Wednesday, June 1, 2011

26/11 की खौफनाक प्रतिध्वनि


लेखक पाकिस्तान में आतंकी तत्वों को पाक सेना व आइएसआइ की अवैध संतान बता रहे हैं...
विश्व में आतंक का सबसे बड़ा प्रायोजक पाकिस्तान खुद को आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार कहलाना पसंद करता है। 3.2 अरब डॉलर की वार्षिक अमेरिकी मदद भी पाकिस्तान को आतंकियों से संबंध तोड़ने और तेजी से बढ़ते परमाणु हथियार कार्यक्रम की गति धीमी करने के लिए काफी नहीं है। इसके बजाए, पाकिस्तान आतंक के शिकार होने के सुविधाजनक प्रलाप से विश्व को धोखा देने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के प्रमुख नौसेना अड्डे पर आतंकवादी हमला इस कहावत की पुष्टि करता है कि जो आग से खेलते हैं, वे उसी में जल जाते हैं। यह हमला सुनियोजित और पेशेवर अंदाज में किया गया। ऐसे हमलों का प्रशिक्षण आइएसआइ ने उन आतंकियों को भी दिया था, जिन्होंने नवंबर 2008 में मुंबई पर हमला किया था। आतंकवाद को पोषित करने और आतंकी ढांचा खड़ा करने के बाद अब पाकिस्तानी सेना और इसकी खुफिया एजेंसी वही फसल काट रही है जिसके बीज इसने बोए थे। कराची के नौसेना अड्डे पर हमले को अंजाम देने वाला पाकिस्तानी तालिबान भी अफगान तालिबान की तरह पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की अवैध औलाद है। अंतर महज इतना है कि पाकिस्तानी तालिबान पाकिस्तानी सेना की प्रतिशोध की देवी है, जबकि अफगान तालिबान उसका पसंदीदा मुख्तार है। अफगान तालिबान की अगुवाई एक आंख वाला मुल्ला उमर कर रहा है। सिराजुद्दीन हक्कानी गुट अफगान तालिबान का प्रमुख सहयोगी है और हफीज सईद व उसका संगठन लश्करे-तैयबा प्रमुख विश्वासपात्र। अफगान तालिबान को मदद और शरण मुहैया कराने वाली पाकिस्तानी सेना बाजौर, मोहमंड, बुनेर और अन्य कबीलाई इलाकों में पाकिस्तानी तालिबान के खिलाफ हमले कर रही है। पाकिस्तान की निशानदेही पर ही पाकिस्तानी तालिबान का प्रमुख बैतुल्ला महसूद अमेरिकी मिसाइल हमले में मारा गया था। उसके उत्तराधिकारी हकीमुल्ला महसूद ने दक्षिणपूर्वी अफगानिस्तान में सीआइए शिविर पर आत्मघाती हमला किया था, जिसमें इसके पांच अधिकारी और दो अमेरिकी ठेकेदार मारे गए थे। सेना ने पाकिस्तानी तालिबान पर जितने अधिक हमले किए पाक तालिबान ने उतना ही जोरदार प्रतिशोध लिया और देश भर में पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ पर दुस्साहसिक हमलों की झड़ी लगा दी, इनमें 2009 में पाक सेना के मुख्यालय पर किया गया हमला भी शामिल है। महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन हमलों को अंजाम देने वाले वे तत्व हैं जिन्हें पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान मदद दे रहा है। अंदरूनी मदद के बगैर आतंकवादी नौसैनिक अड्डे की सुरक्षा में सेंध नहीं लगा सकते थे, आसानी से अपने लक्ष्य चिह्नित नहीं कर सकते थे और तेजी से एयरक्राफ्ट तक नहीं पहुंच सकते थे, जिनमें निगरानी रखने वाले पी-3सी एयरक्राफ्ट भी शामिल थे। अमेरिका ने परंपरागत भारतीय सैन्य शक्ति के खिलाफ संतुलन बनाए रखने के नाम पर पाकिस्तान को हारपून एंटीशिप मिसाइल और एफ-16 लड़ाकू जहाजों के साथ-साथ पी-3सी एयरक्राफ्टों की भी आपूर्ति की थी। पाक सेना के अंदर से आतंकियों को मिल रही मदद अधिक चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इससे पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का जिहादियों के हाथों में पड़ने का खतरा बढ़ गया है। वास्तव में, पाकिस्तान जितना अधिक विफल राष्ट्र प्रतीत होता जा रहा है, उतना ही तेजी से यह अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। परमाणु हथियार प्रतिरोध के लिए हैं। ये विफल राष्ट्र निर्माण का जवाब नहीं हो सकते। किंतु पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों को सैन्य उपयोगिता के बजाए राजनीतिक औजार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। स्पष्ट है कि परमाणु हथियार पाकिस्तान को जिहादी अंधकूप में गिरने से नहीं बचा सके हैं। न ही ये पाकिस्तान को अंत:विस्फोट से बचा सकते हैं। आज एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान का अस्तित्व खतरे में है। पाकिस्तान एक ऐसा राष्ट्र बन चुका है, जिसमें सुशासन संभव ही नहीं रह गया है। चीन और अमेरिका का पाकिस्तान को लेकर अलग-अलग नजरिया है। इसका पता इससे चलता है कि कराची नौसैनिक अड्डे पर आतंकी हमले के दौरान वहां छह अमेरिकी और 11 चीनी इंजीनियर मौजूद थे, जो हमले में सुरक्षित बच गए। पाकिस्तान को विफलता से बचाने के लिए अमेरिका इस्लामाबाद को अधिकाधिक धन भेज रहा है। इसी कारण पाकिस्तान सबसे अधिक अमेरिकी सहायता पाने वाला राष्ट्र बन गया है। जिस प्रकार अमेरिका ने एक्यू खान के नेतृत्व में परमाणु तस्करी की पाकिस्तान को खुली छूट देकर परमाणु प्रसार पर अंकुश नहीं लगाया, उसी प्रकार ओसामा बिन लादेन प्रकरण से मिले अवसर को भी वह गंवा रहा है। पाकिस्तान के अनेक सैन्य प्रतिष्ठान वाले शहर एबटाबाद में एक विशाल भवन में ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ की जानकारी के बगैर रहना संभव ही नहीं था। इसके विपरीत, यह परिसर ओसामा बिन लादेन की सुरक्षित पनाह के तौर पर निर्मित किया गया लगता है। लादेन और पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान के बीच कुछ इस तरह का करार हुआ होगा कि सेना ओसामा की सुरक्षा करेगी और संदेशवाहकों के जरिये उसे अलकायदा के संचालन का मौका देगी। बदले में बिन लादेन को आइएसआइ के अनुसार चलना होगा और तब तक वहां रहना होगा, जब तक पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान उसे अपने फायदे के लिए वहां रखना चाहे। चीन की भूमिका अधिक संदिग्ध रही है। यह ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद की घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है। पाकिस्तान पर अमेरिका के दबाव को कम करने और भारत की परेशानी बढ़ाने के लिए उसने पाकिस्तान को 50 जेएफ-17 विमानों का दूसरा बेड़ा उपहार में देने की घोषणा कर दी। इसके अलावा ग्वादर बंदरगाह के परिचालन के लिए चीन तैयार हो गया। पाक अधिकृत कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास अपने सैनिकों की संख्या में वृद्धि करके तथा विविध रूपों में कश्मीर कार्ड खेलकर चीन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि जम्मू-कश्मीर ऐसा क्षेत्र है जहां चीन-पाक मिलकर भारत पर शिकंजा कस सकते हैं। अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में तो चीन सैन्य दबाव बढ़ा ही रहा है। चीन के असल आक्रामक मंसूबे जम्मू-कश्मीर में केंद्रित हैं। इसके बावजूद, अमेरिकी दबाव में भारत के कमजोर प्रधानमंत्री ने इस क्षेत्र से सैन्य उपस्थिति कम कर दी है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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