसके बाद अमेरिका की चिंताएं और बढ़ी हैं। पाक के साथ अपने रिश्तों के मद्देनजर आइएसआइ की करतूतों पर परदा डालने के अपने रवैये में बदलाव लाना उसकी मजबूरी हो गया है। वास्तव में आतंकवाद के प्रमुख स्त्रोत के रूप में उभरी आइएसआइ पर शिकंजा कसने के लिए अमेरिका अब मुंबई हमले में उसकी भूमिका के बहाने आगे बढ़ता दिख रहा है। अमेरिका के न्याय विभाग और एफबीआइ ने हेडली के इकबालिया बयान के बाद 26/11 मामले में कार्रवाई तेज कर अपनी इस रणनीति के संकेत भी दे दिए हैं। भारत दौरे पर आने से पहले अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा मंत्री जेनेट नैपोलिटानो का बयान भी अमेरिकी रवैये में आए इस बदलाव को दर्शाता है। जेनेट ने कहा, भारत-अमेरिका मिलकर आंतकवाद के स्रोतों को नष्ट करेंगे। आइएसआइ पर जिन अपराधों के लिए भारत लंबे अरसे से दुनिया का ध्यान चेताता रहा है, वही मुद्दे जेनेट के एजेंडे में हैं। 26 मई को भारत आ रहीं जेनेट ने कहा, आतंकी संगठनों की जीवन रेखा खत्म करने के साथ-साथ धन की तस्करी और नकली नोट भेजने जैसे मामलों पर मैं चर्चा करूंगी। सूत्र कह रहे हैं कि जिस तरह लश्कर, जैश या पाक की जमीन पर पल रहे आतंकी संगठन एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं, वे अकेले भारत नहीं, बल्कि दूसरे देशों के लिए भी खतरा बन सकते हैं। यह चिंता अब अमेरिका को भारत के दावे और रवैये पर मुहर लगाने के लिए मजबूर करेगी।
आइएसआइ के थे राणा व हेडली से संबंध
अमेरिकी अदालत में मुंबई हमले के आरोपी कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा के खिलाफ सोमवार को मुकदमे की सुनवाई शुरू हो गई। सुनवाई के पहले दिन अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के राणा और डेविड हेडली के साथ संबंध थे। शिकागो के डर्कसेन संघीय बिल्डिंग में सुनवाई के दौरान अमेरिकी सहायक अटार्नी जनरल साराह स्ट्राइकर ने कहा कि पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक राणा ने हेडली से मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद कहा कि भारतीय इसी लायक थे। वर्ष 2008 में हुए इस हमले में 166 लोग मारे गए थे। स्ट्राइकर ने कहा कि राणा ने अपने पुराने मित्र हेडली की मदद की जिसने मुंबई हमले से पहले वहां निशाना बनाए जाने वाले स्थानों की टोह लेते समय फोटो खींची। इसके साथ ही राणा ने हेडली को अपने शिकागो स्थित आव्रजन उद्योग के प्रतिनिधि के रूप में पेश किया। उधर, राणा के वकील ने कहा है कि हेडली ने उनके मुवक्किल को धोखा दिया है। अमेरिकी नौसेना में लेफ्टिनेंट कमांडर रह चुके राणा के वकील चार्ली स्विफ्ट ने अमेरिकी अखबार शिकागो ट्रिब्यून को बताया कि राणा का दोष केवल इतना है कि वह हेडली का दोस्त था। वह हेडली के बिजनेस में उसकी मदद करके फंस गया। हेडली ने उसे धोखा दिया है। पाकिस्तान में राणा के स्कूली दिनों से हेडली उसका दोस्त था। हेडली इससे पहले कबूल कर चुका है कि राणा ने भारत में फर्स्ट वर्ल्ड इमिग्रेशन नाम की कंपनी खोलने में उसकी मदद की थी। इसी कंपनी की आड़ में हेडली 2006 से 2008 के बीच भारत आता-जाता रहा। इसी दौरान उसने पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए मंुबई समेत भारत के कई सार्वजनिक स्थानों की रेकी की और मंुबई हमलों को अंजाम दिया। मुकदमे पर कनाडा की भी नजर टोरंटो : राणा के मुकदमे पर पर न केवल भारत, बल्कि कनाडा की नजर भी रहेगी। यदि उसे दोषी ठहराया जाता है तो कनाडा के लिए इसके व्यापक निहितार्थ हो सकते हैं। राणा 1997 में कनाडा आया था। इससे पहले उसने पाकिस्तानी सेना में चिकित्सा सहायक के रूप में सेवा दी थी। कनाडाई विशेषज्ञों का कहना है कि मुकदमे के दौरान यदि आइएसआइ और लश्कर-ए-तैयबा के बीच साठगांठ साबित हो जाती है तो यह वैश्विक स्तर पर व्यापक बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है। ओसामा के पाक में मारे जाने के बाद अमेरिका में इस बात की आशंका बढ़ी है कि आइएसआइ ने लादेन को शरण दे रखी थी.
Thursday, May 19, 2011
आतंक का भस्मासुर
अफगान रक्षा मंत्रालय में 18 अप्रैल को हुए आतंकी हमले से पता चलता है कि तालिबान किस तरह काबुल और इस्लामाबाद के खिलाफ सामरिक पैठ की बदनाम रणनीति पर अमल कर रहा है। पाकिस्तान की सेना और खुफिया तंत्र ने अपने पड़ोसियों की राज-व्यवस्थाओं में तोड़फोड़ के इरादे से परोक्ष युद्ध के लिए तालिबान का गठन किया था। तालिबान को सेना के विशेषज्ञों ने ट्रेनिंग दी थी और हथियार मुहैया कराए थे। लेकिन अब इस घातक सिद्धांत और सैन्य ट्रेनिंग का रुख पाक और अफगान की ओर ही मुड़ गया है। अच्छे या बुरे तालिबान के बारे में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। तालिबान की पहचान उग्रवाद, धार्मिक असहिष्णुता और राजनीतिक आतंकवाद है। पाकिस्तान राष्ट्र और सूफीवाद बराबर तालिबान के निशाने पर हैं। पिछले पांच सालों में पाकिस्तान में सूफी दरगाहों पर तालिबान हमलों में बराबर वृद्धि हुई है। डेरा गाजी खां में साखी सरवर की दरगाह पर हिंसक हमले से पहले भी पाकिस्तान की कई सूफी दरगाहों पर ऐसे हमले हो चुके हैं। ये हमले उस तालिबान के कारनामे हैं जो आतंकवाद के जरिए सत्ता हथियाना चाहते हैं और जो अपने से अलग विचारधाराओं को मानने वालों को तबाह करना चाहता है। तालिबान और अन्य जिहादी तत्वों द्वारा सूफी दरगाहों पर घातक हमलों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। पिछले साल पहली जुलाई को दाता दरबार, लाहौर की दरगाह पर हमला हुआ था। इसके बाद कराची में सूफी संत अब्दुल्ला गाजी की दरगाह पर हमला हुआ। इन हमलों के बाद पाकिस्तान और भारत में बाबा फरीद के नाम से मशहूर बाबा फरीदुद्दीन मसूद शहर गंज की दरगाह पर एक बम धमाका हुआ। सूफी दरगाहों पर हमलों का यह सिलसिला 2011 में भी जारी है। द्रोण गाजी खास जिले में सखी सरवर की दरगाह और इसके बाद बलूचिस्तान व खैबर पख्तूनख्वा में भी दरगाहों को निशाना बनाया गया। लगता है कि पाकिस्तान सरकार भी सीधे तालिबान से मुकाबले में डर रही है और जम्मू-कश्मीर में परोक्ष युद्ध तथा अफगानिस्तान में सामरिक पैठ के हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल करना चाहती है। उसकी तालिबान के खात्मे में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। आतंक के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई को समर्थन के बारे में इसने बड़े-बड़े दावे तो किए, पर इस लड़ाई की प्रमुख सेना तालिबान पर अंकुश लगाने और उसे पराजित करने के लिए उसने कुछ नहीं किया। दरअसल, आतंकवाद के खिलाफ कथित लड़ाई का नकारात्मक असर हुआ है। इसने अमेरिका के कथित सहयोगी देश पाकिस्तान में ही अमेरिका के खिलाफ माहौल को जन्म दिया है। पाकिस्तान का दुलारा आतंकी बच्चा अब खुद पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए एक भारी खतरे के रूप में उभर रहा है। पाक आर्मी और पुलिस प्रशासन पर आए दिन हमले हो रहे हैं। पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में तालिबान के मदरसे और ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं। सरकार उनकी ओर से आंखें फेर लेती है और सेना उन्हें देख कर संतुष्ट होती है। इस बारे में हर कोई जानता है, लेकिन बोलता नहीं। तालिबान की ताकत बढ़ती जा रही है और वह राष्ट्र को कमजोर करने की उम्मीद लगाए बैठा है। राष्ट्र तो अपनी भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं में बंधा है, जबकि तालिबान के लिए कोई सीमा, राष्ट्रीयता और पैसे की कमी नहीं है। राजनयिक रूप से पाकिस्तान के हमदर्द कई मुस्लिम देशों से उन्हें रंगरूट, साजोसामान और पैसा मिल जाता है। सलमान तसीर की हत्या ने दिखा दिया कि अपने एक सूत्रीय एजेंडे के लिए यह आतंकी तंत्र किस हद तक जा सकता है। असल लड़ाई तालिबान की सामरिक पैठ और पाक व अफगान राष्ट्रों के बीच है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
आतंक की विषबेल
अलकायदा के जनक ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में मार गिराने से आतंकवाद के खिलाफ जंग खत्म नहीं हो गई। लादेन आतंक के ऐसे विषबीज बो गया है, जिनकी विषबेल पूरी दुनिया और खास तौर पर मुस्लिम देशों में फैल गई है। इन बीजों को पोषण इस्लाम की गलत व्याख्या से मिल रहा है। जिहादी निर्दोष लोगों का नरंसहार कर रहे हैं और कह रहे हैं कि इन कृत्यों पर जन्नत में फरिश्ते भी खुश हो रहे होंगे। लादेन की मौत से आतंकवाद के खिलाफ दुनिया की लड़ाई तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक ये बीजाणु जिंदा हैं। अब पाकिस्तान की सफाई करने की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। उन्हें शुरुआत पाकिस्तान सेना से करनी होगी, जहां से यह आतंकवाद दुनियाभर में फैला है। सैन्य तानाशाह जिया उल हक ने पाक सेना को सऊदी अरब से लाए गए इस्लाम के परिवर्तित स्वरूप वहाबवाद से भर दिया था। इस प्रकार पाकिस्तान ने पेट्रो डॉलर की मदद से सऊदी विचारधारा का पोषण और अफगानिस्तान के सोवियत कब्जे के खिलाफ अमेरिकी भूराजनीति के लिए साधन तैयार करने का जिम्मा उठाया था। अमेरिका को अपने पापों का भी प्रायश्चित करना है, क्योंकि अपने स्वार्थ के लिए उसी ने बिन लादेन और इस्लामिक कट्टरता को अफगानिस्तान में पोषित और प्रोत्साहित किया था। अमेरिका को अच्छी-खासी जानकारी है कि पाक सेना ने अलकायदा, तालिबान और यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के बाकी शीर्ष नेताओं को कहां छुपा रखा है। लश्करे तैयबा के हाफिज सईद और दाऊद इब्राहीम जैसे लोग लाहौर और कराची में पूरी आजादी से रह रहे हैं। मुंबई के 26/11 आतंकवादी हमलों और 1993 के सीरियल धमाकों में उनकी भूमिका के बारे में सीआइए तथा अमेरिका द्वारा बनाई गई दूसरी एजेंसियों को भारत बार-बार सुबूतों का पुलिंदा भेज रहा है। फिर भी अमेरिका आतंकवाद को लेकर दोहरे मानदंड अपना रहा है। अमेरिका ने पाकिस्तान को इस हमले की पूर्व सूचना इसलिए नहीं दी थी कि उसे पता था कि खबर मिलते ही उसे सुरक्षित ठिकाने पर पहंुचा दिया जाएगा। पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ छोटे-मोटे छोटे-मोटे आतंकवादियों की सौदेबाजी से अमेरिका से अरबों डॉलर झटकने की बात स्वीकार कर चुके हैं, जबकि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के बड़े नेताओं को बचा लिया गया था। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनेता बने इमरान खान द्वारा प्रभुसत्ता के उल्लंघन का शोर मचाए जाने के बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान में ऐशोआराम से रह रहे दूसरे आतंकवादियों को ढूंढ निकालने का काम करना होगा। साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस बात पर भी जोर देना होगा कि भविष्य में दी जाने वाली आर्थिक मदद देश में प्रचलित शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन की शर्त पर हो, ताकि जिहाद और वहाबवाद के सभी तत्वों को खत्म किया जा सके। पूरी सहायता का उपयोग सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में किया जाना चाहिए, न कि पाकिस्तान आर्मी के लिए, जिसकी देश में सभी शीर्ष आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह प्रदान करने में सांठ-गांठ रही है। अमेरिका को सऊदी घराने के पेट्रो डॉलर पर भी नजर रखनी होगी, जिनसे दुनिया भर में फैले मदरसों में गरीब बच्चों की बुनियादी जरूरतों के नाम पर आतंकवादी तैयार करने में मदद मिल रही है। उत्तरी अफ्रीका और मिश्च में बदलाव की बहार चल रही है। अमरीका को चाहिए कि दरगाहों के रक्षक देश के बगीचे में भी इसे बहने दे। इस मिशन में अमेरिका को भारतीय सहायता लेनी होगी, क्योंकि इस्लाम के बरेलवी और देवबंदी स्कूलों की जड़ें इस उपमहाद्वीप के हमारे हिस्से में ही हैं। आतंकवाद की राख से अभी भी उदारवादी इस्लाम को पुनर्जीवित किया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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