Wednesday, June 29, 2011

पाक की बदनीयता की बानगियां


जब पूरी दुनिया विकास की क्रांति लाते हुए अपने देश के संसाधनों को बढ़ा रही थी, तब हमारा पड़ोसी देश आतंकवाद की फसल अपने देश में बो रहा था। पूरी दुनिया के देशों ने 70 के दशक से शुरू करके 90 के दशक के आखिर तक अपनी विकास दर को खूब बढ़ाया, लेकिन पाकिस्तान की विकास दर उस समय भी 2-3 प्रतिशत के बीच ही रही। क्या कोई सोच सकता है कि इस समय यानी 2011 में पाकिस्तान की विकास दर 2.7 प्रतिशत है और मुद्रा स्फीति की दर 14.7 प्रतिशत। इस प्रकार के हालात की जड़ में जाएं तो पता लगेगा कि इस सबके पीछे पाकिस्तान के शासकों की भारत के प्रति नफरत व द्वेष की भावना भी काफी हद तक जिम्मेदार है। इस समय पाकिस्तान में 11 घरेलू आतंकवादी संगठन हैं। इनमें हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत उल अंसार, लश्करे-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद। जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट फ्रंट आदि प्रमुख हैं। इन आतंकी संगठनों में कुछ का मुख्य केंद्र कश्मीर है और कुछ का अफगानिस्तान। इन आतंकी संगठनों के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई में न चाहते हुए भी पाकिस्तान को सहयोग देना पड़ रहा है इसीलिए ये आतंकवादी संगठन अब पाकिस्तान के ही खिलाफ हो गए हैं। नतीजतन हर दूसरे दिन पाकिस्तान में बम धमाके हो रहे हैं। इस तरह आतंकी गतिविधियों में अब तक पाकिस्तान में 30 हजार से ज्यादा नागरिक मारे जा चुके हैं। पिछले महीने जब अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को ढेर कर दिया तो आतंकी संगठनों को और भरोसा हो गया कि पाकिस्तानी सेना अमेरिका को पूरा सहयोग दे रही है। आए दिन ड्रोन हमले व एरियल बमबारी सीमावर्ती प्रांतों में आतंकवादियों को भारी क्षति पहुंचा रही है। 2007-08 में पाकिस्तानी आर्मी का स्वात घाटी में चलाया अभियान ये आतंकी संगठन भूले नहीं हैं। पाकिस्तान अपनी आर्थिक तंगी के कारण अमेरिका का साथ देने के लिए मजबूर है। पाकिस्तान में बाहर से निवेश आना बिल्कुल बंद है। अब वहां का सारा बाहरी खर्चा अमेरिका और अरब देशों की मदद पर चल रहा है। पाकिस्तान का एक उदारवादी धड़ा इन आतंकवादियों से मुक्ति चाहता है तथा इनके खात्मे के लिए पाकिस्तानी पार्लियामेंट ने वर्ष 2008 में एक प्रस्ताव पास किया था, लेकिन सरकार की स्थिति काफी कमजोर होने के कारण यह प्रस्ताव वहां लागू नहीं हो पाया। अब दोबारा पार्लियामेंट ने प्रस्ताव पास किया है कि सरकार को अमेरिका और इन संगठनों से बातचीत शुरू करनी चाहिए, जिससे इनकी गतिविधियों को रोका जा सके। लेकिन लादेन की मौत के बाद इस प्रस्ताव की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। जहां तक भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैये का सवाल है तो पाक सेना ने मानो कसम खा रखी है कि जब तक वह भारत से 1971 की हार का बदला नहीं लेगी, तब तक चैन से नहीं बैठेगी। वह हर हाल में कश्मीर को भारत से अलग करना चाहती है। इसके लिए आइएसआइ कभी हेडली की मदद लेती है तो कभी तहव्वुर राणा को भारत विरोधी अभियान में शामिल करती है। पाकिस्तान अफगान सीमा पर सक्रिय आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई में अमेरिका की मदद कर सकता है, लेकिन भारत के खिलाफ काम करने वाले आतंकियों पर वह कभी लगाम नहीं कसेगा। यह भारत सरकार हर हालत में समझ ले कि भारत में हर आतंकवादी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ द्वारा समर्थित और भेजा हुआ है। मुंबई हमले के बाद से ही साफ था कि इसमें कहीं न कहीं पाकिस्तान की सेना का भी हाथ है। अन्यथा, एक ग्रुप इतनी दूर से दूसरे देश में किसी आतंकवादी घटना को कैसे अंजाम दे सकता है। हमें यहां यह भी समझना होगा आतंक के खिलाफ भारत भारत की मुहिम में अमेरिका से कोई सहयोग नहीं मिल सकता। अमेरिका एक मौका परस्त देश है। वह किसी भी सूरत में अपने हित के आगे कभी भी पाकिस्तान पर इसके लिए दबाब नहीं बनाएगा। हां, जब भी भारत पाकिस्तान से बातचीत बंद करेगा या कड़ा रुख अपनाएगा तो अमेरिका भारत पर दबाब डालकर उससे बातचीत चालू करवाएगा ताकि दुनिया अमेरिका की दबंगई की दाद देती रहे। इसलिए मौजूदा हालात में हमें अपने देश की सैन्य तैयारियों को हमेशा चुस्त दुरुस्त रखना चाहिए। भारत में सांप्रदायिक सौहा‌र्द्र तथा अपने अल्पसंख्यक वर्ग को मुख्य धारा में लाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे इनमें से कुछ गुमराह नौजवान पाकिस्तान के चलाए हुए अभियान का हिस्सा न बन पाएं। (लेखक सेवानिवृत्त कर्नल हैं)


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