Wednesday, June 1, 2011

पाक के लिए चुनौती बने चरमपंथी


वैसे तो पाकिस्तान में आतंकवादी हमले कोई नहीं बात नहीं है, लेकिन अब जिस अंदाज में आतंकवादियों ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया है, वह न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि पड़ोसी देशों और अमेरिका के लिए भी चिंता का विषय है। ये हमले तब हुए हैं, जब हाल ही में दुनिया का मोस्टवांटेड ओसामा बिन लादेन मारा गया है। निश्चित रूप से इस हमले की अहमियत बढ़ जाती है, क्योंकि पाकिस्तान में इस तरह के हमले लादेन की मौत की प्रतिक्रिया स्वरूप भी हो सकते हैं। खैर, पाकिस्तान के मेहरान नौसैनिक ठिकाने पर पिछले दिनों हुए आतंकवादी हमले से यह सिद्ध हो रहा है कि हमलावर पहले से ज्यादा मजबूत होते जा रहे हैं। वरना, इस मजबूत सैन्य घेरे में घुसना इनके लिए आसान नहीं था। संदेह यह भी है कि आतंकवादियों की मदद कोई पाकिस्तानी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ही न कर रहा हो। यदि इस तरह के संकेत मिलते हैं तो यह और भी ज्यादा गंभीर मसला हो जाता है। पिछले दिनों पाकिस्तान के मेहरान नौसैनिक ठिकाने पर हुए आतंकवादी हमले के बाद आतंकवादियों पर काबू पाने में स्पेशल सर्विसेज ग्रुप-नेवी (एसएसजी-एन) को पंद्रह घंटे लगे थे। खास बात यह है कि पाकिस्तान में एसएसजी-एन की हैसियत अमेरिकी नौसेना के सील दस्ते जैसी है। इसलिए इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि मेहरान नेवी बेस पर कार्रवाई के दौरान घंटों तक एसएसजी-एन आतंकवादियों के सामने प्रभावहीन दिखे। पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी भी मानते हैं कि वे साधारण आतंकी नहीं थे। तालिबान तो बिल्कुल ही नहीं। तालिबान के हमलावर अधिकतम लोगों को मारने और ज्यादा से ज्यादा विनाश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन मेहरान सैन्य ठिकाने पर हमला करने वालों का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट था। हमले की शुरुआत से ही साफ हो गया था कि हमलावरों को सैनिक ठिकाने के भीतर की स्थिति की पूरी जानकारी है। उन्हें इस बात का भरोसा था कि वे अपने मकसद में सफल होंगे। इससे स्पष्ट होता है कि हमले की योजना लंबे समय से बनाई जा रही थी। हमलावरों को सैन्य ठिकाने के कमजोर पहलुओं की जानकारी थी। तभी तो वे आसानी से अपने लक्ष्य में कामयाब हो गए। निश्चित रूप से यह जानकारी उन्हें अंदर के सूत्रों से ही मिली होगी। पाक मामलों के जानकार बताते हैं कि मेहरान का आतंकी हमला अलग किस्म का था। हमलावरों का हुलिया और उनकी चाल-ढाल सैनिकों जैसी थी। आतंकी किसी रणनीतिक सैन्य संरचना के अनुरूप संगठित होकर आगे बढ़ रहे थे। वे आपस में उर्दू के अलावा एक विदेशी भाषा का भी इस्तेमाल कर रहे थे। सैनिकों जैसी वर्दी पहन रखी थी। उनके पास अंधेरे में देखने में सहायक उपकरण भी थे। दिलचस्प यह भी है कि नाइट विजन उपकरणों का आसानी से इस्तेमाल बहुत अभ्यास के बाद ही संभव हो पाता है, लेकिन हमलावर इसमें भी एक्सपर्ट थे। पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी तो यहां तक मानते हैं कि हमलावर अच्छे निशानेबाज थे। उन्होंने अपने नाइट विजन चश्मों का खूब फायदा उठाया। यही कारण है कि एसएसजी-एन के जवानों के मौके पर पहुंचने तक वे बेरोक-टोक हमले करते रहे। जब दोतरफा लड़ाई शुरू हुई तो साफ लग रहा था कि वे खासी देर तक अपने बल पर मुकाबला करने में सक्षम हैं। उनके पास एम-16 कार्बाइन और स्नाइपर राइफलें होने की बात भी कही गई है। इस तरह उपरोक्त तथ्यों से साफ हो जाता है कि वे तालिबान हमलावरों से अलग तरह के थे। तालिबान के हमले भी भयानक होते हैं, लेकिन उनके हमलावर इस तरह संगठित नहीं होते। बताते हैं कि पाकिस्तानी सैनिकों से तो तालिबान के लड़ाकों की तुलना ही नहीं की जा सकती। तालिबान के पास सबसे बड़े हथियार होते हैं आत्मघाती हमलावर। साथ ही वे अच्छे निशानेबाज भी नहीं होते हैं। तालिबान की दिलचस्पी सैनिक साजो-सामान को नष्ट करने में नहीं, बल्कि लोगों की जान लेने में होती है। हालांकि इस घटना के बाद पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मंत्री रहमान मलिक ने इसे कायरतापूर्ण कार्रवाई बताया, लेकिन हमला जिस तेजी के साथ किया गया, उस पर सैनिक अधिकारी हैरान हैं। विमानों को नष्ट करने में हमलावरों को कुछ ही मिनट ही लगे होंगे। हमलावर जिस कदर तेजी से अपनी रणनीति बदल रहे थे, वह भी हैरानी की बात है। हालांकि एसएसजी-एन के जवानों ने बैरकों में घुसे आतंकवादियों को मार डाला, लेकिन इस संघर्ष को देख यही कहा जा सकता है कि हमलावर लंबी लड़ाई की तैयारी करके पहुंचे थे। हालांकि पाकिस्तान इस बात से इनकार कर रहा है कि यह आतंकवादी हमला ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की प्रतिक्रिया में था, लेकिन लगता है कि पाकिस्तानी हुकूमत झूठ बोल रही है। क्योंकि पाकिस्तानी नौसेना पर इसी माह हुए दो अन्य हमलों की जिम्मेदारी भी तालिबान ने कबूल की थी। अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद तालिबान ने एलान किया था कि वह उनकी मौत का बदला अवश्य लेगा। उपरोक्त हालात के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में आतंकवादी अब सरकार के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। पहले आतंकवादियों को शासन की ओर से दबा दिया जाता था, लेकिन अब वे मजबूत स्थिति में होते जा रहे हैं। यह न सिर्फ पाकिस्तान हुकूमत के लिए चुनौती है, बल्कि भारत और अमेरिका के लिए भी। 25 मई को दिल्ली में हुए धमाके के पीछे भी किसी पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन का ही हाथ होना माना जा रहा है। तमाम सरकारी व्यवस्था को धता बताते हुए ये आतंकवादी अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं, यही सोचने वाली बात है। सवाल यह उठता है क्या ये आतंकवादी संगठन खुद को इतना मजबूत कर चुके हैं कि वे समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं। यदि जब सकारात्मक है तो आसपास और पड़ोसी देशों को पाकिस्तान के बारे में सोचना होगा।

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