लेखक लश्कर-ए-तैयबा के आर्थिक स्रोतों के संदर्भ में सामने आये तथ्यों पर चिंता जता रहे हैं.....
अब यह बिल्कुल साफ हो रहा है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश विश्व के सर्वाधिक खतरनाक और संसाधनों से लैस आतंकी संगठनों में से एक लश्कर-ए-तैयबा पर लगाम लगाने में असफल रहे हैं। अगर हाल ही में सार्वजनिक किए गए अमेरिकी गृह मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेजों को ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद भी यह आतंकी संगठन न केवल बचा हुआ है, बल्कि उसने अपनी ताकत भी कई गुना बढ़ा ली है। दस्तावेजों के अनुसार यह आतंकी संगठन पचास लाख अमेरिकी डालर की रकम नई भर्ती, आतंकियों के प्रशिक्षण पर खर्च करता है, जिनकी मदद से भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका के खिलाफ आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। इस रकम को लश्कर के कमांडर जकी उर रहमान लखवी ने खर्च किया। इस पैसे की मदद से लश्कर की आतंकी गतिविधियों के लिए हथियार और गोलाबारूद के अतिरिक्त अन्य सामग्री की खरीद की गई। जो दस्तावेज सार्वजनिक हुए हैं उनके अनुसार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने यह भारी-भरकम धनराशि निजी चंदे, गैर-सरकारी संगठनों और मदरसों से मिलने वाली सहायता से जुटाई। इसमें पूरे दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व और यूरोप में फैले व्यवसाय की भी मदद ली गई और इस पैसे का इस्तेमाल आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए किया गया। काफी पैसा सऊदी अरब और कुवैत से आया, जहां लश्कर को न केवल पाकिस्तानी समुदाय में समर्थन हासिल है, बल्कि दूसरे देशों के मुस्लिमों में भी उसकी पैठ है। इसके अतिरिक्त लश्कर को शाही परिवारों का वरदहस्त भी हासिल है। वैसे इस आतंकी संगठन का मुख्य आधार पाकिस्तान है, जहां व्यावसायी, शीर्ष उद्यमी, किसान और अन्य पेशे से जुडे़ लोग आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए उसे उदारता से धन मुहैया कराते हैं। यह चंदा उगाही पूरे पाकिस्तान में वर्ष भर चलती रहती है-कभी मजहब के नाम पर तो कभी खुलकर जिहाद के नाम पर। दस्तावेजों के मुताबिक जहां इस चंदे के एक भाग का इस्तेमाल सामाजिक कार्यो के लिए किया जाता है, वहीं अधिकाधिक धन का इस्तेमाल आतंकी ढांचे को मजबूत बनाने में किया जाता है। एक रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह लश्कर के सामाजिक सहायता संगठन इदरा खिदमत-ए-खल्क ने दिसंबर 2005 में चंदे के लिए जमात उद दावा के नाम की पर्चिया काटीं। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब अल कायदा, तालिबान, लश्कर और अन्य आतंकी संगठनों, जिनमें हमास भी शामिल है, के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाला महत्वपूर्ण स्थल बना हुआ है। यह पैसा भी आतंकी घटनाओं को अंजाम देने में खर्च किया जाता है। लश्कर का आतंकी सरगना हाफिज सईद खुद गिरफ्तारी और हत्या के भय से विदेश यात्राएं करने से परहेज करता है, लेकिन उसका रिश्तेदार और संगठन में नंबर दो की हैसियत रखने वाला अब्दुर रहमान मक्की सऊदी अरब और मध्य-पूर्व के देशों में धन की उगाही के लिए धड़ल्ले से यात्राएं करता है। वह पाकिस्तान में नए स्कूल खोलने या मदरसों के आधुनिकीकरण के नाम पर पैसे इकट्ठा करता है। अक्सर खर्चे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि इस काम के लिए मिलने वाली सहायता राशि से कुछ भाग आतंकी घटनाओं के लिए निकाला जा सके। लीक हुए दस्तावेजों के अनुसार आतंकी घटनाओं के लिए धन जुटाने का दूसरा तरीका हज यात्रियों से पैसा वसूलना है। एक दस्तावेज में बताया गया है कि इस तरीके का इस्तेमाल काले धन को सफेद बनाने के लिए किया जाता है। इसी तरीके का इस्तेमाल मुंबई आतंकी हमले के लिए धन जुटाने में किया गया। एक अन्य दस्तावेज में इसकी पुष्टि की गई है कि किस तरह सईद और लखवी ने पूरे दक्षिण एशिया में आतंकी घटनाओं की साजिश रचने, उनका निर्देशन करने और उन्हें अंजाम देने का काम किया। मुंबई हमला भी लश्कर की इन आतंकी घटनाओं में शामिल है। आखिर इससे बड़ी विडंबना कोई और क्या होगी कि लश्कर शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा आतंकवादी संगठन है जिसे सरकारी मदद मिलती है। पिछले वर्ष पाकिस्तान में पंजाब सरकार ने लश्कर के मूल संगठन जमात उद दावा को लगभग दस लाख अमेरिकी डालर का अनुदान प्रदान किया और वह भी तब जब जमात उद दावा को संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के साथ-साथ भारत और कई अन्य देशों ने प्रतिबंधित कर रखा है। चूंकि यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद पाकिस्तान अपने सामरिक उपकरण अर्थात लश्कर जैसे आतंकी संगठनों को कमजोर करने के लिए कुछ नहीं करने वाला इसलिए यह जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ऐसे आतंकी संगठनों के धन के लेन-देन पर अंकुश लगाने के लिए प्रयास वैश्विक स्तर पर होना चाहिए। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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