Saturday, January 29, 2011

रूस विरोधी आतंकवादी नेटवर्क भी पाक पोषित

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही हर बड़ी आतंकी घटना के तार पाकिस्तान से जुड़ रहे हैं। सोमवार को रूस की राजधानी के सबसे बड़े हवाई अड्डे पर हुए आत्मघाती हमले को लेकर भी यह बात कही जा रही है। रूसी एजेंसियों का कहना है कि जिन विद्रोहियों ने यह आत्मघाती विस्फोट किया, उन्हें पाकिस्तान की धरती पर इसके लिए तैयार किया था। रूसी सुरक्षा एजेंसी ने इस साल दिसंबर में चेतावनी दी थी कि देश में दो बड़े हमले हो सकते हैं। इसके लिए पाकिस्तान के अल कायदा के प्रभाव वाले इलाकों में चेचन विद्रोहियों और ब्लैक विडो (चेचेन विद्रोहियों की विधवाओं) को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पिछले साल मार्च में मास्को मेट्रो स्टेशन पर हुए हमले के वक्त भी चेचन विद्रोहियों के तालिबान और अल कायदा से संबंधों की बात आई थीं। बताया गया था कि तालिबान आतंकियों ने चेचन विद्रोहियों के फिदायीन दस्ते ब्लैक विडो की सदस्यों को अफगानिस्तान से सटे पाकिस्तान के कबाइली इलाकों में प्रशिक्षण दिया गया था। बहरहाल, ताजा हमले से पहले रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने मास्को पुलिस को सूचना भी दी थी कि चेचन आत्मघाती दस्ते की तीन महिलाएं और एक पुरुष मास्को में प्रवेश कर चुके हैं। एजेंसी के मेमो में कहा गया था कि इन्हें पाकिस्तान और ईरान में प्रशिक्षण दिया गया है। पुलिस को यह भी चेतावनी दी गई थी कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित पांच इस्लामी आतंकियों का एक और दस्ता जल्दी ही रूस में प्रवेश करने की तैयारी कर रहा है। सोमवार को हुए विस्फोट के बाद अल कायदा से जुड़ी वेबसाइट ने हमले का दावा भी किया था। दोमोदिदोवो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए इस विस्फोट में 35 लोगों की मौत हो गई थी। राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने सुरक्षा प्रबंधों में चूक के लिए गृह मंत्रालय के परिवहन सुरक्षा निदेशालय के प्रमुख आंद्रेई एलेक्सेएव को बर्खास्त कर दिया है। लापरवाही करने वाले कई और अधिकारियों पर भी तलवार लटकी है।

Wednesday, January 26, 2011

दिल्ली को डर्टी बम से दहला सकते हैं आतंकी


देश पर हमले की ताक में बैठे आतंकवादी अब नए तरीके अपनाने की फिराक में हैं। गणतंत्र दिवस के मौके पर आतंकी संगठन इस बार रेडियोएक्टिव बमों का इस्तेमाल करके दहशत फैला सकते हैं। खुफिया ब्यूरो (आइबी) के अधिकारियों ने यह आशंका व्यक्त की है। रेडियोएक्टिव पदार्थो से बने बम को डर्टी बम नाम दिया गया है। आइबी ने दिल्ली पुलिस को इस बारे में पहले ही एडवाइजरी जारी कर दी है। इसके मुताबिक, आतंकवादी हमेशा से हथियार और आरडीएक्स जैसी विस्फोटक सामग्री का प्रयोग करते आए हैं। मगर अब वे मासूम लोगों को नुकसान पहंुचाने के लिए नई-नई तकनीक और रेडियोएक्टिव बम के इस्तेमाल के साथ कुछ भी कर सकते हैं। आइबी के सूत्रों के अनुसार, कुछ आतंकी संगठन तो 26 जनवरी पर 9/11 जैसे हमले करने की योजना भी बना रहे हैं। इनमें से कुछ संगठन घातक रसायन नाइट्रोसेल्युलोज का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यह शरीर में जलन और सूजन पैदा करने वाला खतरनाक रसायन है। आतंकी इसे भीड़ के बीच फ्लश लाइट, कैमरे या कैप्सूल के जरिए ले जा सकते हैं। इस बारे में प्रतिक्रिया देने के लिए दिल्ली पुलिस का कोई अधिकारी मौजूद नहीं था। जबकि पुलिस सूत्रों का कहना है कि रेडियोएक्टिव पदार्थो के जरिए होने वाले हमलों से निपटने के लिए पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। (मिड डे) क्या है डर्टी बम इनमें परमाणु सामग्री के बजाय विषैले रेडियोएक्टिव पदार्थो का प्रयोग होता है। ऐसे बम फटने पर खतरनाक रेडियोएक्टिव किरणों का उत्सर्जन करते हैं। इनमें एक्स-रे जैसी घातक किरणें भी हो सकती हैं, जो कैंसर भी पैदा कर देती हैं। इन बमों का उद्देश्य लोगों की जान लेना नहीं बल्कि उन्हें शारीरिक और मानसिक नुकसान पहंुचाना है। इनसे निकलने वाली गैसें आस-पास के वातावरण को भी दूषित कर देती हैं।

26/11 के हमले में हेडली का हाथ नहीं मानती मुंबई पुलिस


अगर मुंबई पुलिस की मानें तो अमेरिकी आतंकवादी डेविड हेडली ने मुंबई हमलों में कोई भूमिका नहीं निभाई। यह अलग बात है कि हेडली खुद इस हमले के दौरान निशाना बनाए गए सभी स्थानों की टोह लेने की बात कबूल चुका है। मुंबई पुलिस का यह आकलन बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर की गई उसकी अपील से जाहिर हुआ है, जिसके तहत उसकी अपराध शाखा लश्कर ए तैयबा के पाकिस्तानी मूल के इस आतंकवादी की भूमिका के बारे में खामोश है। मुंबई पुलिस ने हमले में फहीम अंसारी और सबाहुद्दीन को निचली अदालत द्वारा निर्दोष करार दिए जाने को चुनौती दी है। 26 नवंबर 2008 को हुए इस हमले में 166 लोग मारे गए थे। गृहमंत्रालय ने इस हमले में हेडली की भूमिका रहने की बात उजागर होने पर उस तक पहुंचने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। मुंबई पुलिस का अपने विशेष सरकारी वकील उज्जवल डी निकम के जरिए इस बात पर जोर है कि आतंकवादियों ने मुंबई में अंसारी के द्वारा बनाए गए नक्शे की मदद से घुसपैठ की थी। हेडली फिलहाल अमेरिका के शिकागो स्थित जेल में है। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा ने हेडली की भर्ती की थी। हेडली ने एक मजिस्ट्रेट के सामने अमेरिकी अधिकारियों और भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) के अधिकारियों की मौजूदगी में यह कबूल किया था कि मुंबई हमलों के दौरान निशाना बनाए गए स्थानों की टोह लेने में उसकी भूमिका रही थी। बचाव पक्ष और अंसारी के वकील आर बी मोकाशी ने बताया कि यह पुलिस पर निर्भर है कि वह अपराध से जुड़े सभी अपराधियों की भूमिका अदालत में उजागर करे ताकि सच्चाई सामने आ सके और गलतफहमी के लिए कोई जगह न बचे। हेडली की गिरफ्तारी और इसके बाद हुए खुलासों ने मुंबई पुलिस की इस मान्यता पर सवालिया निशान लगा दिया कि आपराधिक षड़यंत्र रचने में सिर्फ अंसारी और सबाउद्दीन शामिल थे। विशेष न्यायाधीश एमएल टहलियानी ने इन दोनों लोगों को यह कहते हुए निर्दोष करार दिया था कि इनके द्वारा मुहैया किए गए नक्शों से बेहतर नक्शे इंटरनेट पर मौजूद हैं। निकम ने इस हमले के लिए इस्तेमाल किए गए नक्शे को अंसारी और सबाउद्दीन द्वारा तैयार किए जाने की बात का जिक्र करते हुए कहा, अजमल कसाब के इकबालिया बयान के मुताबिक लश्कर ए तैयबा ने वीडियो फिल्म और नक्शे की मदद से हमले के संभावित स्थानों का ब्योरा दिया था। डेविड हेडली के बयान से यह स्पष्ट है कि वह इन स्थानों की वीडियो फिल्म तैयार करने के कार्य में शामिल था। निकम ने दलील दी कि मृतक आतंकवादी अबू इस्माइल की जेब में ऐसा नक्शा पाए जाने और इस पर मौजूद लिखावट से यह साबित हो चुका है कि यह अंसारी की लिखावट है। मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के संयुक्त आयुक्त हिमांशु राय से हेडली की भूमिका के बारे में प्रतिक्रिया देने को कहा गया, लेकिन अब तक उनका बयान नहीं आया।



Friday, January 21, 2011

उल्फा ने दी बड़े हमलों की धमकी


प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के प्रमुख नेताओं और सरकार के बीच इसी हफ्ते होने वाली शांति वार्ता के पहले ही विरोध में सुर उठने लगने है। मंगलवार को उल्फा के वार्ता विरोधी गुट के प्रचार प्रमुख ने चेतावनी दी कि उल्फा को ताकतवर ढंग से पुनर्गठित किया जा रहा है और बहुत जल्द ही बड़े हमले किए जा सकते है। प्रचार प्रमुख सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुणोदोई दुहोतिया ने मीडिया को भेजे अपने एक ई मेल में बताया कि यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि उल्फा खत्म हो चुका है। दुश्मन की ऐसा प्रचार कर रहे है कि उल्फा खत्म हो गया है लेकिन बिल्कुल नहीं है। उल्फा का मजबूत ढंग से पुनर्गठित किया जा रहा है। हमने अभी हारने के लिए युद्ध मैदान में प्रवेश नहीं किया है। मीडिया को भेजे ई मेल में उल्फा ही ओर से एक ट्रेनिंग कैंप का फोटो भी भेजा गया जिसमें कुछ सदस्यों को हथियारों के साथ दिखाया गया है। प्रचार प्रमुख ने कहा कि बीते 31 वर्षो से संघर्षतर उल्फा आज एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। अपने प्रभुत्व को लेकर उल्फा किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। सरकार से बातचीत में उल्फा ने हमेशा एक राजनीतिक समाधान इच्छा रखी थी जो कि पूरी न सकी। उन्होंने चेताया कि उल्फा अब किसी भी वक्त बड़े हमले के साथ अपनी वापसी करेगा। गौरतलब है कि उल्फा का कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ अभी भी फरार चल रहा है।

Thursday, January 20, 2011

उत्तर वजीरिस्तान में आतंकी प्रशिक्षण ले रहे १२ कनाडाई


कनाडाई प्रशासन उन रपटों के बाद बेहद चिंतित है जिनमें कहा गया कि इस्लाम कबूल करने वाले कनाडा के करीब 12 नागरिक पाकिस्तान स्थित अल कायदा के शिविर में आतंकी प्रशिक्षण ले रहे हैं। वर्ष 2006 की असफल टोरंटो-18 आतंकी साजिश के अलावा कनाडा को आतंकियों से किसी खतरे का सामना नहीं करना पड़ा है। हालांकि अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाले युद्ध में कनाडा की भी हिस्सेदारी है। हांगकांग की समाचार वेबसाइट एशिया टाइम्स ऑनलाइन के अनुसार धर्म परिवर्तन करने वाले 12 कनाडाई जेहादियों के बीच रहकर पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के समीप अल कायदा के एक शिविर में प्रशिक्षण ले रहे हैं। ये कनाडा में मुंबई सरीखे किसी आतंकी हमले योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट में तालिबान सूत्रों के हवाले से बताया गया कि अल कायदा का उद्देश्य पश्चिमी उग्रवादियों का इस्तेमाल कर कनाडा की जमीन पर आतंकी हमले को अंजाम देना है। रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2010 में 12 कनाडाई अफगानिस्तान पहुंचे थे और वे मिस्त्र के आतंकी संगठन जेहाद अल-इस्लामी से जुड़ गए। हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने के मकसद से नवंबर में सभी को पाकिस्तान में उत्तरी वजीरिस्तान सीमा के समीप दारपाखेल भेज दिया गया। दारपाखेल में एक स्थानीय आतंकवादी आरिफ वजीर के हवाले से बताया गया, कनाडाई नागरिकों ने अफगानिस्तान में जिहाद का प्रशिक्षण लिया। वे अभी विशेष पाठयक्रमों को सीखने में व्यस्त हैं। उन्हें मुख्य रूप से हथियार चलाने और उत्तरी अमेरिका में तस्करी का जाल फैलाने के गुर सीखाएं जा रहे हैं। वजीर ने बताया, कनाडा से 12 लोगों को साधारण वस्तुओं जैसे शक्कर और कुछ रासायनिक सामग्रियों से शक्तिशाली बम बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके बाद सभी स्वदेश लौट जाएंगे और कनाडा के बड़े शहरों को निशाना बनाने के अलकायदा की योजनाओं को अंजाम देंगे। कनाडाई प्रशासन का कहना है कि वह रिपोर्ट की साख और विश्र्वसनीयता की जांच कर रहे हैं। छानबीन पूरी होने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। रिपोर्ट में प्रशिक्षण लेने वाले कुछ कनाडाइयों के नाम जीन पॉल (स्थानीय नाम सदीक उल्लाह), लेमन लॉन्गलोइस (साना उल्लाह),जेम्स रिचर्ड(अब्दुर रहमान, ओट्टो पॉल (अबु उस्मान),थॉमस(अब्दुल्ला) और(हजीफ उल्लाह) के रूप में सामने आए हैं।


Wednesday, January 19, 2011

२६/११ पर एक इंच नहीं बढ़ी पाक की जांच

भारत ने रविवार को कहा कि मुंबई हमलों के दोषियों को पाकिस्तान में न्याय के कठघरे में लाने का काम एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। नई दिल्ली ने उम्मीद व्यक्त की कि इस्लामाबाद समझौता एक्सपे्रस विस्फोट की निष्पक्ष जांच से सीख लेकर 26/11 नरसंहार के षड्यंत्रकारियों को दंडित करेगा। गृह सचिव जीके पिल्लै ने कहा कि पाकिस्तान में कोई वास्तविक जांच नहीं हुई है। यहां तक कि हमलावरों के आकाओं की आवाज के नमूने दिए जाने के भारत के आग्रह को भी अनसुना कर दिया गया है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने जब पिछले साल पाकिस्तान यात्रा के दौरान मुंबई हमलों के साजिशकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई और हमलावरों के आकाओं की आवाज के नमूने दिए जाने के बारे में कहा था तो उस समय उनके पाकिस्तानी समकक्ष रहमान मलिक ने चिदंबरम से कहा था, आप हमारे जवाब से निराश नहीं होंगे। पिल्लै ने कहा, सात महीने गुजर गए, लेकिन पाकिस्तान का कोई जवाब नहीं मिला। हम निराश हैं। उन्होंने कहा कि मुंबई हमलों में शामिल या हमलावरों को निर्देश देने वाले किसी भी बड़े साजिशकर्ता को गिरफ्तार नहीं किया गया है। सिर्फ दूसरे या तीसरे नंबर के षड्यंत्रकारियों को पकड़ा गया है। भारतीय जांचकर्ताओं के पास मुंबई हमलों के हमलावरों और पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं के बीच हुई बातचीत है जो हमलों के दौरान रिकॉर्ड की गई थी। पिल्लै के अनुसार, पाकिस्तान को भारत ने आतंकी आकाओं के नाम और फोटाग्राफ मुहैया करा दिए हैं। पाक आवाज के नमूने दे देता है और यह रिकॉर्ड की गई बातचीत से मेल खा जाते हैं तो पाक में बैठे आकाओं का पता चल जाएगा। समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के बारे में पिल्लै ने कहा कि भारत आतंक फैलाने वाले किसी भी व्यक्ति को कठघरे में लाने के प्रति संकल्पबद्ध है। चाहे वह किसी धर्म से ताल्लुक रखता हो।

Sunday, January 16, 2011

आतंकवाद का आर्थिक तंत्र

लेखक लश्कर-ए-तैयबा के आर्थिक स्रोतों के संदर्भ में सामने आये तथ्यों पर चिंता जता रहे हैं.....
अब यह बिल्कुल साफ हो रहा है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश विश्व के सर्वाधिक खतरनाक और संसाधनों से लैस आतंकी संगठनों में से एक लश्कर-ए-तैयबा पर लगाम लगाने में असफल रहे हैं। अगर हाल ही में सार्वजनिक किए गए अमेरिकी गृह मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेजों को ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद भी यह आतंकी संगठन न केवल बचा हुआ है, बल्कि उसने अपनी ताकत भी कई गुना बढ़ा ली है। दस्तावेजों के अनुसार यह आतंकी संगठन पचास लाख अमेरिकी डालर की रकम नई भर्ती, आतंकियों के प्रशिक्षण पर खर्च करता है, जिनकी मदद से भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका के खिलाफ आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। इस रकम को लश्कर के कमांडर जकी उर रहमान लखवी ने खर्च किया। इस पैसे की मदद से लश्कर की आतंकी गतिविधियों के लिए हथियार और गोलाबारूद के अतिरिक्त अन्य सामग्री की खरीद की गई। जो दस्तावेज सार्वजनिक हुए हैं उनके अनुसार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने यह भारी-भरकम धनराशि निजी चंदे, गैर-सरकारी संगठनों और मदरसों से मिलने वाली सहायता से जुटाई। इसमें पूरे दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व और यूरोप में फैले व्यवसाय की भी मदद ली गई और इस पैसे का इस्तेमाल आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए किया गया। काफी पैसा सऊदी अरब और कुवैत से आया, जहां लश्कर को न केवल पाकिस्तानी समुदाय में समर्थन हासिल है, बल्कि दूसरे देशों के मुस्लिमों में भी उसकी पैठ है। इसके अतिरिक्त लश्कर को शाही परिवारों का वरदहस्त भी हासिल है। वैसे इस आतंकी संगठन का मुख्य आधार पाकिस्तान है, जहां व्यावसायी, शीर्ष उद्यमी, किसान और अन्य पेशे से जुडे़ लोग आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए उसे उदारता से धन मुहैया कराते हैं। यह चंदा उगाही पूरे पाकिस्तान में वर्ष भर चलती रहती है-कभी मजहब के नाम पर तो कभी खुलकर जिहाद के नाम पर। दस्तावेजों के मुताबिक जहां इस चंदे के एक भाग का इस्तेमाल सामाजिक कार्यो के लिए किया जाता है, वहीं अधिकाधिक धन का इस्तेमाल आतंकी ढांचे को मजबूत बनाने में किया जाता है। एक रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह लश्कर के सामाजिक सहायता संगठन इदरा खिदमत-ए-खल्क ने दिसंबर 2005 में चंदे के लिए जमात उद दावा के नाम की पर्चिया काटीं। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब अल कायदा, तालिबान, लश्कर और अन्य आतंकी संगठनों, जिनमें हमास भी शामिल है, के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाला महत्वपूर्ण स्थल बना हुआ है। यह पैसा भी आतंकी घटनाओं को अंजाम देने में खर्च किया जाता है। लश्कर का आतंकी सरगना हाफिज सईद खुद गिरफ्तारी और हत्या के भय से विदेश यात्राएं करने से परहेज करता है, लेकिन उसका रिश्तेदार और संगठन में नंबर दो की हैसियत रखने वाला अब्दुर रहमान मक्की सऊदी अरब और मध्य-पूर्व के देशों में धन की उगाही के लिए धड़ल्ले से यात्राएं करता है। वह पाकिस्तान में नए स्कूल खोलने या मदरसों के आधुनिकीकरण के नाम पर पैसे इकट्ठा करता है। अक्सर खर्चे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि इस काम के लिए मिलने वाली सहायता राशि से कुछ भाग आतंकी घटनाओं के लिए निकाला जा सके। लीक हुए दस्तावेजों के अनुसार आतंकी घटनाओं के लिए धन जुटाने का दूसरा तरीका हज यात्रियों से पैसा वसूलना है। एक दस्तावेज में बताया गया है कि इस तरीके का इस्तेमाल काले धन को सफेद बनाने के लिए किया जाता है। इसी तरीके का इस्तेमाल मुंबई आतंकी हमले के लिए धन जुटाने में किया गया। एक अन्य दस्तावेज में इसकी पुष्टि की गई है कि किस तरह सईद और लखवी ने पूरे दक्षिण एशिया में आतंकी घटनाओं की साजिश रचने, उनका निर्देशन करने और उन्हें अंजाम देने का काम किया। मुंबई हमला भी लश्कर की इन आतंकी घटनाओं में शामिल है। आखिर इससे बड़ी विडंबना कोई और क्या होगी कि लश्कर शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा आतंकवादी संगठन है जिसे सरकारी मदद मिलती है। पिछले वर्ष पाकिस्तान में पंजाब सरकार ने लश्कर के मूल संगठन जमात उद दावा को लगभग दस लाख अमेरिकी डालर का अनुदान प्रदान किया और वह भी तब जब जमात उद दावा को संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के साथ-साथ भारत और कई अन्य देशों ने प्रतिबंधित कर रखा है। चूंकि यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद पाकिस्तान अपने सामरिक उपकरण अर्थात लश्कर जैसे आतंकी संगठनों को कमजोर करने के लिए कुछ नहीं करने वाला इसलिए यह जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ऐसे आतंकी संगठनों के धन के लेन-देन पर अंकुश लगाने के लिए प्रयास वैश्विक स्तर पर होना चाहिए। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)