Wednesday, June 29, 2011

हिजबुल प्रमुख सलाहुदीन से सीबीआइ परिचित नहीं


कश्मीर में सक्रिय सबसे बडे़ आतंकी संगठन के प्रमुख सैयद सलाहुदीन का असली नाम, उसके घर का पता और उसकी तस्वीर राज्य पुलिस के रिकार्ड से लेकर लगभग हर मीडिया घराने व सुरक्षा एजेंसियों के पास है। नहीं है तो सिर्फ सीबीआइ के पास। सीबीआइ की वेबसाइट पर रेड नोटिस कार्नर नोटिस वर्ग में जहां भारत के मोस्ट वांटेड आतंकियों और अपराधियों के नाम शामिल हैं, वहां जिस तरह से सलाहुदीन का जिक्र है, उससे तो यही साबित होता है। सूची में सलाहुदीन का नाम मोहम्मद यूसुफ शाह के रूप में दर्ज है, जिसके खिलाफ इंटरपोल ने 1998 में रेड कार्नर नोटिस जारी किया था। इंटरपोल के लिए जारी रेड नोटिस कार्नर सूची में सलाहुदीन का सिर्फ नाम शामिल है। न उसका फोटो है और न जन्म तिथि, जन्म स्थान और न ही उम्र का कोई जिक्र है। उसके बालों का रंग, उसके परिवार के बारे में जानकारी भी उसके नाम के आगे से नदारद है। सीबीआइ ने सलाहुदीन के नाम के आगे स्वीकार किया है कि उसे इस आतंकी के नाम, कद-काठी, उम्र इत्यादि का कोई पता नहीं है। अलबत्ता, सीबीआइ ने यह जरूर कहा है कि यह व्यक्ति भारतीय नागरिक है और हिंदी, उर्दू व अंग्रेजी भाषा बोल लेता है। यहां यह बताना भी असंगत नहीं होगा कि सलाहुदीन जिसका असली नाम मोहम्मद यूसुफ डार उर्फ यूसुफ शाह है, सोईबुग-बडगाम का रहने वाला है। उसने 1987 में राज्य विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था। कश्मीर ही नहीं देश के कई राष्ट्रीय समाचारपत्रों में और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी अक्सर उसके समाचार, वीडियो फुटेज और तस्वीरें आती रहती हैं। राज्य पुलिस से लेकर गुप्तचर ब्यूरो और रॉ जैसी संस्थाओं के पास भी इस व्यक्ति के बारे में पूरी जानकारी है। गत वर्ष सलाहदुीन के बीबी-बच्चों को पासपोर्ट भी जारी किया गया था। राज्य पुलिस के एक अधिकारी ने अपना नाम न छापे जाने की शर्त पर कहा कि सीबीआइ के पास अगर जानकारी नहीं थी तो वह कम से कम हमें सूचित करती। ऐसा नहीं करना था तो वह इंटरनेट के किसी सर्चइंजन का भी सहारा ले सकती थी। उसके पास मोहम्मद यूसुफ डार उर्फ सलाहुदीन की पूरी जानकारी आ जाती और यह छीछलेदार नहीं होती। सैयद सलाहुदीन पाकिस्तानी आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन का प्रमुख है।


आतंकियों की समर्थक बन चुकी है आइएसआइ


अमेरिका में आगामी चुनाव में राष्ट्रपति पद के दावेदार रिपब्लिकन नेता ने अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मारने में अमेरिका खुफिया एजेंसी सीआइए को सूचना मुहैया कराने पांच मुखिबरों की पाकिस्तान में गिरफ्तारी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रतिद्वंद्वी नेवट जिंगरिच ने दावा किया है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ का एक बड़ा हिस्सा आतंकी संगठन तालिबान और अलकायदा का समर्थक बन चुका है। नेवट ने फॉक्स न्यूज चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा, ऐसी परिस्थितियों के बाद तो पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की पूरी नीति में बदलाव की जरूरत है। वह 2012 के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति बराक ओबामा को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें पाकिस्तान में अपनी प्रत्येक रणनीति की पुन: समीक्षा करनी चाहिए। खासकर खुफिया आदान-प्रदान को लेकर। 9/11 हमलों के बाद से हम पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने के लिए 20 अरब डॉलर (करीब 897 अरब रुपये) की मदद कर चुके हैं। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि पाकिस्तानी प्रतिष्ठानों का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका विरोधी है। उन्होंने कहा, हमें इस बात पर क्रोधित होना चाहिए कि पाकिस्तानी अधिकारी ओसामा की रक्षा कर रहे थे। अब जब पाकिस्तान उन लोगों को सजा दे रहा है जो अमेरिका की सहायता कर रहे हैं, मुझे लगता है कि हमें अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।

अब अयमान अल जवाहिरी बना अलकायदा का सरगना


ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के करीब डेढ़ महीने बाद अयमान अल जवाहिरी को अलकायदा का मुखिया नियुक्त किया गया है। अलकायदा ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक बयान में यह जानकारी दी है। आतंकी संगठन के मुखिया के दावेदारों में जवाहिरी के अलावा कुछ और भी दावेदार शामिल थे, लेकिन मिस्र में फार्मोकोलॉजी के प्रोफेसर के बेटे और ओसामा का दाहिना हाथ माने जाने वाले जवाहिरी को उसकी आतंक की विरासत संभालने का जिम्मा मिला। इससे पहले खबर आई थी कि सैफ अल अब्देल को अलकायदा की कमान सौंपी गई है। अलकायदा के संस्थापक सदस्यों में एक 59 वर्षीय जवाहिरी ने इस संगठन में दूसरे नंबर के नेता के रूप में दो दशक तक अहम भूमिका निभाई। काइरो के पॉश इलाके मादी उपनगर में पला बढ़ा जवाहिरी शुरू से ही पश्चिमी देशों के खिलाफ था। इस्लामी वेबसाइट अंसार अल मुजाहिदीन के मुताबिक, अलकायदा ने एलान किया है कि जवाहिरी ने संगठन के अमीर (प्रमुख) की जिम्मेदारी संभाल ली है। माना जा रहा है कि वह पाकिस्तान अफगानिस्तान सीमावर्ती क्षेत्र से अलकायदा का अभियान चलाएगा। जवाहिरी 9/11 हमले से पहले ही अमेरिका में वांछित है। उसे 1998 में तंजानिया और केन्या में अमेरिकी दूतावासों पर हमले के मामले में 1999 में दोषी ठहराया गया था। अमेरिका ने उस पर 2.5 करोड़ डॉलर (करीब 113 करोड़ रुपये) का इनाम घोषित कर रखा है। जवाहिरी के अलकायदा प्रमुख बनने से अमेरिका की मुश्किल और भी बढ़ सकती है। आठ जून को अपने जारी वीडियो में कहा था कि ओसामा मरने के बाद भी अमेरिका को डराता रहेगा। उसने पश्चिमी देशों पर हमला जारी रखने की बात भी कही थी। ओसामा के मारे जाने के जवाहिरी के अलावा हुजी (हरकत उल जिहाद अल-इस्लाम) प्रमुख इलियास कश्मीरी का भी दावेदारों में शामिल था। कश्मीरी को जवाहिरी से प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन उसके मारे जाने की खबरों के बाद जवाहिरी संगठन के लिए एकमात्र विकल्प रह गया था। जवाहिरी ने लादेन की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि जब वह जिंदा थे तब उन्होंने अमेरिका को आतंकित कर दिया और अब मौत के बाद भी अमेरिका के लिए वह खौफ बने हुए हैं। बयान में अलकायदा की नीति में किसी भी प्रकार से बदलाव से इंकार किया गया है.

पाक की बदनीयता की बानगियां


जब पूरी दुनिया विकास की क्रांति लाते हुए अपने देश के संसाधनों को बढ़ा रही थी, तब हमारा पड़ोसी देश आतंकवाद की फसल अपने देश में बो रहा था। पूरी दुनिया के देशों ने 70 के दशक से शुरू करके 90 के दशक के आखिर तक अपनी विकास दर को खूब बढ़ाया, लेकिन पाकिस्तान की विकास दर उस समय भी 2-3 प्रतिशत के बीच ही रही। क्या कोई सोच सकता है कि इस समय यानी 2011 में पाकिस्तान की विकास दर 2.7 प्रतिशत है और मुद्रा स्फीति की दर 14.7 प्रतिशत। इस प्रकार के हालात की जड़ में जाएं तो पता लगेगा कि इस सबके पीछे पाकिस्तान के शासकों की भारत के प्रति नफरत व द्वेष की भावना भी काफी हद तक जिम्मेदार है। इस समय पाकिस्तान में 11 घरेलू आतंकवादी संगठन हैं। इनमें हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत उल अंसार, लश्करे-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद। जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट फ्रंट आदि प्रमुख हैं। इन आतंकी संगठनों में कुछ का मुख्य केंद्र कश्मीर है और कुछ का अफगानिस्तान। इन आतंकी संगठनों के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई में न चाहते हुए भी पाकिस्तान को सहयोग देना पड़ रहा है इसीलिए ये आतंकवादी संगठन अब पाकिस्तान के ही खिलाफ हो गए हैं। नतीजतन हर दूसरे दिन पाकिस्तान में बम धमाके हो रहे हैं। इस तरह आतंकी गतिविधियों में अब तक पाकिस्तान में 30 हजार से ज्यादा नागरिक मारे जा चुके हैं। पिछले महीने जब अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को ढेर कर दिया तो आतंकी संगठनों को और भरोसा हो गया कि पाकिस्तानी सेना अमेरिका को पूरा सहयोग दे रही है। आए दिन ड्रोन हमले व एरियल बमबारी सीमावर्ती प्रांतों में आतंकवादियों को भारी क्षति पहुंचा रही है। 2007-08 में पाकिस्तानी आर्मी का स्वात घाटी में चलाया अभियान ये आतंकी संगठन भूले नहीं हैं। पाकिस्तान अपनी आर्थिक तंगी के कारण अमेरिका का साथ देने के लिए मजबूर है। पाकिस्तान में बाहर से निवेश आना बिल्कुल बंद है। अब वहां का सारा बाहरी खर्चा अमेरिका और अरब देशों की मदद पर चल रहा है। पाकिस्तान का एक उदारवादी धड़ा इन आतंकवादियों से मुक्ति चाहता है तथा इनके खात्मे के लिए पाकिस्तानी पार्लियामेंट ने वर्ष 2008 में एक प्रस्ताव पास किया था, लेकिन सरकार की स्थिति काफी कमजोर होने के कारण यह प्रस्ताव वहां लागू नहीं हो पाया। अब दोबारा पार्लियामेंट ने प्रस्ताव पास किया है कि सरकार को अमेरिका और इन संगठनों से बातचीत शुरू करनी चाहिए, जिससे इनकी गतिविधियों को रोका जा सके। लेकिन लादेन की मौत के बाद इस प्रस्ताव की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। जहां तक भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैये का सवाल है तो पाक सेना ने मानो कसम खा रखी है कि जब तक वह भारत से 1971 की हार का बदला नहीं लेगी, तब तक चैन से नहीं बैठेगी। वह हर हाल में कश्मीर को भारत से अलग करना चाहती है। इसके लिए आइएसआइ कभी हेडली की मदद लेती है तो कभी तहव्वुर राणा को भारत विरोधी अभियान में शामिल करती है। पाकिस्तान अफगान सीमा पर सक्रिय आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई में अमेरिका की मदद कर सकता है, लेकिन भारत के खिलाफ काम करने वाले आतंकियों पर वह कभी लगाम नहीं कसेगा। यह भारत सरकार हर हालत में समझ ले कि भारत में हर आतंकवादी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ द्वारा समर्थित और भेजा हुआ है। मुंबई हमले के बाद से ही साफ था कि इसमें कहीं न कहीं पाकिस्तान की सेना का भी हाथ है। अन्यथा, एक ग्रुप इतनी दूर से दूसरे देश में किसी आतंकवादी घटना को कैसे अंजाम दे सकता है। हमें यहां यह भी समझना होगा आतंक के खिलाफ भारत भारत की मुहिम में अमेरिका से कोई सहयोग नहीं मिल सकता। अमेरिका एक मौका परस्त देश है। वह किसी भी सूरत में अपने हित के आगे कभी भी पाकिस्तान पर इसके लिए दबाब नहीं बनाएगा। हां, जब भी भारत पाकिस्तान से बातचीत बंद करेगा या कड़ा रुख अपनाएगा तो अमेरिका भारत पर दबाब डालकर उससे बातचीत चालू करवाएगा ताकि दुनिया अमेरिका की दबंगई की दाद देती रहे। इसलिए मौजूदा हालात में हमें अपने देश की सैन्य तैयारियों को हमेशा चुस्त दुरुस्त रखना चाहिए। भारत में सांप्रदायिक सौहा‌र्द्र तथा अपने अल्पसंख्यक वर्ग को मुख्य धारा में लाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे इनमें से कुछ गुमराह नौजवान पाकिस्तान के चलाए हुए अभियान का हिस्सा न बन पाएं। (लेखक सेवानिवृत्त कर्नल हैं)


शिकागो में बेनकाब हुई भारत की शिथिलता


अमेरिकी प्रांत इलिनॉय की राजधानी शिकागो की संघीय अदालत ने बीते गुरुवार को पाकिस्तान मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा पर फैसला सुनाया। 12 सदस्यों की जूरी ने राणा को भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त लश्करे-तैयबा की मदद करने और डेनमार्क में आतंकी हमले की साजिश रचने का दोषी ठहराया, लेकिन 26/11 से जुड़े सबसे संगीन आरोपों से उसे बरी कर दिया गया। आश्चर्यजनक बात यह है कि अमेरिकी सरकार 26/11 से जुड़े आरोपों में राणा को बरी करने के शिकागो अदालत के फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेगी। अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट की ओर से जारी बयान में अटॉर्नी पेट्रिक जे फिट्जगेराल्ड ने कहा, हमें दुख है कि जूरी ने राणा को दोषी नहीं माना। इसमें शक नहीं कि उस पर लगे तीनों आरोपों में यह सबसे संगीन था। जूरी ने उसे डेनमार्क में आतंकी साजिश और लश्कर की मदद के लिए दोषी माना इससे हम खुश हैं। मुझे लगता है कि 26/11 से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए हम पर्याप्त सबूत नहीं दे पाए। दूसरी ओर भारत सरकार ने इस फैसले पर निराशा जताई है। मीडिया में एक बार फिर अमेरिका के दोहरे मापदंड चर्चा का विषय बने हुए हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया, जो अमेरिकी अदालत ने मुंबई हमले में राणा की संलिप्तता के सबूतों को दरकिनार कर दिया? इस सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है। हां, विकिलीक्स कुछ कर दे तो शायद हकीकत सामने आ जाए, लेकिन इसमें वक्त लग सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि यह रहस्य कभी खुले ही न, लेकिन इस समय अमेरिकी अदालत के फैसले के अलावा कई और सवाल हैं। अगर इन सवालों के जवाब ढूंढ़ें तो हमें जवाब मिल सकता है। तहव्वुर राणा के खिलाफ 16 मई को अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई। उस पर लगे तीन इल्जामों में 26/11 सबसे संगीन था। इस मामले में उसकी संलिप्तता साबित करने के लिए पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली को गवाह बनाया गया। सरकारी वकील ने राणा के ई-मेल और वह वीडियो पेश किया, जिनमें उसने पूछताछ के दौरान संघीय जांच एजेंसी यानी एफबीआइ के अधिकारियों के सामने आइएसआइ की भारत विरोधी गतिविधियों और हेडली के पाक सैन्य अधिकारियों से रिश्तों के बारे में खुलासा किया। इन तीनों साक्ष्यों में राणा का वीडियो और ई-मेल ऐसे सबूत थे, जिन्हें बदला नहीं जा सकता। डर था तो हेडली की गवाही का, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ और उसने लश्कर, आइएसआइ तथा राणा से संबंधित सभी बातें अदालत को बताई। शिकागो की अदालत ने इन तीनों साक्ष्यों को आधार बनाकर राणा को डेनमार्क में आतंकी हमले की साजिश और लश्कर की मदद का दोषी पाया, लेकिन 26/11 में उसे बरी कर दिया। यह हैरान करने वाली बात है कि जिन साक्ष्यों के आधार पर उसे दो आरोपों में दोषी करार दिया गया, उन्हीं सबूतों की रोशनी में जूरी ने मुंबई हमले में उसकी संलिप्तता नहीं मानी। अमेरिका में राणा सबसे संगीन आरोप में बरी हुआ और इधर हिंदुस्तान के मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया। अधिकतर अखबारों ने अमेरिकी अदालत ने राणा को 26/11 में बरी किया शीर्षक से समाचार पहले पेज पर प्रकाशित किया। विपक्षी भाजपा ने आतंकवाद पर अमेरिका के दोहरे मापदंडों के आरोप जड़ दिए। टीवी चैनलों पर बहस के दौरान संप्रग के प्रवक्ताओं ने अमेरिका को कोसा और घर चले गए। वे भूल गए कि देश की संसद पर हमले के मामले में दोषी आतंकी की फाइल कितने समय से हमारे अपने देश में लटकी है। बहरहाल, शिकागो अदालत में जो मामला चला, वह सीधे तौर पर 26/11 से जुड़ा नहीं था। वहां केवल राणा की आतंकी गतिविधियों से जुड़ा मामला था, जिसमें मुंबई्र हमला भी शामिल था, लेकिन ब्रुकलिन कोर्ट में 26/11 ही केंद्र में है। इस हमले में मारे गए जिन छह अमेरिकी नागरिकों की बात की जा रही है, उनके परिजनों ने ब्रुकलिन कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। इस अदालत में आइएसआइ सीधे निशाने पर है और पाकिस्तान ने अपनी खुफिया एजेंसी की छवि बचाने के लिए भारी-भरकम पैसे खर्च कर वकील रखे हैं। दूसरी तरफ हमारी राष्ट्रीय जांच एजेंसी और सरकार दोनों उदासीन बने हुए हैं। ऐसे हालात में भारत सरकार कैसे अमेरिकी अदालत के फैसले पर सवाल उठा सकती है। सरकार की तरह भारतीय मीडिया की भूमिका पर भी सवाल हैं। हमारा मीडिया शिकागो अदालत के फैसले पर बड़ी हैरानी जता रहा है, लेकिन क्या भारत में किसी जांच एजेंसी के पास राणा के खिलाफ सबूत हैं? क्या भारतीय मीडिया ने शिकागो सुनवाई से पहले या इसके दौरान अपने देश की जांच एजेंसियों की उदासीनता को आड़े हाथों लिया। हेडली और राणा तक अमेरिका पहुंचा, क्योंकि उसे अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। 26/11 का दर्द हमने झेला और उसके तार कहां-कहां जुड़े हैं यह हमारी जांच एजेंसियों को पता नहीं। अमेरिकी एजेंसियों ने उस नेटवर्क को जाना, क्योंकि उन्हें अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। इसके अलावा भारतीय मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को सिर्फ राणा पर केंद्रित कर दिया, जबकि हेडली ने अदालत में बताया कि कैसे आइएसआइ ने 26/11 की साजिश रची। किस प्रकार मेजर इकबाल और साजिद मीर से उसकी बात हुई। शिकागो अदालत में हेडली के इन बयानों के जरिए लश्कर और आइएसआइ के रिश्तों को दुनिया ने जाना। अमेरिकी वेबसाइट द डेली बीस्ट और प्रोपब्लिका ने राणा को बरी करने पर सवाल उठाने के साथ ही हेडली के खुलासों को भी प्रमुखता दी। इन वेबसाइटों ने शिकागो कोर्ट में आइएसआइ, पाक सेना और आतंकी नेटवर्क की साठगांठ को केंद्र में रखकर रिपोर्ट प्रकाशित कीं। दूसरी ओर भारत में सिर्फ राणा पर केंद्रित खबरें चल रही हैं। हम भूल रहें हैं कि राणा बहुत छोटा प्यादा है। भारत सरकार, मीडिया और देशवासियों को बड़ी मछलियों पर नजर रखनी होगी। यह संभव है कि शिकागो अदालत के फैसले पर कूटनीतिक रंग चढ़ा हो, लेकिन इसके लिए अमेरिका को दोषी ठहराना गलत है। प्रत्येक राष्ट्र अपने हितों को ध्यान में रखकर नीति निर्धारित करता है। सरकार के नुमाइंदे कहते हैं कि हमारी विदेश नीति ऐसी ही है। क्या वहां मर रहे लोगों की जान हमारी नजर में इतनी सस्ती है। यदि भारत सरकार उन निर्दोष नागरिकों की मौत पर निजी हितों की खातिर चुप्पी साध सकती है तो यह अधिकार अमेरिका को भी है। वह अफगानिस्तान में युद्ध लड़ रहा है। अरबों डॉलर खर्च कर रहा है, ऐसे में उसे पाकिस्तान की जरूरत है। वह अपने हितों को चोट क्यों पहुंचाएगा? आतंकवाद पर जिस दोहरी रवैये की बात भारत में बार-बार हो रही है, उसे लेकर खुद भारत सरकार की नीति क्या है? आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है, भारत सरकार का गृह मंत्रालय तो आंतकियों की सूची भी सही ढंग से तैयार नहीं कर सका। राष्ट्रीय जांच एजेंसी तो राणा के खिलाफ अब जाकर चार्जशीट की बात कर रही है। हम कहते थे कि 26/11 के दोषियों को सजा दिलाने से पहले पाकिस्तान के साथ बात नहीं होगी, लेकिन मनमोहन सिंह ने पाक के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के साथ क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाया। 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को वैश्विक बनाने के लिए अमेरिका ने किस हद तक प्रयास किए, यह सभी जानते हैं। एबटाबाद में लादेन की मौत का उदाहरण सभी के सामने है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अमेरिका ग्लोबल पावर है और भारत विकासशील देश। यह दुख की बात है कि जब कुछ करने की बात आती है तो हम अक्षमता का रोना रोते हैं और चुनावी रैलियों में सरकार के नेता भारत को विश्व का अग्रणी देश बताते हैं। भारत सरकार या तो देश की जनता के समक्ष इस बात का दंभ भरना बंद करे कि हम विश्व के ताकतवर देशों में एक हैं और वाकई ऐसा है तो अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। जिस प्रकार अमेरिका कर रहा है, उसके छह नागरिक मुंबई हमले में मारे गए और उसने आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा को समन जारी कर दिया। दूसरी ओर पाक प्रायोजित आतंकवाद के कारण अब तक हजारों बेकसूर भारतीय नागरिक मारे जा चुके हैं, लेकिन हम कार्रवाई तो दूर ब्रुकलिन कोर्ट की तरह समन भी जारी न कर सके। हो सकता है कि पाशा के नाम अमेरिकी अदालत का समन प्रतीकात्मक है, लेकिन यह अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने नागरिकों की जान की कीमत का आभास कराता है।


पाकिस्तान की अमेरिकन मार्केट से हथियार खरीदता है तालिबान


अगर आप सोचते हैं कि पाकिस्तान में अत्याधुनिक बंदूक, ग्रेनेड और नाइट विजन गॉगल जैसे सैन्य साजो सामान पाना मुश्किल है, तो आप गलत हैं। उत्तर-पश्रि्वम में पेशावर शहर के अमेरिकन मार्केट नाम के बाजार में कंप्यूटर, लैपटॉप जैसे उपकरणों की आड़ में धड़ल्ले से हथियार बिकते हैं। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून अखबार ने अमेरिकन मार्केट के एक लैपटॉप विक्रेता के हवाले से लिखा है कि यहां पर अधिकांश हथियार आतंकी संगठन तालिबान द्वारा खरीदे जाते हैं। यद्यपि कुछ लोग अपने लिए भी यहां से हथियार खरीदते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा हथियार यहां से आतंकी संगठनों को ही जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस बाजार का नाम अमेरिकन मार्केट इसलिए है क्योंकि यहां पर चोरी का अमेरिकी माल मिलता है। अमेरिका यह सामान पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान में नाटो सेनाओं के लिए भेजता है। लोग इन्हें रास्ते में ही चोरी करके बाजार में बेच देते हैं। इस बाजार में स्कैनर से लेकर लैपटॉप तक सभी अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मिलते हैं, लेकिन यहां अधिक संख्या हथियारों की होती है। लैपटॉप विक्रेता ने बताया कि अमेरिकन मार्केट पाकिस्तान में इस तरह का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। इस प्रकार के बाजार बारा, जमरूद और दारा आदम खेल में भी हैं। दारा आदम खेल में एक सैन्य ठिकाना भी है। अखबार की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तालिबान को रूस से भी तस्करी के जरिए हथियारों की आपूर्ति होती है। एक विशेषज्ञ ने दावा किया है कि एक समय में श्रीलंका का विद्रोही संगठन लिट्टे भी पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराता था। अखबार में यह भी कहा गया है कि अमेरिका मानता है कि तालिबान को ईरान से भी हथियार मिलते हैं। आतंकियों के ठिकाने में एक बार मारे गए छापे में भी ईरान निर्मित एके-47 राइफल मिली थी। यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि ईरान से यह राइफल तस्करी के जरिए आई थी या ईरान सरकार ने तालिबान को स्वयं दी थी। तालिबान के वीडियो में आतंकियों के पास कई बार चीन के भी हथियार दिखाई दिए हैं। लैपटॉप विक्रेता का कहना है कि अमेरिका अफगानिस्तान के नागरिकों को तालिबान से लड़ने के लिए हथियार देता है। मगर वे इसे पाकिस्तान के लोगों को बेच देते हैं और ये लोग इन्हें अमेरिकन मार्केट जैसे बाजारों में उतार देते हैं.

भारत के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की भर्ती करना चाहती थी आइएसआइ


मंुबई हमलों के साजिशकर्ताओं में शामिल पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी ने कहा है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ भारत के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की भर्ती करना चाहती थी। ताकि वह भारतीय सेना के खुफिया तंत्र को जान सके और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इनका इस्तेमाल कर सके। पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी हेडली ने यह बात शिकागो की अदालत में चली 26/11 के अन्य आरोपी कनाडाई मूल के अमेरिकी नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा की सुनवाई में कही थीं। हेडली ने अपने बचपन के दोस्त राणा के खिलाफ गवाही दी थी। उसने बताया था कि 26/11 से करीब 6 महीने पहले आइएसआइ में उसके आका मेजर इकबाल ने उसे मुंबई के अखबारों में विज्ञापन देने को कहा था। उसने कहा था कि कनाडा की रोजगार एजेंसी के हवाले से विज्ञापन दो कि कनाडा में काम करने के इच्छुक लोगों की जरूरत है। वह चाहता था कि भारत के सुरक्षा बलों और सेना से जुड़े रहे लोग इस विज्ञापन के जरिए आतंकी नेटवर्क से जुड़ जाएं। इकबाल ने उसे विज्ञापन छपवाने के लिए 25 हजार रुपये भी दिए थे। इससे पहले भी इकबाल ने हेडली से कहा था कि वह मुंबई में राणा को आव्रजन व्यवसाय शुरू करने में मदद करे। इस व्यवसाय की आड़ में ही हेडली और राणा भारत आने-जाने के अलावा मंुबई के ठिकानों की रेकी करते थे। इकबाल के आदेश पर जुलाई, 2008 में हेडली मुंबई लौटा और उसने आव्रजन सेवा से जुड़े अपने दफ्तर को बंद करने की तैयारी शुरू कर दी। इसी दौरान उसने मुंबई के प्रमुख जगहों की आखिरी बार टोह ली, जिसके आधार पर मेजर इकबाल ने हमले की योजना को अंजाम देने का फैसला किया। निशाने पर नहीं था ओबरॉय, हेडली ने अपनी मर्जी से बना लिया वीडियो करीब ढाई साल पहले आतंकवादियों ने मुंबई हमले के दौरान ओबरॉय होटल में भीषण रक्तपात मचाया था, लेकिन आइएसआइ से जुड़े साजिशकर्ताओ ने पहले अपने निशाने में इस आलीशान होटल को नहीं रखा था। दरअसल एक फिल्म देखने पहुंचे आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने समय बिताने के लिए अपनी मर्जी से इस होटल का वीडियो बना लिया था। पिछले दिनों तहव्वुर हुसैन राणा के खिलाफ मुकदमें में बतौर गवाह हेडली ने यह खुलासा किया था। हेडली ने अदालत को बताया कि आइएसआइ के मेजर इकबाल ने मुझे मुंबई के चाबाद हाउस का वीडियो बनाने का आदेश दिया था। चाबाद हाउस का वीडियो बनाने के बाद मैं फिल्म देखने गया, लेकिन फिल्म शुरू होने में एक घंटे का वक्त था। ऐसे में मैंने ओबरॉय होटल का भी वीडियो बना दिया.

Tuesday, June 28, 2011

पाकिस्तान पाल रह है आतंकी- पाक मीडिया


पाकिस्तानी मीडिया ने आतंकवाद के मसले पर सरकार को आड़े हाथों लिया है। स्थानीय समाचार पत्र द डेली टाइम्स ने संपादकीय में सोमवार को लिखा कि अन्य देशों में जिहाद का निर्यात करना पाकिस्तान को महंगा पड़ रहा है। खासकर दक्षिण एशिया में। इसी का नतीजा है कि आज पाकिस्तान खुद आंतरिक युद्ध का दंश झेल रहा है। अखबार ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके देश में जितने भी आतंकी संगठन सक्रिय हैं उनको सरकार ही पालपोस रही है। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया है कि कुछ आतंकी संगठनों को सेना का भी समर्थन प्राप्त है। लेख में सरकार से उसका दोहरा रवैया छोड़ने की अपील की गई है। पाकिस्तान में आतंकवाद के चलते पिछले कुछ वर्षो में 35 हजार लोगों की जानें जा चुकी हैं। संपादकीय के मुताबिक अगर अब भी सरकारी सुरक्षा संस्थाओं की नींद नहीं खुली तो फिर पाकिस्तान को कोई नहीं बचा सकता। पिछले शनिवार को डेरा इस्माइल खान में एक पुलिस स्टेशन पर दो तालिबान आतंकियों द्वारा किए गए हमले में 12 पुलिसकर्मी मारे गए थे। हमलावरों में एक महिला भी शामिल थी। अखबार ने लिखा है कि तालिबान के लिए यह कोई नई बात नहीं है। चिंता की बात सुरक्षाबलों पर बढ़ते हमले हैं। पिछले महीने कराची में नौसैन्य ठिकाने पर हुए हमले से एक बात तो साफ हो गई है कि मुट्ठी भर आतंकी सैन्य अड्डों तक को दहलाने का दम रखते हैं। संपादकीय में जोर देकर कहा गया है कि लगातार हो रहे हमलों के बावजूद सरकार की ओर से आतंकवाद को खत्म करने के कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।

Wednesday, June 15, 2011

मुल्ला उमर के संपर्क में अमेरिका


तालिबान सरगना मुल्ला उमर जिंदा है। अमेरिका ने अफगानिस्तान में जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए उससे वार्ता के लिए संपर्क साधा है। यह दावा मीडिया रिपोर्टो में किया गया है। गत मई में उत्तर वजीरिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमले में उमर के मारे जाने की खबर आई थी। हालांकि अमेरिका और पाकिस्तान ने उसकी मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून अखबार ने सूत्रों के हवाले से कहा कि पूर्व अफगान तालिबान प्रवक्ता अब्दुल हकीक उर्फ मुहम्मद हनीफ ने उमर के साथ वार्ता कराने में अमेरिका की मदद की। पाकिस्तान में 2005 में मुख्य प्रवक्ता अब्दुल लतीफ हकीमी के गिरफ्तार किए जाने के बाद हकीक तालिबान के चर्चित प्रवक्ताओं में से था। अमेरिका और अफगान सुरक्षाबलों ने हकीक को जून 2007 में अफगानिस्तान में गिरफ्तार किया था। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने अब तक तालिबान के साथ बातचीत के बारे में कई दावे किए थे, लेकिन इस संबंध में पाकिस्तान और अफगानिस्तान को कभी विश्वास में नहीं लिया। अमेरिका ने कथित तौर पर पेशकश की थी कि दक्षिण अफगानिस्तान का नियंत्रण तालिबान को दिया जाए जबकि उत्तर क्षेत्र अमेरिकी प्रभाव वाली अन्य राजनीतिक ताकतों के लिए छोड़ दे, लेकिन तालिबान ने इसे खारिज कर दिया। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के पूर्व प्रमुख हामिद गुल का कहना है कि तालिबान के लिए ऐसी पेशकश स्वीकार करना संभव नहीं है, क्योंकि इससे अफगानिस्तान विभाजन की ओर बढ़ सकता है।


भारत में आइएसआइ के 262 एजेंट सक्रिय


आतंकी खतरों से दो-चार करते आ रहे भारत में इस समय पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के 262 से ज्यादा एजेंट सक्रिय हैं। सहारनपुर में शाहिदा बेगम, उम्र 32 साल, रंग गोरा, कद पांच फुट चार इंच। दिल्ली के सीलमपुर में मुनव्वर हुसैन, रंग सांवला, कद पांच फुट दो इंच, कारोबार ठेकेदारी। अलीगढ़ में सलीम अख्तर, कद पांच फुट एक इंच, रंग गोरा, काम बिजनेस। मेरठ में सलीमा बेगम, कद पांच फुट, रंग गोरा। मुरादाबाद में इजमाम हुसैन, कद पांच फुट तीन इंच, रंग गोरा। खारी बावली, दिल्ली में अब्दुल रज्जाक , कद पांच फुट एक इंच, चाय की दुकान। ये वो लोग हैं, जिनके नाम कस्टम विभाग की 262 सक्रिय आइएसआइ एजेंट्स की सूची में शामिल हैं। इस सूची को केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास भेजा गया है। सीमा शुल्क विभाग (कस्टम) की नई सूची में महिलाओं की गिनती डेढ़ सौ के ऊपर है। अधिकांश महिलाएं ग्रेजुएट हैं। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं। दिल्ली व अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर चुकी कई युवतियां आइएसआइ के लिए काम कर रही हैं। कस्टम विभाग की मानें तो ये लोग समझौता एक्सप्रेस से पाकिस्तान जाकर वहां पर भारत विरोधी आइएसआइ के सेमिनार में हिस्सा लेते हैं। भारत में रहकर ये लोग देश विरोधी ताकतों के लिए काम करते हैं। पाकिस्तान स्थित अपने आका के लिए ये ई-मेल के जरिए कूट भाषा में संदेश भेजते हैं। भारत में रहने वाले 262 के करीब आइएसआइ एजेंट की गिरफ्तारी के लिए गृह मंत्रालय को लिस्ट भेजी गई है। भारत में रहने वाले आइएसआइ के ये एजेंट भारत के खिलाफ रची जाने वाली साजिश में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। खास बात यह है कि ये लोग छद्म भेष में रहते हैं। कई पासपोर्ट रखने वाले इन लोगों के कई नाम हैं, जिसके चलते इनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाती।


दबाव बढ़ाने का सही समय


लेखक तहव्वुर हुसैन राणा के संदर्भ में शिकागो की अदालत के फैसले के बाद भारत के समक्ष मौजूद विकल्पों की चर्चा कर रहे हैं...
मुंबई आतंकी हमले में लिप्त होने के आरोप से तहव्वुर हुसैन राणा को बरी कर दिए जाने के शिकागो कोर्ट के निर्णय पर भारत उचित ही निराश है। फिर भी भारत के लिए सही यह होगा कि वह पाकिस्तान और अमेरिका पर इसके लिए दबाव बढ़ा दे कि 26/11 के नरसंहार की साजिश रचने वालों को दोहरी तेजी से कानून के घेरे में लाया जाए और इससे भी अधिक पाकिस्तान इस आतंकी हमले को दोहराने का दुस्साहस न कर सके। शिकागो की अदालत ने राणा के खिलाफ दो महत्वपूर्ण आरोपों को खारिज कर दिया है, जिनके संदर्भ में अभियोजकों ने पर्याप्त सबूत भी पेश किए थे। इन सबूतों से पता चलता है कि राणा ने मुंबई हमले की साजिश रचने के लिए डेविड हेडली को किस हद तक समर्थन दिया। पहला यह कि राणा ने हेडली की भारत यात्रा के लिए एयर टिकट खरीदे और दूसरे, राणा ने भारत और डेनमार्क की यात्रा के लिए आव्रजन अधिकारियों के समक्ष हेडली को अपने कर्मचारी के रूप में प्रस्तुत होने की छूट दी। यह विचित्र है कि ज्यूरी ने इन दो बिंदुओं की पूरी तरह अनदेखी कर दी। इससे भी अधिक विचित्र यह है कि जजों ने राणा को डेनमार्क में आतंकी हमला करने की साजिश रचने के लिए लश्करे तैयबा की मदद करने का दोषी पाया। इससे पता चलता है कि जज पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर के जिहादी ब्रांड के आतंकवाद को समझने में पूरी तरह असफल रहे। लश्कर ने ही मुंबई हमले की साजिश रची, उसे अंजाम दिया और उसकी निगरानी की। उसे इस काम में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ का पूरा सहयोग मिला। शिकागो की अदालत के इस फैसले को समझना मुश्किल है कि राणा की मुंबई हमले में कोई भूमिका नहीं थी, हालांकि उसने उस लश्कर को सहायता उपलब्ध कराई जिसने इतने बडे़ आतंकी हमले को अंजाम दिया। अमेरिकी अभियोजकों का इस फैसले के खिलाफ ऊंची अदालतों में अपील करना आवश्यक है, जबकि भारत को अमेरिका के साथ अपने कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक रिश्तों का फायदा उठाकर ओबामा प्रशासन पर इसके लिए दबाव डालना चाहिए कि वह जितनी जल्दी संभव हो, इस फैसले को चुनौती दे। भारत ने बमुश्किल पांच-छह दिन पहले अमेरिका के साथ दस सैन्य परिवहन विमानों की आपूर्ति के लिए 4.1 अरब डालर का सौदा किया है, जो 23000 अमेरिकियों को रोजगार प्रदान करेगा। भारत को अमेरिका के समक्ष यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि व्यापारिक संबंधों को राणा-हेडली जैसे मुद्दों से अलग नहीं रखा जा सकता, जो भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं। फिर भारत को क्या करना चाहिए? कम से कम दो ऐसे विकल्प हैं जिस पर भारतीय विदेश मंत्रालय चल सकता है और संकेत यह भी हैं कि मंत्रालय इन पर विचार कर रहा है। भारत राणा-हेडली प्रकरण और उनकी आइएसआइ के साथ मिलीभगत को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की आतंकवाद निगरानी समिति के समक्ष ले जाने पर विचार कर रहा है। इसके अतिरिक्त भारत अमेरिका को यह बताने पर भी विचार कर रहा है कि वह राणा-हेडली मामले तथा मुंबई हमले में आइएसआइ की भूमिका को उसी प्रकार ले जैसा उसने 1988 के लाकरबी मामले में लीबियाई खुफिया सेवा की भूमिका को लिया था। 9/11 की घटना के बाद पारित किए गए प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक देश का यह दायित्व है कि वह किसी अन्य देश में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए सहायता देने अथवा उनमें शामिल होने से दूर रहे। भारतीय कूटनीतिक प्रतिष्ठान को अमेरिका के समक्ष यह स्पष्ट करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए कि आइएसआइ ने मुंबई हमले के रूप में इस प्रस्ताव का उल्लंघन किया। नई दिल्ली की ऐसी कोई पहल अमेरिका को इसके लिए राजी करने में भी मददगार हो सकती है कि वह पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने वाला राष्ट्र घोषित करे। इन दो विकल्पों की राह में हालांकि दो कठिनाइयां भी हैं। पहली यह कि चीन आइएसआइ के खिलाफ कार्रवाई करने की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पहल पर वीटो कर देगा और दूसरी यह कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय इस मामले में भारत के साथ नहीं खड़ा होना चाहेगा। भारत ने पहले ही संकेत दे दिया है कि उसके पास राणा और हेडली के खिलाफ आरोपपत्र दायर करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। गृह मंत्रालय ने शिकागो की अदालत में अमेरिकी अभियोजकों द्वारा प्रस्तुत किए गए पांच सबूत भी मांगे हैं। मंत्रालय ने यह उल्लेख भी किया है कि जहां राणा के वकीलों ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है वहीं अभियोजन पक्ष की ओर से इस संदर्भ में कुछ नहीं कहा गया है। हेडली, राणा और अन्य के खिलाफ मामले की जांच करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने फिलहाल अभियुक्तों के खिलाफ भारत में आरोपपत्र दायर करने से पहले अमेरिका में इस मामले की कार्यवाही समाप्त होने तक इंतजार करने का फैसला किया है। एनआइए के समक्ष अब बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। उसे न केवल अमेरिकी अदालत के फैसले का अच्छी तरह अध्ययन करना है, बल्कि भारतीय अदालत में हेडली, राणा और अन्य के खिलाफ मुकदमा चलाने की तैयारी भी करनी है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)


रहस्य ही रह जाएगा राणा की दोषमुक्ति का फैसला


शिकागो अदालत में 12 सदस्यीय ज्यूरी द्वारा मुंबई हमले के सहआरोपी तहव्वुर हुसैन राणा को दोषमुक्त करार दिए जाने और इस फैसले के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बताने के बाद ऐसा लगता है कि यह सदा के लिए रहस्य ही बना रहेगा कि आखिर राणा को किस आधार पर दोषमुक्त करार दिया गया। ज्यूरी द्वारा मीडिया को कुछ नहीं बताने और अपनी पहचान गुप्त रखने के बाद अब मीडिया और विशेषज्ञ इस विषय पर सिर्फ अटकलें ही लगा पाएंगे। ज्यूरी के निवेदन के बाद यह निर्णय लिया गया था कि इसके सभी 12 सदस्यों की पहचान कभी भी नहीं बताई जाएगी और इसे सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ इस फैसले से न सिर्फ मुंबई हमले के पीडि़तों को निराशा हुई है बल्कि भारत और अमेरिकी सरकार भी निराश हैं। इस फैसले के बाद जो सबसे बड़ा सवाल उभरकर आया है वह यह है कि कैसे कोई मुंबई हमलों के जिम्मेदार आतंकवादी संगठन को सहायता तो मुहैया करा सकता है लेकिन खुद उस हमले में संलिप्त नहीं हो सकता। इस बारे में अभी तक सबसे करीबी स्पष्टीकरण अमेरिकी अटॉर्नी पैट्रिक फिट्जगेराल्ड की तरफ से दिया गया। फैसले के तुरंत बाद उन्होंने कहा कि उनके अनुसार मुंबई मामले में राणा को दोषमुक्त इसलिए करार दिया गया क्योंकि अभियोजक यह सिद्ध करने में नाकाम रहे कि मुंबई हमला होने से पहले राणा को इसके बारे में जानकारी थी। फिट्जगेराल्ड ने कहा था कुल मिलाकर मैं निराश नहीं हूं। मैं सिर्फ मुंबई मामले में दोषमुक्ति (राणा की) से निराश हूं लेकिन कुल मिलाकर मैं संतुष्ट हूं क्योंकि दो अन्य मामलों का दोष बहुत गंभीर हैं। दूसरी तरफ, राणा के वकील चार्ली स्विफ्ट का मानना है कि ज्यूरी ने सबूतों के आधार पर फैसला दिया। चार्ली ने कहा सबूत साफ थे कि मुंबई आतंकवादी हमलों में राणा का हाथ नहीं था। इससे पहले शिकागो की अदालत ने राणा को पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा को मदद देने और डेनमार्क में हमले की साजिश रचने के मामले में दोषी करार दिया था जबकि सबसे संगीन यानी मुंबई हमले की साजिश में शामिल होने के आरोप से उसे मुक्त कर दिया गया। 26/11 हमला : बचाव पक्ष को सात दिन के भीतर कागजात देने के आदेश इस्लामाबाद, एजेंसी : पाकिस्तान की एक आतंकवाद निरोधी अदालत ने मुंबई हमलों के मामले में शनिवार को बचाव पक्ष के वकील को प्रमुख भारतीय गवाहों के बयानों की प्रतियों और अन्य प्रासंगिक दस्तावेज सौंपे जाने के लिए अभियोजन पक्ष को एक सप्ताह का समय दिया। 26/11 हमलों की साजिश रचने के आरोप में लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडर जकी उर रहमान लखवी सहित सात आरोपियों के खिलाफ अदालत मामले की सुनवाई कर रही है। सुरक्षा कारणों से मामले की सुनवाई रावलपिंडी की अदियाला जेल में हो रही है। सूत्रों के मुताबिक अभियोजन पक्ष सुनवाई के दौरान न्यायाधीश राणा निसार अहमद के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत करने में नाकाम रहा। अभियोजन पक्ष द्वारा एक सप्ताह समय मांगे जाने के बाद जज ने उन्हें 18 जून तक समय दे दिया और कार्यवाही को स्थगित कर दिया। इससे पहले 28 मई को अंतिम सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने निसार अहमद से कहा कि भारत सरकार ने पाकिस्तानी न्यायिक आयोग के साथ सहयोग करने, गवाहों और अधिकारियों से पूछताछ की अनुमति देने का आश्र्वासन दिया है। जज ने उनसे भारत द्वारा भेजे गए लिखित पत्रों के साथ अपने दावे की पुष्टि के लिए सबूत देने को कहा था। सूत्रों ने बताया कि यह मामला अगली सुनवाई में भी उठ सकता है.



अंतिम जिरह पूरी, राणा पर फैसले का इंतजार


पक्ष और बचाव पक्ष की अंतिम जिरह पूरी हो गई है। अभियोजन पक्ष ने मुख्य आरोपी डेविड कोलमैन हेडली के साथ जुर्म कबूलने के लिए की गई सौदेबाजी (प्ली बार्गेन) का बचाव करते हुए कहा कि इससे अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी एफबीआइ को लश्कर-ए-तैयबा के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई। वहीं बचाव पक्ष ने राणा को हेडली उर्फ दाऊद गिलानी के हाथों छले गए व्यक्ति के रूप में पेश किया। मुख्य आरोपी हेडली मुंबई हमलों में अपनी भूमिका स्वीकार चुका है। उसे वर्ष 2009 में शिकागो में गिरफ्तार किया गया था। सरकारी अटार्नी विकी पीटर्स ने 12 सदस्यीय ज्यूरी के समक्ष कहा, गिरफ्तारी के दो हफ्ते के भीतर पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी हेडली ने लश्कर के ढांचे और आतंकी योजनाओं की संपूर्ण जानकारी मुहैया कराई थी। उन्होंने भारत का नाम लिए बगैर कहा कि इसे अन्य देशों की सरकारों के साथ भी साझा किया गया। इससे कई आतंकी हमलों को रोकने में मदद भी मिली। प्ली बार्गेन के तहत हेडली को मौत की सजा नहीं दी जा सकती। साथ ही ही उसे पाकिस्तान, भारत या डेनमार्क प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता। पीटर्स ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि हेडली खतरनाक शख्स है। हमलों को अंजाम देने के लिए ढेर सारी योजनाओं और कई लोगों की जरूरत होती है। उन्होंने कहा, हेडली साजिश का बहुत बड़ा हिस्सा था। राणा ने उसकी भारत यात्रा और वहां व्यवसाय करने में मदद दी। उन्होंने कहा कि प्ली बार्गेन के तहत हेडली को सजा-ए-मौत नहीं दी जा सकती लेकिन सरकार ज्यूरी से आग्रह करती है कि उसे उतने वर्षो की कारावास सजा सुनाए जो उन्हें उपयुक्त लगे। करीब एक पखवाड़े तक चली सुनवाई के दौरान राणा ने चुप रहने का विकल्प चुना और गवाही नहीं दी। 50 वर्षीय चिकित्सक राणा पर मुंबई हमलों की साजिश के दौरान हेडली की मदद करने और उसे साजोसामान मुहैया कराने का आरोप है। दोष साबित होने पर उसे उम्र कैद हो सकती है। मुंबई पर वर्ष 2008 में हुए हमलों में 166 लोगों की मौत हो गई थी। मामले की सुनवाई कर रही संघीय ज्यूरी अब इस मामले में अंतिम विचार-विमर्श शुरू करने वाली है ताकि राणा के भाग्य का फैसला हो सके। जिरह के समाप्त होने के दौरान राणा थोड़ा तनावग्रस्त नजर आया। राणा के वकील का तर्क : राणा के वकील पैट्रिक ब्लेगन ने हेडली को ऐसा व्यक्ति बताया, जिसने एफबीआइ समेत सबको बेवकूफ बनाया। अपनी भावनात्मक अपील में बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि उसका मुवक्किल एक धार्मिक व्यक्ति है, जिसे हेडली ने अपनी आतंकवादी योजनाओं को अंजाम देने के लिए धोखा दिया। ब्लेगन ने कहा, हेडली को यह मौका मत दीजिए कि वह आपको भी बेवकूफ बना दे। इस मामले में राणा को दोषी मत ठहराइए। उन्होंने कहा कि राणा एक साधारण व्यवसायी था। उसकी रुचि मुंबई, लाहौर, कराची और डेनमार्क समेत समुद्र पार के देशों में अपने व्यवसाय को बढ़ाने में थी। इस योजना का फायदा उठाते हुए हेडली ने उसे छला और उसके व्यवसाय का उपयोग पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ और लश्कर-ए-तैयबा के नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए किया। उन्होंने कहा हेडली ने अपने और अपने परिवार के लिए राणा की बलि दे दी। सुनवाई के दौरान सरकारी गवाह बने हेडली ने पांच दिन तक गवाही दी और मुंबई हमलों में आइएसआइ की भूमिका के बारे में कई रहस्योद्घाटन किए।