Wednesday, June 1, 2011

आतंकियों की एक अलग ही नस्ल का नाम है डेविड हेडली


दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कोलमैन हेडली आम आतंकी नहीं है। बेहद शातिर और आतंक की भट्ठी में तपकर तैयार हुआ हेडली आतंकियों की एक अलग ही नस्ल है। अमेरिकी मां और पाकिस्तानी पिता से जन्मा यह आतंकी अपनी गोरी त्वचा और कई भाषाओं का जानकार होने खासकर अंग्रेजी में अच्छी पकड़ के चलते किसी भी खुफिया एजेंसी को चकमा देने में समक्ष था। वाशिंगटन डीसी में जन्मे हेडली के पास अमेरिकी पासपोर्ट होने के कारण उसके लिए किसी भी देश में आवागमन आसान था। उसने पाकिस्तान में छह आतंकवादी प्रशिक्षण पाठ्यक्त्रम में भाग लिया और बन गया आतंकियों की दुर्लभ नस्ल। वर्ष 2000 में डेविड हेडली ने पाकिस्तान के एक मस्जिद में एक भर्ती पोस्टर पर एक फोन नंबर देखा। उसने फोन मिलाया और आतंकवादी के रूप में अपने दशक पुराने कैरियर की उसी समय शुरुआत की। मुंबई हमले में अपनी भूमिका स्वीकारने वाले मृदुभाषी पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी शख्स के लिए यह सिर्फ आतंकियों के साथ एक बैठक मात्र थी। लेकिन इसी बैठक ने उसे ऐसा आतंकी बना दिया जो अन्य आतंकियों की प्रजाति से भिन्न था। अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआइ के हत्थे चढ़े डेविड हेडली ने 2010 में कबूल किया कि उसने मुंबई पर हमले के लिए जमीन तैयार की थी। अब वह शिकागो की अदालत में अपने दोस्त और बिजनेस पार्टनर तहव्वुर हुसैन राणा के खिलाफ गवाही दे रहा है। राणा पर आरोप है कि उसने हेडली को मुंबई में विभिन्न स्थानों की रेकी के दौरान सुरक्षा छतरी मुहैया कराई थी। राणा ने हालांकि अपनी भूमिका से इंकार किया है। गवाही में हेडली ने भारत और पाकिस्तान के बीच कई यात्राओं का जिक्र किया है। साथ ही उसने लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के अधिकारी मेजर इकबाल उर्फ चौधरी खान के साथ आमने-सामने और ईमेल के जरिये हुई बातचीत का भी विवरण दिया है। करीब एक दशक तक हेडली एक देश से दूसरे देश तक यात्रा के दौरान किसी भी खुफिया या सुरक्षा एजेंसी के रडारों का चकमा देने में कामयाब रहा। हेडली जहां कहीं भी जाता खुद हाथ में कलावा (हिंदुओं की निशानी) और बैग में एक ईसाई धर्म से संबंधित एक किताब रखता था। उसने साल 2006 में अपना नाम दाऊद गिलानी से बदलकर डेविड कोलमैन हेडली रख लिया था। लेकिन आखिरकार 2009 में उसकी यात्रा ने ही उसे पकड़वा दिया। अमेरिकी अधिकारी डेविड नाम के एक अंतरराष्ट्रीय भ्रमण करने वाले इंसान की तलाश में थे। अगस्त 2009 में हेडली कस्टम अधिकारियों के हत्थे चढ़ा। इसके बाद एफबीआइ उसके पीछे लग गई और 7 सितंबर को उसे धर-दबोचा। हेडली की दोहरी नागरिकता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यात्रा करने की उसकी क्षमता के असामान्य मिश्रण ने उसे अन्य आतंकयों से जुदा कर दिया। उसने अन्य आतंकियों के लिए भी रास्ता आसान कर दिया। आजकल विश्व के किसी भी कोने से लोगों को जोड़ने के लिए कट्टरपंथी इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं। अंग्रेजी बोलने वाले मौलाना यू-ट्यूब पर लोगों को पश्चिमी देशों द्वारा किए जा रहे अन्याय के खिलाफ खड़े होने की अपील कर रहे हैं। यही नहीं अंग्रेजी लेखों से भरपूर इंटरनेट मैगजीन भी प्रकाशित की जा रही हैं, जिसमें बताया जा रहा है कि किस तरह वह अपने घर के रसोई में बम तैयार कर सकते हैं और कैसे पकड़े जाने से बच सकते हैं। अगर कोई जिहाद में शरीक होना चाहता है तो उसके लिए काफी तरीके हैं, जिसमें वह अपने लिए उपयुक्त का चयन कर सकता है। हेडली की तरह अत्यधिक प्रशिक्षण आज के दौर में उनके प्रासंगिक तो है लेकिन यह सफलता की गारंटी नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के कार्यकाल में आतंक निरोधक दस्ते से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी जुयान जेरेट बताते हैं कि करीब एक दशक तक आतंकियों के नेटवर्क खंगालने के बाद अब ऐसा लगता है कि पारंपरिक आतंकियों का दौर नहीं रहा। यानी अब बहुत ज्यादा प्रशिक्षण देने की आतंकियों को जरूरत नहीं रही। निदाल हसन का उदाहरण सामने हैं। अमेरिकी सेना के मेजर निदाल ने साल 2009 में टेक्सास के फोट हूड में गोलीबारी कर 13 लोगों को मौत की नींद सुला दी थी। हसन ने इसके लिए कई महीने या साल का प्रशिक्षण नहीं लिया बल्कि यमन में अलकायदा के ठिकानों में छिपे एक मौलाना से जिहाद के बारे में जाना था। न्यूयार्क सिटी के व्यस्त मार्ग पर एक ट्रक को उड़ाने की कोशिश करने वाले फैजल शहजाद ने भी आतंकी बनने के लिए कोई ज्यादा प्रशिक्षण नहीं लिया। अमेरिकी पासपोर्ट हासिल करने के एक महीने बाद ही शहजाद को पाकिस्तान तालिबान ने 2009 के आखिरी में 15000 डॉलर और विस्फोटकों के बारे में सिर्फ पांच दिन का प्रशिक्षण दिया था। मार्च में जर्मन एयरपोर्ट पर हमला कर दो अमेरिकी सैनिकों को मारने वाले 21 वर्षीय अरीद उका तो इंटरनेट पर आतंकी वेबसाइटों को देखकर ही फिदायीन बन बैठा। जार्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के होमलैंड सिक्यूरिटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर फ्रैंक कुलुफो का कहना है कि विदेशों में ट्रेनिंग लेने वाले और विदेशी आतंकी संगठनों से जुड़े लोग ज्यादा प्राणघातक साबित होंगे। उनका यह भी कहना है कि आतंकी और उनके प्रशिक्षण का तरीका अलग-अलग हो गए हैं। कमजोर सरकार वाले देशों में तो आतंकी संगठन फल-फूल ही रहे हैं, इंटरनेट ने उन्हें एक और रास्ता दे दिया है। इसके जरिये भी आतंकी भर्ती किए जा रहे। हम उन्हें हल्के में नहीं ले सकते क्योंकि वे भी खतरनाक साबित हो सकते हैं.

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