अमेरिकी प्रांत इलिनॉय की राजधानी शिकागो की संघीय अदालत ने बीते गुरुवार को पाकिस्तान मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा पर फैसला सुनाया। 12 सदस्यों की जूरी ने राणा को भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त लश्करे-तैयबा की मदद करने और डेनमार्क में आतंकी हमले की साजिश रचने का दोषी ठहराया, लेकिन 26/11 से जुड़े सबसे संगीन आरोपों से उसे बरी कर दिया गया। आश्चर्यजनक बात यह है कि अमेरिकी सरकार 26/11 से जुड़े आरोपों में राणा को बरी करने के शिकागो अदालत के फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेगी। अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट की ओर से जारी बयान में अटॉर्नी पेट्रिक जे फिट्जगेराल्ड ने कहा, हमें दुख है कि जूरी ने राणा को दोषी नहीं माना। इसमें शक नहीं कि उस पर लगे तीनों आरोपों में यह सबसे संगीन था। जूरी ने उसे डेनमार्क में आतंकी साजिश और लश्कर की मदद के लिए दोषी माना इससे हम खुश हैं। मुझे लगता है कि 26/11 से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए हम पर्याप्त सबूत नहीं दे पाए। दूसरी ओर भारत सरकार ने इस फैसले पर निराशा जताई है। मीडिया में एक बार फिर अमेरिका के दोहरे मापदंड चर्चा का विषय बने हुए हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया, जो अमेरिकी अदालत ने मुंबई हमले में राणा की संलिप्तता के सबूतों को दरकिनार कर दिया? इस सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है। हां, विकिलीक्स कुछ कर दे तो शायद हकीकत सामने आ जाए, लेकिन इसमें वक्त लग सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि यह रहस्य कभी खुले ही न, लेकिन इस समय अमेरिकी अदालत के फैसले के अलावा कई और सवाल हैं। अगर इन सवालों के जवाब ढूंढ़ें तो हमें जवाब मिल सकता है। तहव्वुर राणा के खिलाफ 16 मई को अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई। उस पर लगे तीन इल्जामों में 26/11 सबसे संगीन था। इस मामले में उसकी संलिप्तता साबित करने के लिए पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली को गवाह बनाया गया। सरकारी वकील ने राणा के ई-मेल और वह वीडियो पेश किया, जिनमें उसने पूछताछ के दौरान संघीय जांच एजेंसी यानी एफबीआइ के अधिकारियों के सामने आइएसआइ की भारत विरोधी गतिविधियों और हेडली के पाक सैन्य अधिकारियों से रिश्तों के बारे में खुलासा किया। इन तीनों साक्ष्यों में राणा का वीडियो और ई-मेल ऐसे सबूत थे, जिन्हें बदला नहीं जा सकता। डर था तो हेडली की गवाही का, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ और उसने लश्कर, आइएसआइ तथा राणा से संबंधित सभी बातें अदालत को बताई। शिकागो की अदालत ने इन तीनों साक्ष्यों को आधार बनाकर राणा को डेनमार्क में आतंकी हमले की साजिश और लश्कर की मदद का दोषी पाया, लेकिन 26/11 में उसे बरी कर दिया। यह हैरान करने वाली बात है कि जिन साक्ष्यों के आधार पर उसे दो आरोपों में दोषी करार दिया गया, उन्हीं सबूतों की रोशनी में जूरी ने मुंबई हमले में उसकी संलिप्तता नहीं मानी। अमेरिका में राणा सबसे संगीन आरोप में बरी हुआ और इधर हिंदुस्तान के मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया। अधिकतर अखबारों ने अमेरिकी अदालत ने राणा को 26/11 में बरी किया शीर्षक से समाचार पहले पेज पर प्रकाशित किया। विपक्षी भाजपा ने आतंकवाद पर अमेरिका के दोहरे मापदंडों के आरोप जड़ दिए। टीवी चैनलों पर बहस के दौरान संप्रग के प्रवक्ताओं ने अमेरिका को कोसा और घर चले गए। वे भूल गए कि देश की संसद पर हमले के मामले में दोषी आतंकी की फाइल कितने समय से हमारे अपने देश में लटकी है। बहरहाल, शिकागो अदालत में जो मामला चला, वह सीधे तौर पर 26/11 से जुड़ा नहीं था। वहां केवल राणा की आतंकी गतिविधियों से जुड़ा मामला था, जिसमें मुंबई्र हमला भी शामिल था, लेकिन ब्रुकलिन कोर्ट में 26/11 ही केंद्र में है। इस हमले में मारे गए जिन छह अमेरिकी नागरिकों की बात की जा रही है, उनके परिजनों ने ब्रुकलिन कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। इस अदालत में आइएसआइ सीधे निशाने पर है और पाकिस्तान ने अपनी खुफिया एजेंसी की छवि बचाने के लिए भारी-भरकम पैसे खर्च कर वकील रखे हैं। दूसरी तरफ हमारी राष्ट्रीय जांच एजेंसी और सरकार दोनों उदासीन बने हुए हैं। ऐसे हालात में भारत सरकार कैसे अमेरिकी अदालत के फैसले पर सवाल उठा सकती है। सरकार की तरह भारतीय मीडिया की भूमिका पर भी सवाल हैं। हमारा मीडिया शिकागो अदालत के फैसले पर बड़ी हैरानी जता रहा है, लेकिन क्या भारत में किसी जांच एजेंसी के पास राणा के खिलाफ सबूत हैं? क्या भारतीय मीडिया ने शिकागो सुनवाई से पहले या इसके दौरान अपने देश की जांच एजेंसियों की उदासीनता को आड़े हाथों लिया। हेडली और राणा तक अमेरिका पहुंचा, क्योंकि उसे अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। 26/11 का दर्द हमने झेला और उसके तार कहां-कहां जुड़े हैं यह हमारी जांच एजेंसियों को पता नहीं। अमेरिकी एजेंसियों ने उस नेटवर्क को जाना, क्योंकि उन्हें अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। इसके अलावा भारतीय मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को सिर्फ राणा पर केंद्रित कर दिया, जबकि हेडली ने अदालत में बताया कि कैसे आइएसआइ ने 26/11 की साजिश रची। किस प्रकार मेजर इकबाल और साजिद मीर से उसकी बात हुई। शिकागो अदालत में हेडली के इन बयानों के जरिए लश्कर और आइएसआइ के रिश्तों को दुनिया ने जाना। अमेरिकी वेबसाइट द डेली बीस्ट और प्रोपब्लिका ने राणा को बरी करने पर सवाल उठाने के साथ ही हेडली के खुलासों को भी प्रमुखता दी। इन वेबसाइटों ने शिकागो कोर्ट में आइएसआइ, पाक सेना और आतंकी नेटवर्क की साठगांठ को केंद्र में रखकर रिपोर्ट प्रकाशित कीं। दूसरी ओर भारत में सिर्फ राणा पर केंद्रित खबरें चल रही हैं। हम भूल रहें हैं कि राणा बहुत छोटा प्यादा है। भारत सरकार, मीडिया और देशवासियों को बड़ी मछलियों पर नजर रखनी होगी। यह संभव है कि शिकागो अदालत के फैसले पर कूटनीतिक रंग चढ़ा हो, लेकिन इसके लिए अमेरिका को दोषी ठहराना गलत है। प्रत्येक राष्ट्र अपने हितों को ध्यान में रखकर नीति निर्धारित करता है। सरकार के नुमाइंदे कहते हैं कि हमारी विदेश नीति ऐसी ही है। क्या वहां मर रहे लोगों की जान हमारी नजर में इतनी सस्ती है। यदि भारत सरकार उन निर्दोष नागरिकों की मौत पर निजी हितों की खातिर चुप्पी साध सकती है तो यह अधिकार अमेरिका को भी है। वह अफगानिस्तान में युद्ध लड़ रहा है। अरबों डॉलर खर्च कर रहा है, ऐसे में उसे पाकिस्तान की जरूरत है। वह अपने हितों को चोट क्यों पहुंचाएगा? आतंकवाद पर जिस दोहरी रवैये की बात भारत में बार-बार हो रही है, उसे लेकर खुद भारत सरकार की नीति क्या है? आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है, भारत सरकार का गृह मंत्रालय तो आंतकियों की सूची भी सही ढंग से तैयार नहीं कर सका। राष्ट्रीय जांच एजेंसी तो राणा के खिलाफ अब जाकर चार्जशीट की बात कर रही है। हम कहते थे कि 26/11 के दोषियों को सजा दिलाने से पहले पाकिस्तान के साथ बात नहीं होगी, लेकिन मनमोहन सिंह ने पाक के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के साथ क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाया। 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को वैश्विक बनाने के लिए अमेरिका ने किस हद तक प्रयास किए, यह सभी जानते हैं। एबटाबाद में लादेन की मौत का उदाहरण सभी के सामने है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अमेरिका ग्लोबल पावर है और भारत विकासशील देश। यह दुख की बात है कि जब कुछ करने की बात आती है तो हम अक्षमता का रोना रोते हैं और चुनावी रैलियों में सरकार के नेता भारत को विश्व का अग्रणी देश बताते हैं। भारत सरकार या तो देश की जनता के समक्ष इस बात का दंभ भरना बंद करे कि हम विश्व के ताकतवर देशों में एक हैं और वाकई ऐसा है तो अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। जिस प्रकार अमेरिका कर रहा है, उसके छह नागरिक मुंबई हमले में मारे गए और उसने आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा को समन जारी कर दिया। दूसरी ओर पाक प्रायोजित आतंकवाद के कारण अब तक हजारों बेकसूर भारतीय नागरिक मारे जा चुके हैं, लेकिन हम कार्रवाई तो दूर ब्रुकलिन कोर्ट की तरह समन भी जारी न कर सके। हो सकता है कि पाशा के नाम अमेरिकी अदालत का समन प्रतीकात्मक है, लेकिन यह अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने नागरिकों की जान की कीमत का आभास कराता है।
Wednesday, June 29, 2011
शिकागो में बेनकाब हुई भारत की शिथिलता
अमेरिकी प्रांत इलिनॉय की राजधानी शिकागो की संघीय अदालत ने बीते गुरुवार को पाकिस्तान मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा पर फैसला सुनाया। 12 सदस्यों की जूरी ने राणा को भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त लश्करे-तैयबा की मदद करने और डेनमार्क में आतंकी हमले की साजिश रचने का दोषी ठहराया, लेकिन 26/11 से जुड़े सबसे संगीन आरोपों से उसे बरी कर दिया गया। आश्चर्यजनक बात यह है कि अमेरिकी सरकार 26/11 से जुड़े आरोपों में राणा को बरी करने के शिकागो अदालत के फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेगी। अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट की ओर से जारी बयान में अटॉर्नी पेट्रिक जे फिट्जगेराल्ड ने कहा, हमें दुख है कि जूरी ने राणा को दोषी नहीं माना। इसमें शक नहीं कि उस पर लगे तीनों आरोपों में यह सबसे संगीन था। जूरी ने उसे डेनमार्क में आतंकी साजिश और लश्कर की मदद के लिए दोषी माना इससे हम खुश हैं। मुझे लगता है कि 26/11 से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए हम पर्याप्त सबूत नहीं दे पाए। दूसरी ओर भारत सरकार ने इस फैसले पर निराशा जताई है। मीडिया में एक बार फिर अमेरिका के दोहरे मापदंड चर्चा का विषय बने हुए हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया, जो अमेरिकी अदालत ने मुंबई हमले में राणा की संलिप्तता के सबूतों को दरकिनार कर दिया? इस सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है। हां, विकिलीक्स कुछ कर दे तो शायद हकीकत सामने आ जाए, लेकिन इसमें वक्त लग सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि यह रहस्य कभी खुले ही न, लेकिन इस समय अमेरिकी अदालत के फैसले के अलावा कई और सवाल हैं। अगर इन सवालों के जवाब ढूंढ़ें तो हमें जवाब मिल सकता है। तहव्वुर राणा के खिलाफ 16 मई को अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई। उस पर लगे तीन इल्जामों में 26/11 सबसे संगीन था। इस मामले में उसकी संलिप्तता साबित करने के लिए पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली को गवाह बनाया गया। सरकारी वकील ने राणा के ई-मेल और वह वीडियो पेश किया, जिनमें उसने पूछताछ के दौरान संघीय जांच एजेंसी यानी एफबीआइ के अधिकारियों के सामने आइएसआइ की भारत विरोधी गतिविधियों और हेडली के पाक सैन्य अधिकारियों से रिश्तों के बारे में खुलासा किया। इन तीनों साक्ष्यों में राणा का वीडियो और ई-मेल ऐसे सबूत थे, जिन्हें बदला नहीं जा सकता। डर था तो हेडली की गवाही का, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ और उसने लश्कर, आइएसआइ तथा राणा से संबंधित सभी बातें अदालत को बताई। शिकागो की अदालत ने इन तीनों साक्ष्यों को आधार बनाकर राणा को डेनमार्क में आतंकी हमले की साजिश और लश्कर की मदद का दोषी पाया, लेकिन 26/11 में उसे बरी कर दिया। यह हैरान करने वाली बात है कि जिन साक्ष्यों के आधार पर उसे दो आरोपों में दोषी करार दिया गया, उन्हीं सबूतों की रोशनी में जूरी ने मुंबई हमले में उसकी संलिप्तता नहीं मानी। अमेरिका में राणा सबसे संगीन आरोप में बरी हुआ और इधर हिंदुस्तान के मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया। अधिकतर अखबारों ने अमेरिकी अदालत ने राणा को 26/11 में बरी किया शीर्षक से समाचार पहले पेज पर प्रकाशित किया। विपक्षी भाजपा ने आतंकवाद पर अमेरिका के दोहरे मापदंडों के आरोप जड़ दिए। टीवी चैनलों पर बहस के दौरान संप्रग के प्रवक्ताओं ने अमेरिका को कोसा और घर चले गए। वे भूल गए कि देश की संसद पर हमले के मामले में दोषी आतंकी की फाइल कितने समय से हमारे अपने देश में लटकी है। बहरहाल, शिकागो अदालत में जो मामला चला, वह सीधे तौर पर 26/11 से जुड़ा नहीं था। वहां केवल राणा की आतंकी गतिविधियों से जुड़ा मामला था, जिसमें मुंबई्र हमला भी शामिल था, लेकिन ब्रुकलिन कोर्ट में 26/11 ही केंद्र में है। इस हमले में मारे गए जिन छह अमेरिकी नागरिकों की बात की जा रही है, उनके परिजनों ने ब्रुकलिन कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। इस अदालत में आइएसआइ सीधे निशाने पर है और पाकिस्तान ने अपनी खुफिया एजेंसी की छवि बचाने के लिए भारी-भरकम पैसे खर्च कर वकील रखे हैं। दूसरी तरफ हमारी राष्ट्रीय जांच एजेंसी और सरकार दोनों उदासीन बने हुए हैं। ऐसे हालात में भारत सरकार कैसे अमेरिकी अदालत के फैसले पर सवाल उठा सकती है। सरकार की तरह भारतीय मीडिया की भूमिका पर भी सवाल हैं। हमारा मीडिया शिकागो अदालत के फैसले पर बड़ी हैरानी जता रहा है, लेकिन क्या भारत में किसी जांच एजेंसी के पास राणा के खिलाफ सबूत हैं? क्या भारतीय मीडिया ने शिकागो सुनवाई से पहले या इसके दौरान अपने देश की जांच एजेंसियों की उदासीनता को आड़े हाथों लिया। हेडली और राणा तक अमेरिका पहुंचा, क्योंकि उसे अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। 26/11 का दर्द हमने झेला और उसके तार कहां-कहां जुड़े हैं यह हमारी जांच एजेंसियों को पता नहीं। अमेरिकी एजेंसियों ने उस नेटवर्क को जाना, क्योंकि उन्हें अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। इसके अलावा भारतीय मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को सिर्फ राणा पर केंद्रित कर दिया, जबकि हेडली ने अदालत में बताया कि कैसे आइएसआइ ने 26/11 की साजिश रची। किस प्रकार मेजर इकबाल और साजिद मीर से उसकी बात हुई। शिकागो अदालत में हेडली के इन बयानों के जरिए लश्कर और आइएसआइ के रिश्तों को दुनिया ने जाना। अमेरिकी वेबसाइट द डेली बीस्ट और प्रोपब्लिका ने राणा को बरी करने पर सवाल उठाने के साथ ही हेडली के खुलासों को भी प्रमुखता दी। इन वेबसाइटों ने शिकागो कोर्ट में आइएसआइ, पाक सेना और आतंकी नेटवर्क की साठगांठ को केंद्र में रखकर रिपोर्ट प्रकाशित कीं। दूसरी ओर भारत में सिर्फ राणा पर केंद्रित खबरें चल रही हैं। हम भूल रहें हैं कि राणा बहुत छोटा प्यादा है। भारत सरकार, मीडिया और देशवासियों को बड़ी मछलियों पर नजर रखनी होगी। यह संभव है कि शिकागो अदालत के फैसले पर कूटनीतिक रंग चढ़ा हो, लेकिन इसके लिए अमेरिका को दोषी ठहराना गलत है। प्रत्येक राष्ट्र अपने हितों को ध्यान में रखकर नीति निर्धारित करता है। सरकार के नुमाइंदे कहते हैं कि हमारी विदेश नीति ऐसी ही है। क्या वहां मर रहे लोगों की जान हमारी नजर में इतनी सस्ती है। यदि भारत सरकार उन निर्दोष नागरिकों की मौत पर निजी हितों की खातिर चुप्पी साध सकती है तो यह अधिकार अमेरिका को भी है। वह अफगानिस्तान में युद्ध लड़ रहा है। अरबों डॉलर खर्च कर रहा है, ऐसे में उसे पाकिस्तान की जरूरत है। वह अपने हितों को चोट क्यों पहुंचाएगा? आतंकवाद पर जिस दोहरी रवैये की बात भारत में बार-बार हो रही है, उसे लेकर खुद भारत सरकार की नीति क्या है? आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है, भारत सरकार का गृह मंत्रालय तो आंतकियों की सूची भी सही ढंग से तैयार नहीं कर सका। राष्ट्रीय जांच एजेंसी तो राणा के खिलाफ अब जाकर चार्जशीट की बात कर रही है। हम कहते थे कि 26/11 के दोषियों को सजा दिलाने से पहले पाकिस्तान के साथ बात नहीं होगी, लेकिन मनमोहन सिंह ने पाक के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के साथ क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाया। 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को वैश्विक बनाने के लिए अमेरिका ने किस हद तक प्रयास किए, यह सभी जानते हैं। एबटाबाद में लादेन की मौत का उदाहरण सभी के सामने है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अमेरिका ग्लोबल पावर है और भारत विकासशील देश। यह दुख की बात है कि जब कुछ करने की बात आती है तो हम अक्षमता का रोना रोते हैं और चुनावी रैलियों में सरकार के नेता भारत को विश्व का अग्रणी देश बताते हैं। भारत सरकार या तो देश की जनता के समक्ष इस बात का दंभ भरना बंद करे कि हम विश्व के ताकतवर देशों में एक हैं और वाकई ऐसा है तो अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। जिस प्रकार अमेरिका कर रहा है, उसके छह नागरिक मुंबई हमले में मारे गए और उसने आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा को समन जारी कर दिया। दूसरी ओर पाक प्रायोजित आतंकवाद के कारण अब तक हजारों बेकसूर भारतीय नागरिक मारे जा चुके हैं, लेकिन हम कार्रवाई तो दूर ब्रुकलिन कोर्ट की तरह समन भी जारी न कर सके। हो सकता है कि पाशा के नाम अमेरिकी अदालत का समन प्रतीकात्मक है, लेकिन यह अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने नागरिकों की जान की कीमत का आभास कराता है।
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