Sunday, January 2, 2011

जीपीएस का इस्तेमाल कर रहे हैं आतंकवादी

भरोसेमंद स्थानीय गाइडकी सहायता न मिलने के चलते घुसपैठियों ने बदले तरीके
नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में नियंतण्ररेखा (एलओसी) पर सीमा पार से घुसपैठ करने वाले आतंकवादी अब भरोसेमंद स्थानीय गाइडकी सहायता न मिलने के चलते जीपीएस’ (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) उपकरण का धड़ल्ले से प्रयोग करने लगे हैं। साथ ही घुसपैठ के परम्परागत क्षेत्रों को छोड़कर वे अब नए रास्तों की तरफ भी रुख करने लगे हैं। सेना के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि बीते साल 2010 में एलओसी से घुसपैठ की कोशिशों में इसके पिछले साल (2009) की तुलना में कोई खास कमी नहीं आई है, लेकिन घुसपैठ की ज्यादातर कोशिशों में नाकामयाबी के बाद उन्होंने अब पुंंछ-राजौरी में नए रास्तों की तलाश भी शुरू कर दी है। बीते साल घाटी में पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा घुसपैठ के 470 प्रयास किये गए और 125 आतंकवादियों को हमारे सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतार दिया। यद्यपि र्वष 2009 में घुसपैठ के प्रयासों की संख्या 485 थी। सेना के एक अधिकारी ने बताया कि हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए पाक घुसपैठियों के पास से जीपीएस
उपकरण भी बरामद हुए हैं। इस उपकरण का प्रयोग वे इसलिये कर रहे हैं कि उन्हें अब उन स्थानीय लोगों का सहयोग नहीं मिल रहा जो मजबूरी, र्मजी या लालच में आतंकवादियों के लिए गाइड का काम करते थे। ऐसी दशा में मार्ग र्दशन के लिए जीपीएस से अधिक भरोसेमंद उपकरण और क्या हो सकता है। सीमा पार से पाकिस्तानी रेंर्जस ने जब-जब युद्ध विराम का उल्लंघन कर भारत की तरफ फायरिंग की है, उसका उद्देश्य घुसपैठिए आतंकवादियों को भारतीय सीमा में प्रवेश कराने के लिए उन्हें कवरिंग देना ही रहा। पाक रेंर्जस की चाल होती है कि वे भारतीय सुरक्षा बलों का ध्यान बंटाने के लिए फायरिंग करते हैं और दूसरी तरफ आतंकवादियों को भारतीय सीमा में प्रवेश कराने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान की तरफ से ज्यादातर फायरिंग रात के वक्त ही हुई है। जाहिरा तौर पर यह घुसपैठ कराने का पाक का नापाक प्रयास ही है। दूसरी ओर, स्टेट (जम्मू-कश्मीर) अथारिटी ने घाटी में सेना के उच्चाधिकारियों को इस बात को समझाने की कोशिश की है कि आतंकवादी घुसपैठ के मद्देनजर जम्मू- कश्मीर में समूची नियंतण्ररेखा (एलओसी) और इंटरनेशनल बार्डर पर सुरक्षा और र्सविलांस व्यवस्था की पुनर्समीक्षा जरूरी हो गई है। जबकि सेना की इंटेलीजेंस ने इससे सहमति व्यक्त नहीं की है।

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