हाल फिलहाल की घटनाएं साबित करती हैं कि यूपी असलहों की खरीद-फरोख्त का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। महफूज ठिकाना मानकर अंतरराज्यीय गिरोहों ने यहां की राह पकड़ ली है। वजह यह है कि डाल-डाल, पात-पात के खेल में तस्करों ने नकेल कसने वाली संस्था के घर में ही सेंध लगाकर कुछ वर्दी वालों को भी अपनी जमात में शामिल कर लिया है। अंतरराज्यीय असलहा तस्कर रामप्रताप भदौरिया और मनवीर कैथू को एसटीएफ ने रविवार को गिरफ्तार किया तो उसके पास गिनाने के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन गुजरे बुधवार को बदायूं में अपराधी प्रवृत्ति के दरोगा संजय राय के घर से बरामद असलहों का जखीरा शर्माने का सबब भी था। इस जखीरे में एलएमजी और ग्रेनेड जैसे हथियार भी थे। जाहिर है कि एक दशक के अंदर इस धंधे में वर्दीकलंकित होती रही है। वर्ष 2004 में मिर्जापुर पीएसी के शस्त्रागार में गिनती में करीब एक लाख कारतूस कम पाए गए। वहां तैनात हेड आरमोरर को गिरफ्तार किया गया। 2008 में इसका वृहद रूप सामने आया जब रामपुर से लेकर बलिया तक पुलिस के शस्त्रागारों से कारतूस और असलहे गायब मिले, तब वहां तैनात आरमोररों के चेहरे का नकाब उतर गया। प्रदेश में कई जिलों के आरमोररों की संलिप्तता उजागर हुई और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। आतंकियों और नक्सलियों से भी इनके रिश्ते जगजाहिर हो गए। अपराधियों को वर्दी के जरिए असलहा आपूर्ति की बात कोई नई नहीं है। 1967 में गोरखपुर पुलिस लाइन से बिहार के दियारा क्षेत्र के जल दस्यु सुदामा मण्डल को कारतूस आपूर्ति के मामले में एक पुलिसकर्मी पकड़ा गया। बाद में पुलिस और पीएसी से बर्खास्त कई सिपाहियों ने आपराधिक गिरोह संचालित करके सियासी राह पकड़ ली, लेकिन इस धंधे से उनकी डोर बंधी रही। यह भी किसी से छिपा नहीं है। असल में नेपाल की खुली सीमा इस धंधे को परवान चढ़ाने में सबसे कारगर साबित हुई। दूसरे, बिहार के अपराधियों और आइएसआइ की निरंतर बढ़ती घुसपैठ ने भी इसे विस्तार दिया है। इसीलिए यूपी में असलहों का क्रेज भी बढ़ने लगा है।
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